कद्दू जातीय सब्जीयों की बीज फसलों में रोग नियंत्रण
बीज उत्पादन फसल में विभिन्न प्रकार के रोगों का आक्रमण होता है। जिससे पौधों की बढवार, पुष्पन,फलन, फलों के विकास एवं पकने पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है। कद्दू जातीय सब्जी फसलों में बीज उत्पादन के दौरान होन वाले प्रमुख रोगों का नियंत्रण निम्न प्रकार से किया जा सकता है।
चुर्णिल आसिता:
इस रोग के शुरू में पत्ती की नीचली सतह पर छोटे छोटे गोलाकार सफेद रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। रोग के अधिक प्रकोप होने पर धब्बे आपस में मिलकर पत्ती की ऊपरी सतह, तनो व डंठल पर भी फैल जाते हैं। पत्तियां भूरी हो जाती हैं तथा सिकुडकर गिर जाती हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए कार्बन्डेजिम (0.1% घोल) का 10 दिन के अंतराल पर छिडकाव करें या कैराथेन की 6ग्रा. मात्रा को 10 ली. पानी में घोलकर छिडकाव करें या घुलनशील गंधक(सल्फर) 0.2% धोल का रोग के लक्षण दिखाई पडते ही, 10 दिन के अंतराल पर, 2-3 बार छिडकाव करें।
मृदुल आसिता :
इस रोग का आक्रमण अधिक आद्रता वाले स्थानो, विशेषकर जहां गर्मी में वर्षा होती है, में अधिक होता है। इस रोग से ग्रस्त पौधों की पत्तियों की ऊपरी सतह पर कोणीय आकार के पीले धब्बे बन जाते है और पत्तियों की निचली सतहपर बैंगनी रंग के स्पोर्स दिखाई देते हैं अधिक प्रकोप होने पर पौधों के पत्ते झड जाते हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए रिडोमिल एम जैड (0.3% घोल) के तीन छिडकाव या डाईथेन एम -45 के 0.2% धोल के पांच छिडकाव 10 दिन के अंतराल पर करने चाहिए।
उकटा रोग:
इस रोग से ग्रस्त होने पर नवोदमिद पौधे मुरझाकर गिर जाते हैं तथा पुराने पौधे रोग होने पर अचानक सूख जाते हैं। रोग ग्रस्त पौधों के कोलर क्षेत्र के वैसकुलर बंडल पीले या भूरे हो जाते हैं। इस रोग का नियंत्रण कठिन होता है क्योकि यह भूमिगत रोग है इस रोग से बचाव के लिए पौधो को कैप्टान (0.2%) के घोल से अच्छी प्रकार भिगोना चाहिऐ।
एन्थक्नोज:
आरम्भ में इस रोग से ग्रस्त पौधों की पत्तियों, तनो व डंठलों पर छोटे पीले रंग या जल भरे धब्बे दिखाई देते हैं जो बाद में मिलकर बडे धब्बे बन जाते हैं। लौकी व तरबूज में यह रोग फलों पर भी लगता है। फलों पर खुरदरे, गोलाकार, सिकुडे हुए जलभरे धब्बे बन जाते हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए मैनकोजैब (0.25% घोल) या कार्बन्डेजिम (0.1% घोल) का 15 दिन के अंतराल पर छिडकाव करें
विषाणु रोग:
विषाणु रोग का फैलाव चेपा या श्वेत मक्खी द्वारा होता है। रोग ग्रस्त पौधों की पत्तियां सिकुड जाती है या उनमें काले रंग के धब्बे या पत्तियों की सिराएं पीले रंग की हो जाती हैं।
रोग की अधिकता में पौधो की बढवार रूक जाती है और फलन भी नही होता है।
इस रोग से बचाव के लिए बुआई के समय ही कार्बोफयूरान 1.5 कि./है. की दर से थमलो में मिलाना चाहिए। पौधे में आरम्भिक लक्षण दिख्ाते ही उसे उखाडकर नष्ट कर देना चाहिये। रोग के फैलाव को रोकने के लिए डाईमिथोयेट या फोसफामिडोन (0.05%) के घोल का छिडकाव 10 दिन के अंतराल पर करना चाहिए।
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डा. बी.एस.तोमर, वरिष्ठ वैज्ञानिक, बीज उतपादन ईकाई, भा.क्.अ.सं., नई दिल्ली-12
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