Major Disease of Potato and their management

शरद शराफ

आलू सब्जियों की मुख्य फसल है इसकी खेती भारत मे प्रमुख फसल के रूप से ली जाती है परन्तु रोगों के कारण इसकी खेती प्रभावीत हो रही हैं किसानो को 60-70 प्रतिशत तक नुकसान उठाना पड़ रहा है इस तरह के नुकसान से बचने के लिए की किसानों को आलू के प्रमुख रोगों एवं उनके उचित प्रबंधन की जानकारी आवश्यक है इस लेख का प्रमुख उद्देश्य किसानों को आलू के प्रमुख रोगों के लक्षणों कि जानकारी देना हैं ताकी वे उसे पहचान कर उस रोग का उचित प्रबंधन कर सकें।

अगेती अंगमारी या अर्ली ब्लाइट (Early Blight)

यह रोंग फफूंद की वजह से होता है। इस रोग के प्रमुख लक्षण नीचे की पत्तियों पर हल्के भरे रंग के छोटे- छोटे पूरी तरह बिखरे हुए धब्बों से होता हैं। जो अनुकूल मौंसम पाकर पत्तियों पर फैलने लगते है। जिससे पत्तियॉ नष्ट हो जाती है । इस बिमारी के लक्षण आलू मे भी दिखते हैं भूरे रंग के धब्बें जो बाद मे फैंल जाते हैं जिससे आलू खाने योग्य नही रहता है।

प्रबंधन:-

- बुवाई से पूर्व खेत की सफाई कर पौंधों के अवशेशो को एकत्र कर जला देना चाहिए।
- आलू के कंदो को एगेलाल के 0.1 प्रतिशत घोल में 2 मिंनट तक डुबाकर उपचारित करके बोना चाहिए।
- रोग प्रतिरोधक जाति जैसे कुफरी जीवन, कुफरी सिंदूरी आदि।
- फाइटोलान, ब्लिटाक्स- 50 का 0.3 प्रतिशत 12 से 15 दिन के अन्तराल मेंं 3 बार छिड़काव करना चाहिए।

पछेती अंगमारी रोंग (Late Blight)

यह रोंग फफूंद की वजह से होता है। रोग के लक्षण सबसे पहले निचे की पत्तियों पर हल्कें हरे रंग के धब्बें दिखई देतें है जो जल्द ही भूरे रंग के हो जाते हैं। यह धब्बें अनियमित आकार के बनते हैं। जो अनुकूल मौसम पाकर बड़ी तीव्रता से फैलते हैं औंर पत्तियों को नश्ट कर देतें है। रोग की विशेश पहचान पत्तियों के किनारें और चोटी भाग का भूरा होकर झुलस जाना हैं। इस रोग के लक्षण कंदो पर भी दिखइ पड़ता है। जिससे उनका विगलन होने लगता हैं।

प्रबंधन:-

- बुवाई के पूर्व खोद के लिकाले गए रोगी कंदो को जलाकर नश्ट कर देना चाहिए।
- प्रमाणीत बीज का प्रयोग किया जाना चाहिए ।
- रोग प्रतिरोधी जातीयों का चयन किया जाना चाहिए जैसे कुफरी अंलकार, कुफरी खासी गोरी, कुफरी ज्योती, आदि।
- बोर्डो मिश्रण 4:4:50, कॉपर ऑक्सी क्लोराइड का 0.3 प्रतिशत का छिड़काव 12-15 दिन के अन्तराल मे तीन बार किया जाना चाहिए।

भूरा विगलन रोग एवं जीवाणु म्लानी रोग (Brown Rust)

यह जिवाणु जनित रोग हैं। रोग ग्रसित पौधे सामान्य पौधो से बौने होते है। जो कुछ ही समय मे हरे के हरे ही मुरझा जाते है। प्रभावित पौधों की जड़ो को काटकर कॉच के गिलास मे साफ पानी में रखने से जीवाणु रिसाव स्पश्ट देखा जा सकता हैं। अगर इन पौधो मे कंद बनता है तो काटने पर एक भूरा धेरा देखा जा सकता हैं।

प्रबंधन:-

- गृिष्मकालिन गहरी जुताई किया जाना चाहिए ।
- प्रमाणीत बीज का प्रयोग किया जाना चाहिए ।
- बुवाई के पूर्व खोद के लिकाले गए रोगी कंदो को जलाकर नश्ट कर देना चाहिए।
- कंद लगाते समय 4-5 किलो ग्राम प्रति एकड़ की दर से ब्लीचिंग पाउडर उर्वरक के साथ कुंड मे मिलायें।
- रोग दिखई देने पर अमोनियम सल्फेट के रूप मे देना चाहिए जो रोग जनक पर विपरीत प्रभाव डालते हैं।

काला मस्सा रोग (Black wart disease)

यह रोंग फफूंद की वजह से होता है। इस रोग के प्रमुख लक्षण पौधो कंदो पर पर दिखाई पड़ता हैं। जिसमे भूरे से काले रंग के मस्सो की तरह उभार दिखाई देते है जिससे कंद खाने योग्य नही रह जाता हैं।

प्रबंधन:-

- प्रमाणीत बीज का प्रयोग किया जाना चाहिए ।
- बुवाई के पूर्व खोद के लिकाले गए रोगी कंदो को जलाकर नश्ट कर देना चाहिए।
- प्रतिरोधक जातियो का प्रयोग किया जाना चाहिए।

समान्य स्कैब या स्कैब रोग

रोंग फफूंद की वजह से होता है। इस रोग के प्रमुख लक्षण पौधो कंदो पर पर दिखाई पड़ता हैं। कंदो मे हल्के भूरे रंग के दिखई फोड़े के समान स्केब पड़ते है जो की कुछ उभरे और कुछ गहरे स्केब दिखई पड़ते है जिसके कारण कंद खने योग्य नही रह जाते।

स्कैब रोग

प्रबंधन:-

- प्रमाणीत बीज का प्रयोग किया जाना चाहिए ।
- बुवाई के पूर्व खोद के लिकाले गए रोगी कंदो को जलाकर नश्ट कर देना चाहिए।
- बीज को आरगेनोमरक्यूरीयल जैसे इमेशान या एगालाल धोल के 0.25 प्रतिशत धोल मे 5 मिनट तक उपचारीत करें।


लेखक:
शरद शराफ,
काशी हिन्दू विश्वविघालय वाराणसी

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