राजस्थान में विभिन्न प्रकार के शुष्क क्षेत्रीय फल उगाये जाते हैं। जिनमें अनेक प्रकार के रोग लगते हैं जिससे इन फलों की गुणवत्ता तथा उपज दोनों प्रभावित होती हैं। इसलिए इन फलो के मुख्य रोगो का निदान करना अत्यंत आवश्यक है, जो निम्न प्रकार है :

अ) बेर के मुख्य रोग

1. छाछया रोग

इस रोग में सबसे पहले पौधों की टहनियों, पत्तियों एवं फलों पर सफ़ेद चूर्ण जैसी फफूंद  दिखायी देती है जो बाद में पूरे फल पर फैल जाती है। रोग संक्रमित फल आकार में छोटे रह जाते हैं।  

निदान :

  1. इस रोग के लक्षण नजर आने पर 0.1 प्रतिशत केराथेन का 10-15 दिनों के अंतराल पर 3 बार छिड़काव करना चाहिए।
  2. केराथेन का एक छिड़काव सितम्बर माह के शुरू में रोग से बचाव के रूप में छिड़काव करना लाभप्रद होता है।
  3. इसके अतिरिक्त गंधक के चूर्ण का भुरकाव 15-20 दिनों के अंतराल पर करने से व्याधि नियंत्रित की जा सकती है।

2. आल्टरनेरिया फल सड़न:  

      इस रोग में गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। रोगी फल छोटे रह जाते हैं। रोग ग्रसित फल शीघ्र टूट कर गिर जाते हैं जिससे उपज में भारी कमी हो जाती हैं।

निदान :

  1. इसके नियंत्रण के लिए मेंकोजेब के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव लक्षण दिखाई देते ही करना चाहिए।
  2. नीचे गिरे रोग ग्रसित फलों को नष्ट कर देना चाहिए।                  


3.
बेर में काला पत्‍ती धब्‍बा रोग

यह रोग अक्तूबर से दिसंबर माह में ज्यादा दिखाई देता है। पत्तियों की निचली सतह पर छोटे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं जो बाद में काले रंग के हो जाते हैं।

नियंत्रण/ उपचार-

बेविस्‍टीन या डाईफोलेटॉन नामक दवा का 2 ग्रा. प्रति लीटर के हिसाब से छिड़काव करें।

आ)  आंवला की बीमारियाँ

1. रस्ट: 

यह एक कवक जनित (रीविनेलिया अंबलिका) रोग है। इस रोग से ग्रसित आंवले के फलों पर गोल अंडाकार लाल धब्बे बन जाते है।

निदान :

इसकी रोकथाम हेतु डाईथेन जेड-78 या मैन्कोजेब का 2 ग्रा. प्रति लिटर के हिसाब से 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करना चाहिए।

इ) आनार की बीमारियां         

जीवाणु नामक पत्ती धब्बा रोग- 

 इस रोग में पत्तियों की ऊपरी सतह पर छोटे गहरे रंग के धब्बे बनाते है। ग्रसित पत्तियां सड़ जाती है। जिससे पौधे की वृद्धि रुक जाती है।

 निदान-

  1. 200 से 500 पीपीएम का ट्रेट्रासाइक्लिन नामक दवा का छिड़काव करें।
  2. पूसामाइसिन (500 पीपीएम) और कॉपरऑक्‍सीक्‍लोराइड (2 ग्रा.) को मिलाकर तीन बार छिड़काव करें।          

ई ) खजूर के रोग       

1-अंत: भूस्तारी पौध गलन:

इसमे मुख्य प्ररोह में गलन की समस्या आती है जो फ्यूजेरियम या बोटरियोडिप्लोडिया जाति कवकों द्वारा होती है। इस रोग की संभावना अधिक नमी वाले क्षेत्र में ज्यादा पायी जाती है। 

निदान :

  1. स्वस्थ पौधे से ही सकर्स लेने चाहिए।
  2. इसके नियंत्रण के लिए सकर्स को बेविस्टीन (0.1-0.2 प्रतिशत) या रिडोमिल (0.15 प्रतिशत) कवकनाशी घोल में 2 से 5 मिनट तक डुबोना चाहिए।

2- ग्रेफियोला पत्ती धब्बा रोग:

रोग के शुरू में पत्ती की सतह पर हल्के भूरे धब्बे दिखाई देते हैं जो बाद में गहरे कत्थई या काले रंग के हो जाते हैं । रोग की तीब्र अवस्था में ये धब्बे पूरी पत्ती  पर बहुत अधिक संख्या में दिखायी देते हैं ।           

निदान :

  1. इसके नियंत्रण हेतु ग्रसित पत्तियों को काटकर नष्ट कर देना चाहिए।
  2. कॉपर ऑक्सी क्लोराइड अथवा ब्लूकोपर का 2 ग्राम/ लीटर पानी के घोल का 15 दिन के अंतराल पर से दो-तीन बार छिड़काव करें। उपर्युक्त ब्लूकोपर से भूमि की ड्रेंचिंग भी कर सकते है।

उ) नींबू के मुख्य रोग:

नींबू का कैंकर:

जीवाणु से होने वाले इस रोग से पत्तियों, टहनियों व फलों पर भूरे रंग के काटे, खुरदरे व कॉर्कनुमा धब्बे स्पष्ट दिखाई देते हैं।

निदान :

  1. इसके नियंत्रण हेतु नये बगीचे में सदैव रोग रहित नर्सरी के पौधे ही उपयोग में लायें।
  2. रोपण से पूर्व पौधों पर ब्लाईटॉक्स 0.3 प्रतिशत का छिड़काव करें।
  3. रोग के प्रकोप को रोकने के लिए कटाई-छंटाई के बाद स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 150 से 250 मिलीग्राम प्रति लीटर की दर से पानी में घोल बनाकर बीस दिन के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए। 

Authors

  S. K. Maheshwari, V. Karuppaiah, Suresh Kumar and Jagdish Prasad*

Central Institute for Arid Horticulture (CIAH), Bikaner, Rajasthan-334006 

* SKRAU, Bikaner Rajasthan-334 006 

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