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डेरी सयंत्रों के चुनाव संबंधी सुझाव


Ram Naresh


यदि नये स्थान पर किसी डेरी प्लांट को स्थापित करना हो तो संयंत्रों का चुनाव तथा उनको स्थापित करने के लिए भवन निर्माण संबंधी आवश्यकताओं की जानकारी होना आवश्यक है। अधिकांश रूप से संयंत्रों का माप और उन्हें स्थापित करने के लिए आवश्यक सूचनाएँ निर्माताओं से ही मिल पाती हैं। इसके साथ ही किस प्रकार का फर्श हो और कितने रोशनदान होने चाहिए आदि जैसी सूचनाएँ भी बड़ी आसानी से प्राप्त हो जाती हैं। फिर भी किस कम्पनी से सयन्त्र मंगाए जायें और उनकी कितनी क्षमता होनी चाहिए, इन बातों का निर्णय तो डेरी इंजीनियर तथा विभागीय विशेषज्ञ ही ले सकते हैं। मोटे रूप से निम्नांकित विचारों को ध्यान में रखकर डेरी संयन्त्रों का चुनाव करना उचित होगा:

1- संसाधन क्षमता - इसका निर्णय तभी हो सकता है जब यह मालूम हो कि वर्तमान समय तथा भविष्य में कितना दूध एकत्रित हो सकेगा। अच्छा तो यह होगा कि संयन्त्र की क्षमता इतनी रहे जो कि कम से कम 5 वर्ष तक आवश्यकता पूरी कर सके। उसके पश्चात यदि अधिक मात्रा में दूध प्राप्त होने लगे तो फिर एक और नया संयंत्र उसी माप पर स्थापित कर दिया जाए। शुरू में ही बहुत बड़ी क्षमता वाले संयन्त्रों के प्रयोग में अधिक व्यय होगा तथा ऊर्जा व्यर्थ जाना स्वाभाविक है।

2- संसाधन प्रणाली (पैटर्न) - इससे यह समझा जाता है क्या दूध बड़े-बड़े दुग्ध टैंकों में लाया जाता है अथवा 10 से 40 लीटर के कनस्तरों में, दोनों समय अर्थात प्रातःकाल और सायंकाल में एकत्रित किया जाए या एक ही समय में। बिना ठंडा किए गए दूध को दूहने के समय से लगभग 4 घंटे में ही संसाधित कर देना चाहिए ताकि दूध खराब न हो।

3- स्थान की नाप और संयन्त्रों का विन्यास - कम क्षेत्रफल वाले स्थान पर एक लघु एवं सघन प्रकार की मशीन या संयंत्र और उनसे सम्बन्धित संयन्त्रों का प्रयोग करना उपयोगी सिद्ध होगा। संयन्त्रों की स्थापना करने के लिए उचित क्षेत्रफल वाला स्थान चाहिए या मिले हुए स्थान पर एक उचित नाप वाला संयन्त्र स्थापित किया जाना चाहिए। इन बातों को यदि ध्यान में नहीं रखा गया तो काम करने में असुविधा ही नहीं बल्कि दुर्घटना भी हो सकती है।

4- बहुउद्देशीय एवं आसानी से स्वच्छ किया जाना - यदि कम मात्रा में ही दूध और दूध वाले पदार्थों का संसाधन करना हो तो छोटी नाप के किन्तु अनेक काम में प्रयोग आने वाले संयन्त्र चुने जाने चाहिए। जैसे कि तर पास्तेरीकृत (वैट पास्चूराइज) जिसे दूध, क्रीम तथा कई प्रकार के दूध उत्पादों में प्रयोग करते हैं, अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है।

5- दूध खाद्य पदार्थ है। अतः इसमें किसी प्रकार की रासायनिक क्रिया नहीं होनी चाहिए। अन्यथा यह खाने योग्य नहीं रह सकेगा। इसलिए उन धातुओं को प्रयोग में लाना चाहिए तो जो किसी प्रकार की रासायनिक प्रक्रिया से वंचित रहते हैं। डेरी में काम आने वाले संयन्त्रों, बर्तनों तथा भण्डारण के लिए अनेक प्रकार के धातुओं में स्टेनलेस स्टील अधिक उपयुक्त पायी गयी है।

धातुओं का चुनाव करते समय निम्न विशेषताएँ ध्यान में रखनी चाहिए :
(1) जंग रहित होना
(2) तीव्र ऊष्मा संचालन होना
(3) मजबूत, कम कीमत वाला और देखने में सुन्दर होना
(4) आसानी से साफ किया जाने वाला और किसी प्रकार के पदार्थ को न चिपकाने वाली विशेषता युक्त होना

