Hybrid seed production technology in Bittergourd करेले में संकर बीज उत्पादन तकनीक

संकर बीज (hybrid seed) उत्पादन फसल के लिए चयनित खेत स्वैछिक रूप से उगने वाले पौधों से मुक्त होना चाहिए तथा खेत की मिटटी बुलई दोमट या दोमट व उपजाऊ होनी चाहिए। खेत समतल तथा उसमें जल निकास व्यवस्ाथा के साथ सिचाई की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए।
जलवायू climate: करेले को गर्मी एवं वर्षा दोनो मौसम में उगाया जा सकता है। परन्तु संकर बीज उत्पादन के लिए शुष्क, गर्म जलवायु (dry hot climate) अच्छी होती है क्योकि तब कीडों व रोगों का प्रकोप कम होता है। फसल में अच्छी बढवार,पुष्पन व फलन के लिए 25 से 35 डिग्री सें.ग्रेड का ताप अच्छा होता है। बीजों के जमाव के लिए 22 से 25 डिग्री सें.ग्रेड का ताप अच्छा होता है
बीज स्रोत Seed source: पैतृक जननो के बीज सम्बधित कृषि अनुसंधान संस्थान या कृषि विश्वविद्यालय से ही लेने चाहिए।
पृथक्करण दूरी Isolation: संकर बीज फसल खेत करेले की अन्य किस्मों,उक्त संकर की व्यवसायिक फसल तथा करेले की अन्य प्रजातियों जैसे वालसम ऐपल, ककरोल और जंगली करेले से न्यूनतम 1000 मी. की दूरी होनी चाहिए। अगर नर व मादा पैतृकों की बुवाई अलग अलग खन्डो में की गयी है तो उनके बीच कम से कम 5 मी. की दूरी आवश्यक है ।
पुष्प जैविकी Flowral morphology: करेला उभयलिंगाश्री पौधा है, नर व मादा फूल एक ही पौधे पर लगते हैं। फूलों का रंग पीला तथा नर फूलों के डंठल मादा फूलो से लम्बे होते हैं। मादा फूलों में नीचे करेले जैसी आकृतिया होती है। नर फूलों की संख्या मादा फूलो की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। पुष्पन सुबह 5.30 से 9.30 बजे तक होता है तथा इसी समय मादा फूल में वर्तिकाग्र अत्यन्त सुग्राही होता है। नर फूलों में परागण प्रात: 7.30 तक प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।फूल मात्र एक दिन के लिए ही खिलतें हैं।
खाद एवं उर्वरक Fertilizer: 25-30 टन गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद को बुवाई से 25-30 दिन पहले एक हैकटेयर खेत में मिलाना चाहिए। बुवाई से पहले नालियों में 50 किलो डीएपी, 50 किलो म्यूरेट आफ पोटास का मिश्रण प्रति हैक्टेयर के हिसाब से (500 ग्राम प्रति थमला) मिलाऐं। 30 किलो यूरिया बुवाई के 20-25 दिन बाद व 30 किलो यूरिया 50-55 दिन बाद पुष्पन व फलन के समय डालना चाहिए। यूरिया सांय काल मे जब खेत मे अच्छी नमी हो तब ही डालना चाहिए।
बीज की मात्रा व बुआई Seed rate & sowing: मादा पैतृक के लिए 1.75 किग्रा तथा नर पैतृक के लिए 0.5 किग्रा बीज प्रति एकड पर्याप्त होता है। पौध तैयार करके बीज फसल लगाने पर बीज मात्रा मे कमी की जा सकती है। बुवाई पूर्व बीजों को बाविस्टीन (2 ग्रा प्रति किलो बीज दर से) के घोल में 18-24 घंटे तक भिगोये तथा बुवाई के पहले निकालकर छाया में सुखा लेना चाहिए। बीज 2 से 3 इंच की गहराई पर करना चाहिए। बुआई दो प्रकार से की जाती है (1) सीधे बीज द्वारा (2) पौध रोपण द्वारा
दक्षिण भारत में करेले की बीज फसल की बुवाई सीधे बीजों द्वारा की जाती है। उत्तर भारत मे सीधे बुवाई मार्च के पहले पखवाडे में ही सम्भव है परन्तु मार्च में बोई गयी फसल मे कम बीज उपज के कारण बीज उत्पादन लाभकारी नही होता। इस लिए यहां पौध तैयार करके फरवरी के प्रथम सप्ताह में रोपाई करके बीज फसल उगाना अच्छा रहता है। संकर बीज उत्पादन के लिए बुवाई/रोपाई नालियों में केवल एक तरु करनी चाहिए तथा नालिया बनाते समय क्षेत्र विशेष में हवा की दिशा का ध्यान मे रखना चाहिए। उत्तर भारत में बुवाई/रोपाई नालियों में मेंढो पर पूर्व दिशा में करना चाहिए तथा नालिया उत्तर दक्षिण दिशा मे बनाते हैं।
