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गेहूं में खरपतवारों की रोकथाम को आधुनिक युग में खरपतवार निंयत्रण के बजाय खरपतवार प्रंबधन के नाम से ज्यादा जाना जाता है विधियां वही है केवल धारणा बदली है।

गेहूं में खरपतवार प्रंबधन की आधुनिक विधियां

  • खरपतवार प्रबंधन के निरोधी उपाय
  • शस्य विधियों द्वारा खरतवार प्रंबधन
  • रासायनिक खरपतवार निंयत्रण

 निरोधी उपायः

  • उत्तम क्वालिटी के खरपतवार मुक्त बीजो का प्रयोग करें ताकि गेहूं की बुआई के साथ खरपतवारों की बुआई न हों।
  • अच्छी तरह गली सड़ी गोबर की खाद का ही प्रयोग करें कच्ची गोबर की खाद में खरपतवार के बीज जीवित रहते है।
  • क्योंकि पशु चारे के साथ जो खरतवारों के बीज होते है वह बिना गले बाहर आ जाते है। यह बीज कच्ची खाद के साथ खेतों में प्रवेश कर जाते है। इस लिए अच्छी गली सड़ी खाद को ही खेतों में डालें।
  • सिंचाई की नालियों, गेहूं के खेतों की मेडों को साफ रखें ताकि खरपतवारों के बीज व वनस्पति भाग सिंचाई के पानी के साथ मुख्य खेत में प्रवेश न कर सकें।
  • खरपतवार के पौधों को बीज बनने से पहले ही खेतों से बाहर निकाल दें। यदि खरपतवरों के बीज खेत में ही झड़ गए तो मिट्टी में खरपतवरों का बैंक बढ़ेगा।
  • गेहूं के खेतों में मडूंसी गेहूं में लगभग 20 दिन पहले पक जाती है। इसके बीज गेहूं में मिश्रित न हो इसके लिए इसे बीज पकने से पहले खेतों से निकाल दें।
  • गेहूं की कम्बाईन से कटाई या थ्रैशर से झड़ाई करने से पहले मशीन को पूरी तरह साफ कर लें इससे खरपतवरों के बीज वितरण को रोका जा सकता है
  • भण्डारित गेहूं में खरपतवरों के बीज अगर मिश्रित होतें हैं तो दोनों की नमी में फर्क होने की वजह से फफूंद /मोल्डस का खतरा बढ़ जाता है ।

 शस्य विधियों द्वारा खरपतवार प्रंबधन

गेहूं की ऐसी किस्म का चुनाव करे जिसकी बढ़त उद्यमी हो जो शीघ्रता से जमीन को ढक ले और प्रारम्भिक अवस्था में उगने वालों खरपतवरों को अच्छी प्रतिस्पर्धा दे ।

गेहूं के पौधों का समान जमाव व उद्यमी बढ़वार की वजह से खरपतवरों की बढ़वार को कम स्थान मिलता है । इसके लिए निम्नलिखित बातो का विशेष ध्यान रखें ।

  • उत्तम क्वालिटी के बीज
  • बीज उपचार
  • उचित खेत की तैयारी
  • उचित नमी
  • उचित बीज मात्रा
  • उचित गहराई पर बीज की बिजाई
  • उचित विधि द्वारा बुआई

गेहूं की फसल के साथ उगले वाले खरपतवार अधिकतर मौसमी है।जिस काजमाव निश्चित तापमान पर ही होता है जैसे मडूंसी का जमाव आमतौर पर नवम्बर के आखिरी सप्ताह से शुरू होता है। कुछ खरपतवार गेहूं के बीजों के साथ साथ ही अंकुरित हो जाते है कुछ खरपतवार पहली सिंचाई के बाद ही अंकुरित होते है। इसलिए गेहूं की बुआई को नवम्बर 15 तक पूरी कर लें क्यूंकि इस समय का तापमान मडूंसी के जमाव के अनुकुल नहीं होता। जिसे मडूंसी का प्रकोप कम रहता है ।

