भारत एक कृषि प्रधान देश है और इसकी कृषि-अर्थव्यवस्था विभिन्न फसलों के उत्पादन एवं उत्पादकता पर निर्भर करती हैं। कीटों, बिमारियों तथा खरपतवारों के प्रकोप से फसलों के उत्पादन में होने वाली क्षति को बचाकर खाद्यान्नों का उत्पादन अधिक बढ़ाया जा सकता है। फसलों में सर्वाधिक हानि खरपतवारों से होती हैं। खरपतवार (weeds) अवांछित पौधे होते है जिनकी एक निष्चित स्थान व समय पर आवश्‍यकता नहीं होती है और बिना बोए अपने आप उग जाते हैं। इसके कारण खरपतवारों व फसलों के बीच पौषक तत्वों, जल, स्थान, प्रकाश आदि के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती हैं। विभिन्न फसलों की उपज में केवल खरपतवारों के कारण होने वाली क्षति 15-70 प्रतिशत तक हैं। इसके अलावा कुछ जहरीले खरपतवार जैसे गाजर घास, धतुरा आदि न केवल फसल उत्पादन की गुणवत्ता को कम करते है बल्कि मनुष्यों और पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी खतरा उत्पन्न करते हैं। इसलिए, खरपतवारों का समय पर नियंत्रण बहुत जरूरी  हैं।  

राजस्थान में खरीफ (kharif) की फसलों में बाजरा, ज्वार व मक्का - अनाज वाली फसलें, ग्वार, कपास व गन्ना - नकदी फसलें, मूंगफली, सोयाबीन व तिल - तिलहनी फसलें, मूंग, मोठ, उड़द व लोबिया - दलहनी फसलें एवं चारे के लिए ज्वार, बाजरा व लोबिया को मुख्य रूप से उगाया जाता हैं।

आधुनिक कृषि में खरपतवार नियंत्रण मुख्य रूप से खरपतवार नाषक दवाइयों के इस्तेमाल से किया जाता है क्योंकि इसमें समय कम लगता है और इनका प्रयोग भी आसान हैं। जबकि इन रसायनों का पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता हैं। इसलिए खरपतवार नियंत्रण के दूसरे तरीकों को प्रयोग में लाना लम्बे समय तक ज्यादा उपयोगी एवं प्रभावी सिद्व होता हैं। इनमें मुख्य रूप से फसल चक्र होता है क्योंकि खरपतवार नियंत्रण में फसल चक्र सबसे ज्यादा उपयोगी सिद्व हुआ हैं। इसके अतिरिक्त ग्रीष्मकाल में गहरी जुताई, फसल की लाइनों में बुवाई, बुवाई का सही समय, अन्तः फसल प्रणाली, फसलों की सघन बिजाई, अन्धी-जुताई, प्रारम्भ में शीघ्र बढ़वार वाली फसलें, पा͝लीथीन अथवा भूसा आदि की पलवार, खरपतवार रहित शुद्ध बीज, पूर्ण सड़ी हुई गोबर की खाद का प्रयोग, समय पर निराई-गुड़ाई आदि उपायों द्वारा भी सफल खरपतवार प्रबन्ध किया जा सकता हैं। इन सभी उपायों के इस्तेमाल से हम अपनी फसल को खरपतवार रहित बना सकते है और अधिक फसल उत्पादकता प्राप्त कर सकते हैं। इस क्षैत्र की खरीफ मौसम की फसलों में पाए जाने वाले मुख्य खरपतवार व उनकी रोकथाम के उपाय निम्न प्रकार है:-

बाजरा:-

खरीफ की अन्य फसलों की तरह बाजरे में भी खरपतवार नियंत्रण अत्यन्त आवष्यक हैं। इसमें उगने वाले खरपतवारों में मुख्य रूप से चैkलाई, भंगड़ा, दुद्दी, जंगली जूट, हजारदाना, हुलहुल, लूनिया, स्ट्राइगा, मोथा व पथरी हैं।