उपर्युक्त गुण वाली निम्नांकित धातुएँ प्रयोग में लाई जाती है।
(1) स्टेनलेस स्टील
(2) शीशा (ग्लास)
(3) निकेल
(4) एल्युमिनियम
(5) तांबा
(6) मिश्र धातुएँ (ब्रॉन्ज), ब्रास आदि
(7) ढलवां लोहा (कास्ट आयरन)
(8) जस्ता लेपयुक्त लोहा
चाहे कोई भी धातु प्रयोग की जाए, किन्तु इस बात की विशेष आवश्यकता है कि प्रयोग करने के बाद उन्हें स्वच्छ, शुष्क और धूल रहित दशा में रखा जाए।

चूंकि दूध या दुग्ध पदार्थों को शीतगृह में रखना पड़ता है। अतः ऊष्मारोधक का प्रयोग आवश्यक हो जाता है। इन्सुलेशन को दीवार की शीत या आन्तरिक भाग पर ही लगाया जाता है। अधिकांश ऐसे इन्सुलेशन पदार्थ आद्रतावाही होते है। अतः उन्हें नमी खींचने से बचाना चाहिए। नमीयुक्त होने पर उनकी ऊष्मारोधी विशेषता नष्ट या हीन हो जाती है। अब कार्क के स्थान पर थर्मोकोल या अन्य वनस्पतिक पदार्थों जैसे धान की भूसी, लकड़ी के बुरादे या छिलकों द्वारा निर्मित पटि्टयों का प्रयोग किया जाता है। इन तापरोधी पदार्थों से बनी हुई सतह पर एस्फाल्ट कागज आदि की सतह चिपकाई जाती है ताकि मूल रूप से प्रयोग किया गया इन्सुलेशन नष्ट न हो सके। इसके लगाने से पानी द्वारा क्षति रोकी जा सकती है। इसके अलावा डेरी फैक्ट्रियों की दीवारें, छतें, फर्श, दरवाजे, खिड़कियाँ, रोशनदान आदि बड़ी सावधानी और अच्छी सामग्रियों या धातुओं से बनाए जाने चाहिए। साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि हवा का बदलाव हो सके, जिससे कि अन्दर से उत्पन्न गैसे, वाष्प युक्त हवाएँ आदि आसानी से रेचन के द्वारा बाहर की जा सकें। छोटी क्षमता के प्लांटों को तो प्राकृतिक संवातन (वेंटिलेशन) से ही गैस रहित किया जा सकता है किन्तु बड़े पैमाने वाले प्लांटों में प्रणोदित संचरण (कृत्रिम वेंटिलेशन) की सहायता लेनी पड़ती है।

दूध संसाधन के लिए दूध मात्रा की लगभग दस गुने या अधिक पानी की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए पानी बहाने और सुरक्षित रूप से दूर ले जाने की नालियां भी मजबूत और उचित क्षमता वाली होनी चाहिए। दूध घर में रोशनी का यथोचित प्रबन्ध, जो कि 100 से 300 लक्स (1 लक्स = एक मोमबती की रोशनी) के आसपास होती है, किया जाना चाहिए। प्रयोग में लाई गई भाप, ठंडा पानी, गर्म पानी तथा दाबपूर्ण हवा को ढोने वाली नालियाँ जहां तक सम्भव हो एक साथ न मिलने पाएं। इन पर किये गये रोधक के क्षतिग्रस्त होने पर तापमानों में कमी या अधिकता उत्पन्न होने लगती है जो कि आर्थिक रूप से हानिकारक होता है।

डेरी में उत्पन्न वहिस्राव को जिसमें कि घी, आर्गेनिक तथा अन्य पदार्थों के अंश पाये जाते हैं, सीधे किसी नदी, झील या नालों में डाल देने पर पानी के जीवों के लिये हानिकारक सिद्ध हो सकता है। अतः ऐसे पानी को उपचारित करके ही नदी और झीलों में गिराना उचित होगा। इन वहिस्राव को उपचारित करने के लिए बिभिन्न उन्नत प्रणालियों को अपनाया जा सकता है। ये प्रणालियां पानी की मात्रा, रसायनिक बोझ और साफ किये गए पानी की स्वच्छता आदि को ध्यान में रखकर ही चुनी जानी चाहिए।


Authors:
Ram Naresh
Senior Research Fellow,
Collage of Agricultural Engineering & Technology,
CCS Haryana Agricultural University, Hisar, Haryana.
Mb: 08950094020 ,
E-Mail : ramnaresh55@gmail.com



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