फसल चक्र अपनाएं विभिन्न प्राकर की फसलों को फसल चक्र मे शामिल करने से खरपतवरों का जीवन चक्र टूटता है। फसलों के बदलने से उनकी शस्य क्रियायें बदलती है उनमें प्रयोग होने वाले खरपतवारनाशी बदलते है। उदाहरणतः धान गेहूं फसल चक्र मे बरसीम, मटर, सब्जियां, तारिया, सुरजमुखी जैसी फसलों को गेहूं के बदले में उगाकर मडूंसी के प्रकाप व खरपतवारनाशी की प्रतिरोधी क्षमता के विकसित होने से बचा जा सकता है। बुनियादी खाद को बीज से 2-3 सै0मी0 गहरा डालें। जीरों टीलेज़ से गेहूं की बिजाई करने से गेहूं का जमाव जल्दी होता है और मिट्टी की उपरी सतह को न छोड़ने की वजह से मडूंसी का जमाव कम होता है ।

स्टेलबेड विधि से खाली खेत की सिंचाई करके खरपतवारों को जमने का मौका दिया जाता है। इन उगते हुए खरपतवारों को जुताई करके या नान सलेक्टीव खरपतवारनाशी जैसे गलायफोसेट का 1 प्रतिशत घोल स्प्रे कर के खत्म किया जा सकता है फिर इस खरपतवार मुक्त खेत में गेहूं की बिजाई की जा सकती हे ।

रासायनिक तत्वों के पोषण व पानी का विभाजन खरपतवार व फसल में होता है इसलिए खाद का प्रयोग खरपतवार निंयत्रण के बाद करें ताकि इनका लाभ गेहूं को मिले न की खरपतवरों को।

रासायनिक खरपतवार निंयत्रण

खरपतवारनाषी आधुनिक कृषि विज्ञान की परम आवश्यकता है। खरपतवारनाशी द्वारा खरपतवार प्रबंधन करना मज़दूरों द्वारा यंत्रो द्वारा शारीरिक शक्ति से अधिक मितव्ययी है ।

गेहूं में खरपतवारनाशी का प्रयोग दो तरह से किया जा सकता है

  • फसल - खरपतवार जमने से पहले (प्री एमरजेन्स)
  • खरपतवार जब 2-4 पत्ती अवस्था में हो (पोस्ट एमरजेन्स)

प्री एमरजेन्स खरपतवार नाशी

   गेहूं बिजाई के तुरन्त बाद पैण्डीमैथलीन 3.3 लीटर प्रति है0 की दर से 500 लीटर पानी में घोल कर स्प्रे करने से उगती हुई खरपतवारों का नाश किया जा सकता है। पैन्डीमेथलीन से शुरूआती पहले फसल की मडूंसी व बाथू का निंयत्रण किया जा सकता है ।

पोस्ट एमरजेन्स खरपतवार नाशी

  • गेहूं मे पोस्ट एमरजेन्स खरपतवारनाशी का प्रयोग पहली सिंचाई (बुआई के 21 दिन) के 7-10 दिन बाद जब खेतों में पैर टिकने लगे और खरपतवार 2-4 पत्ती अवस्था में हो तभी किया जाता हे ।
  • क्लोडीनापोप तो पत्तियों द्वारा ही सोखा जाता है इसलिए स्प्रे के समय गेहू की फसल में खरपतवार 2-4 पत्ती अवस्था में होने से ही स्प्रे का लाभ मिलता है ।
  • प्रायः यह भी देखा गया है कि गेहूं की इस अवस्था में तापमान बहुत कम होता है कम तापमान में खरपतवार पत्ते खरपतवारनाशी को अपने अन्दर अवशोषित करने की क्षमता नहीं रखते जिस कारण खरपतवारनाशी का लाथ नहीं मिलता ।

गेहूं में खरपतवार नाशियों का प्रयोग

खरपतवारनाशी कावैज्ञानिकनाम

खरपतवारनाशी काव्यपारिकनाम

उत्पाद/है0

प्रयोगकासमय

दिनबाद

खरपतवारप्रकारकेलिएसिफारिश

मेटस्लफयूरोन मिथाइल

एलग्रिप

20 ग्राम

बुआई के 35-40

चौड़ी पत्ती

पैन्डीमेथिलीन

स्टाम्प

3 लीटर

बुआई के तुरन्त बाद

चौड़ी पत्ती व घास जाति

सल्फोसल्फयूरोन

लीडर फतेह

33 ग्राम

बुआई के 35-40

चौड़ी पत्ती व घास जाति

कारफेट्राजोन

ऐम

50 ग्राम

बुआई के 35-40

चौड़ी पत्ती

क्लोडीनोपोप

टोपिक

400 ग्राम

बुआई के 35-40

घास कुल

फिनोक्सोप्रोम

प्यूमासुपर

1000 ग्राम

बुआई के 35-40

घास कुल

सल्फोस्लफयूरोन

लीडर

1250 ग्राम

बुआई के 35-40

घास व चौडी पत्ती

पीनोक्साडीम

एक्सिल

1000 ग्राम

बुआई के 35-40

घास कुल

 