बुवाई के 3 से 4 सप्ताह बाद निराई-गुड़ाई करें। पौधों के नजदीक गहरी गुड़ाई न करें ताकि जड़ों को नुकसान न हो अन्यथा पैदावार पर भी प्रतिकूल असर पडे़गा। ब्लेड हो या व्हील हो से भी गुड़ाई की जा सकती हैं। इन यंत्रों को बुवाई के 15 दिन बाद प्रयोग करना अच्छा रहता है क्योंकि खरपतवार छोटे और नियंत्रण में आने योग्य होते है। हर अच्छी वर्षा के बाद इन यंत्रों का प्रयोग नमी सरंक्षण में भी सहायता करता हैं। खरपतवारों की रोकथाम रसायनों द्वारा भी की जा सकती  हैं। बुवाई के तुरन्त बाद 1.0 कि.ग्रा. एट्राजीन सक्रिय तत्व (50 प्रतिशत घुलनषील पाउडर) प्रति हैक्टर 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़कने से खरपतवारों पर प्रभावकारी नियंत्रण पाया जा सकता हैं। अंकुरण से पहले 0.75 कि.ग्रा. पेंडिमेथालिन सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर की दर से उपयोग करके भी खरपतवार नियन्त्रण किया जा सकता हैं।

ज्वार व मक्का:-

ज्वार व मक्का में उगने वाले प्रमुख खरपतवार चैkलाई, भंगड़ा, स्ट्राइगा, मकड़ा, विस खपरा, हजारदाना, जंगली जूट, दुद्दी, हुलहुल, लूनिया, सैंजी इत्यादि हैं। यदि खेत की घास-फूस न निकाली जाए तो पैदावार में 50 प्रतिषत या इससे भी अधिक कमी हो सकती  हैं। बुवाई के 3-6 सप्ताह बाद खुरपी अथवा हैण्ड हो से गुड़ाई करनी चाहिए। इससे मृदा में वायु संचार भी बढ़ता हैं।

खरपतवारों की रोकथाम 0.75 - 1.0 कि.ग्रा. सिमाजीन या एट्राजीन (50 प्रतिशत घुलनषील पाऊडर) प्रति हैक्टर 600 - 800 लीटर पानी में मिलाकर बुवाई के तुरन्त बाद छिड़कने से की जा सकती हैं। वार्षिक घास कुल एवं कुछ चैkड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की रोकथाम हेतु पेंडिमेथालिन (30 प्रतिशत) 1.0 - 1.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर सक्रिय तत्व अकुंरण से पूर्व काम में लिया जा सकता हैं। रेतीली जमीनों में रसायनों की कम और मध्यम से भारी जमीनों में अधिक मात्रा का प्रयेाग करना चाहिए। चैkड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियन्त्रण के लिए 1.0  कि.ग्रा प्रति हैक्टर की दर से 2,4-क् का उपयोग बुवाई के 30-35 दिन बाद किया जा सकता हैं।

ग्वार:-

     यह एक बहुउपयोगी फसल है जिसे दाना, चारा, सब्जी, हरि खाद इत्यादि के लिए उगाया जाता हैं। दाने के भ्रूण में गम होने के कारण यह एक औद्योगिक फसल भी हैं। ग्वार में मुख्य रूप से दूब, मोथा, बरू, चैkलाई, जंगली जूट, हजारदाना, दुद्दी इत्यादि खरपतवार पाये जाते हैं। दलहनी फसलों की तरह खरपतवारों का प्रकोप ग्वार में भी कम होता हैं। फसल में पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के 20-25 दिन बाद कर देनी चाहिए। आवष्यकता होने पर एक और निराई-गुड़ाई की जा सकती हैं। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण हेतु फ्लूक्लोरेलिन या ट्रेफ्लान या ट्राईफ्लूरेलिन 0.75 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर की दर से फसल बुवाई से पूर्व खेत में छिड़ककर ऊपरी सतही मिट्टी में मिला देना चाहिए। वार्षिक घास कुल व चैkड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की रोकथाम हेतु पेंडिमेथालिन (30 प्रतिशत) 1.0 - 1.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर सक्रिय तत्व अकुंरण से पूर्व काम में लिया जा सकता हैं।