फसल अंतरण Seperation: नाली से नाली की दूरी 2 मी., पौधे से पौधे की दूरी 50 सें.मी. तथा नाली की मेढों की ऊचाई 50 सेंमी रखनी चाहिए। नालीयां समतल खेत में दोनो तरफ मिट्टी चढाकर बनाऐं। खेत मे 1/5 भाग मे नर पैतृक तथा 4/5 भाग में मादा पैतृक की बुआई अलग अलग खण्डो में करनी चाहिए।
परागण विधि Pollination: करेला उभयलिंगाश्री होने के कारण इसमें संकर बीज उत्पादन के लिए हाथ द्वारा परागण करना ही उचित एवं प्रचलित है। इस विधि में मादा पैतृको में से नर फूलों को खिलने से पहले ही तोडदिया जाता है। साथ ही मादा फूलों को भी खिलने से दिन पहले सांय के समय बटर पेपर बैग (7.5x12 से.मी) में बंद कर देते हैं। लिफाफे में हवा आने जाने के लिए 5-6 छिद्र अवश्य करें। इसी प्रकार नर पैतृक पौधो में नर फूलों को भी बटर पेपर बैग या नमी ना सोखने वाली रूई से अच्छी तरह ढक देते हैं। अगले दिन नर खंड से नर फूलों को तोडकर इक्कटठा कर ले तथा मादा पैतृक में मादा फूल का लिफाफा हटाकर हाथ से परागकोष को रगडकर या परागकणों को इक्कटठा करके ब्रुश से परागण करें। परागण के तुरन्त बाद मादा फूलों को दोबारा ढक दें। मादा फूलों का बटर पेपर बैग 8-10 दिन बाद ही हटायें। एक पौधे पर इस प्रकार से 4-5 फल तैयार करें। अधिक फल बनने से फल पूरी तरह विकसित नही हो पाते।
फसल देखभाल Crop care: संकर बीज उत्पादन खेत का चार अवस्था में निरीक्षण करना चाहिए। प्रथम पुष्पन से पूर्व, जिसमें मादा एवं नर पैतृकों के बढवार, पत्ते की आकृति रंग व शीर्ष भाग पर रोये आदि को देखकर अवांछनीय पौधो को निकाल दे। दूसरी व तीसरी बार पुष्पीय लक्षणों एवं फलों के आधार पर अवांछनीय पौधों को पहचानकर निकालते हैं। चौथी बार फलों की तुडाई व पकने पर फलों के विकास, रंग आकार एवं रोग आदि की स्थिति को ध्यान में रखकर अवांछनीय पौधों व फलों को हटाऐ।
फल तुडाई व बीज निकालना Harvesting: फल परागण के 28 से 30 दिन बाद पकने लगते हैं। पकने पर फल चमकीले नारंगी रंग के हो जाते हैं। फल को तभी तोडना चाहिए जब फल का कम से कम दो तिहाई भाग नारंगी रंग का हो जाये क्योकि कम पके फल में बीज अल्प विकसीत रहते हैं। अधिक पकने पर फल फट जाते हैं और बीज का नुकसान होता है और कभी कभी पक्षियों द्वारा भी बीज का नुकसान हो जाता है। पके फलो को दो भागों में फाडकर हाथ से बीजों को निकाले तथा रेत या साफ मिट्टी से मसलकर बीजों से चिपचिपी झिल्ली को हटा देना चाहिए। इसके बाद बीजों को साफ बहते पानी में धुलाई करके तेज धूप में सुखाना चाहिए।
बीज उपज Seed production: उत्तर भारत में दक्षिण भारत की अपेक्षा बीज उपज बहुत कम होती है। दिल्ली में 15 से 18 बीज प्रति फल जबकि रानीबेनूर में औसत 25 से 28 बीज प्रति फल मिल जाते हैं। इसी प्रकार दिल्ली में 4 से 6 फल प्रति पौधा जबकि रानीबेनूर में औसत 15 से 18 फल प्रति पौधा मिलते हैं। उत्तर भारत में 30-45 किग्रा तथा दक्षिण भारत में 150-180 किग्रा बीज प्रति एकड उपज मिलती है। 1000 बीजों का भार 150 से 170 ग्राम होता है
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डा.आनन्द पाल सिहं एवं इकबाल सिहं,तकनिकी अधिकारी,वैजिटेबल डिविजन, भा.क्.अ.सं., नई दिल्ली-12
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