गेहूं में खरपतवार प्रबंधन एक नज़र से

 

खरपतवारनाशी

मात्रा

टिप्पणी

मडूंसी

क्लोडीनोपोप (टोपिक)

पैन्डीमेथिलीन (स्टाम्प)

400 ग्राम

3330 ग्राम

35-40 दिन पष्चात

बुआई के एक दिन बाद

बाथू

पैन्डीमेथिलीन (स्टाम्प)

मेटस्लफयूरोन मिथाइल

3330 ग्राम

20   ग्राम

बुआई के एक दिन बाद

 

जंगली जई

कारफेट्राजोन (ऐम)

50 ग्रा

बुआई के 30-35 दिन पश्चात

जंगली पालक

मेटस्लफयूरोन मिथाइल

 

20 ग्राम

30-35 दिन पश्चात

गोबी घास

(मालवा पखीफलोरा )

कारफेट्राजोन (ऐम)

50 ग्राम

30-35 दिन पश्चात

कंडेली

मेटस्लफयूरोन इथाइल ;एलग्रिम)

कारफेट्राजोन (ऐम)

20 ग्राम

50 ग्राम

30-35 दिन पश्चात

हिरणखुरी

मेटस्लफयूरोन इथाइल (एलग्रिप)

कारफेट्राजोन (ऐम)

20 ग्राम

50 ग्राम

30-35 दिन पश्चात

 मटरी (जंगली मटर)

मेटस्लफयूरोन इथाइल (एलग्रिम)

कारफेट्राजोन (ऐम)

20 ग्राम

50 ग्राम

30-35 दिन पश्चात

दूधी

कारफेट्राजोन (ऐम)

50 ग्राम

30-35 दिन पश्चात

पीट पापड़ा

(कोरनोपस डीडेमस)

मेटस्लफयूरोन इथाइल एलग्रिम)

कारफेट्राजोन (ऐम)

20 ग्राम

50 ग्राम

30-35 दिन पश्चात

500 लीटर पानी प्रति है0

 रसायनिक खरपतवार प्रबंधन के लिए कुछ ध्यान योग्य बाते:

  • खरपतवार के प्रकार व संख्या को ध्यान में रख कर खरपतवारनाशी का चुनाव करें
  • स्थिति का मूल्यांकन करें
  • खरपतवार व फसल की अवस्था का ध्यान करें ।
  • रसायनिक खरपतवारनाशी (उगने से पहले या उगने के बाद का प्रयोग करे जब मिट्टी में नमी हो ।
  • खरपतवार उगने के बाद के (पोस्ट एमरजेन्स) के खरपतवारनाशी का प्रयोग तभी करे जब खरपतवार 2 से 4 पत्ती अवस्था में हो
  • खरपतवारनाशी का प्रयोग करते समय फलेट फैन नोजल का प्रयोग करें ।
  • खरपतवार उगने के बाद खरपतवारनाशी (पोस्ट एमरजेन्स) को रेत, यूरिया या मिट्टी के साथ न मिलाएं ।
  • सल्फोस्फयूरोन को मिश्रित फसल जैसे गेहूं, सरसों या गेहूं अन्य फसलों में प्रयोग न करें।
  • खरपतवारनाशी चक्र का अनुसरण करें ताकि खरपतवारों की प्रतिरोधी क्षमता विकसित न हो सके ।
  • मडूंसी की रोकथाम के लिए स्प्रे किए गए खरपतवारनाशी से घास कुल जाति के खरपतवारों का नियंत्रण हो जाता है परन्तु चौड़ी पत्ती के खरपतवारों जैसे जंगली पालक, मालवा या दूधी जैसे खरपतवारों में बढ़ोतरी हो रही है। मिश्रित खरपतवारों के निंयत्रण के लिए पीनोक्साडीम़+ कारफेट्राजोन 1000+50 ग्राम /है0  की दर से बुआई के 35-40 दिन पश्चात स्प्रे करें

Authors:

निशा चौपड़ा, नीलम कुमार चौपड़ा एवं एस.एस.अटवाल

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय स्टेशन, करनाल