 कपास:-

कपास में मुख्य रूप से दूब, मोथा, बरू, सांठी, चैkलाई, जंगली जूट, पथरी आदि खरपतवार मुख्य रूप से पाये जाते हैं। कपास की प्रारम्भिक वृद्धि धीमी होती हैं। इस कारण खरपतवारों की समस्या अधिक रहती हैं। खरपतवारों के नियंत्रण के लिए 2-3 बार निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। पहली गुड़ाई खुरपी से पहली सिंचाई से पहले करें। बाद में हर सिंचाई या वर्षा के बाद समायोज्य कल्टीवेटर से करनी चाहिए। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए फ्लूक्लोरेलिन (1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर) का बुवाई से पहले सतही मिट्टी में मिलाकर अथवा पेंडिमेथालिन (1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर) या डाइयूरान (0.5 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर) का बुवाई के बाद लेकिन फसल अंकुरण से पहले प्रयोग करके प्रभावी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता हैं। बूटाक्लोर 1.0 - 1.25 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर बुवाई के 2-3 दिन के अन्दर प्रयोग करने से वार्षिक घास कुल व चैkड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का नियंत्रण अच्छा होता हैं।

गन्ना:-

गन्ना का अकुंरण लगभग 30 दिनों बाद होता हैं। धीमी गति से अकुंरण होने से खरपतवारों की वृद्वि को बढ़ावा मिलता हैं। इसलिए खरपतवार नियंत्रण बहुत आवष्यक हैं। गन्ना में प्रमुख रूप से दूब, बरू, मोथा, स्ट्राइगा, कांस इत्यादि खरपतवार पाये जाते हैं। अकुंरण धीरे होने से बुवाई के बाद व अंकुरण से पहले खेत में अंधी जुताई करके अथवा अचयनात्मक सम्पर्क खरपतवारनाषी यथा पेराक्वाट 0.50 कि.ग्रा. या डाईक्वाट 1.0-1.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर का छिड़काव करके खरपतवारों का फसल अकुंरण से पहले प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता हैं। खड़ी फसल में खरपतवारों की स्थिति के अनुसार 2 या 3 बार गुड़ाई करनी चाहिए। अकुंरण से पहले एट्राजीन 1.5 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर व अकुंरण के बाद 2, 4-क् या डेलापोन या पिक्लोरम इत्यादि प्रभावी खरपतवारनाषी हैं। जब पौधे 15 से.मी. ऊचाई प्राप्त कर ले तब ग्लाइफोसेट 1.0 कि.ग्रा. प्रति हैक्टर का दो लाइनों के बीच खरपतवारों पर सीधे छिड़काव करना चाहिए।

तिलहनी फसले:-

खरीफ मौसम में तिलहनी फसलों में मुख्यतः मूंगफली, सोयाबीन एवं तिल उगाई जाती हैं। इनके प्रमुख खरपतवार मोथा, दूब, बडी दुद्दी, पथरी, लेहसुआ, कनकुआ, हजारदाना हैं। तिलहनी फसलों में खरपतवार नियंत्रण के लिए खरपतवार नाषक दवाईयों की बजाए अन्तः कृषि क्रियाओं यानि कि निराई-गुड़ाई की सिफारिष की जाती हैं। मूंगफली व सोयाबीन की फसल में दो बार निराई-गुड़ाई करके प्रभावकारी ढंग से खरपतवारों पर नियंत्रण पाया जा सकता हैं। पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के 3 सप्ताह बाद करनी जरूरी हैं। तिल को विषुद्व रूप से बोने पर फसल में बुवाई के तीसरे सप्ताह के बाद घास-फूस हो हाथों से अच्छी तरह निकाल देना चाहिए। रासायनिक नियंत्रण हेतु फ्लूक्लोरेलिन 1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर बुवाई से पूर्व मिट्टी में मिलाकर अथवा पेडिंमेथालिन 1.0 कि.ग्रा. या एलाक्लोर 1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर का बुवाई के बाद लेकिन फसल के पौधे निकलने से पूर्व छिड़काव करके घास व चैkड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का नियंत्रण किया जा सकता हैं। इमाजेथापर का बुवाई के 1-2 दिनों बाद 100 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर छिड़काव करने से फसल खरपतवार रहित परिस्थितियों में अंकुरित होती हैं।

दलहनी फसले:-

     मूंग, मोठ, उड़द व लोबिया खरीफ मौसम की महत्वपूर्ण दलहनी फसलें हैं। इन फसलों में मुख्य रूप से बाथु, पथरी, चैkलाई, कनकुआ, चटरी, मकड़ा, मोथा, लेहसुआ, बरू, हजारदाना, मकोय आदि पाए जाते हैं  दलहनी फसलों को खरतववारों से मुक्त रखने के लिए बुवाई के 15-20 दिन बाद निराई-गुड़ाई करना अत्यंत आवष्यक हैं। दुसरी निराई-गुड़ाई आवष्यकतानुसार बुवाई के 35-40 दिन बाद करनी चाहिए। फ्लूक्लोरेलिन 45 ई.सी. नामक शाकनाषी की 2.5 लीटर मात्रा को 600-700 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के पहले प्रति हैक्टर की दर से भूमि पर छिड़काव करके मिट्टी में मिला देना चाहिए अथवा बुवाई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व पेंडिमेथालिन या एलाक्लोर शाकनाषी के 750 ग्राम सक्रिय तत्व को प्रति हैक्टेयर की दर से 600 लीटर पानी में छिड़काव करने पर सभी प्रकार के खरपतवारों को नष्ट किया जा सकता हैं। बुवाई के बाद किन्तु अंकुरण से पहले इमाजेथापर 100 ग्राम प्रति हैक्टर सक्रिय तत्व के प्रयोग से अधिकतर संकरी एवं चैkड़ी पत्ती वाले खरपतवारों पर अंकुरण से पहले प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता हैं।

चारे की फसलें:-

खरीफ मौसम में चारे की फसलों में मुख्य रूप से ज्वार, बाजरा व लोबिया उगाई जाती हैं। वैसे तो आम धारणा यह होती है कि चारें की फसलों में खरपतवार नियंत्रण की कोई जरूरत नहीं होती क्योंकि खरपतवार से भी चारा मिलता हैं। लेकिन खरपतवारों की उपस्थिति से फसल पर बहुत बुरा असर पड़ता हैं। क्योंकि इससे एक तो फसल की पैदावार कम होती है और दूसरा गुणवत्ता में कमी आती है और पोषक तत्वों की कमी के कारण स्वादिष्ट चारा भी नहीं मिल पाता।

चारे की फसलों में खरपतवार नाषक दवाईयों का इस्तेमाल नही किया जाता है क्योंकि इसका सीधा असर पषुओं पर पड़ता हैं। इसलिए खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई-गुड़ाई की सिफारिष की जाती हैं। ज्वार, बाजरा, लोबिया व ग्वार में फसल उगने के 15-20 दिन बाद खुरपी द्वारा एक बार निराई-गुड़ाई करना लाभदायक रहता हैं। इससे खरपतवार नियंत्रण के साथ-साथ मृदा संरक्षण व पौधों की बढ़वार में भी इजाफा होता हैं। संकर हाथी घास में हर कटाई के बाद तथा खाद देने से पहले फसल की हल से जुताई कर देनी चाहिए ताकि मिट्टी ढिली पड़ जाए और भूरभरी बन जाए। इससे घास-फूस भी खत्म हो जाती है और यह इस फसल के लिए काफी लाभदायक रहता हैं।


Authors:

बंशी लाल वर्मा 

विद्यावाचस्पति छात्र, कृषि अर्थशkस्त्र विभाग,

श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि महाविद्यालय, जोबनेर, जयपुर (राज.)-303 329

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