फलों का राजा आम हमारे देश का सबसे महत्वपूर्ण फल है। इसकी खेती उत्तर प्रदेश, बिहार, आन्ध्र प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु, उडीसा, महाराष्ट्र, और गुजरात में व्यापक स्तर पर की जाती है।

आम के लिए गहरी तथा अच्छी जल निकास वाली मिट्टी उपयुक्त मानी गई है। मिट्टी का पी.एच. मान ६.५ – ७.५ के बीच सही माना गया है। आम का सफल उत्पादन पोषण- जलवायु में किया जा सकता है। बौर, फूल आने की अवस्था में वर्षा होने या बदली छाई रहना आम की फ़सल के लिए नुकसानदेय होता है। यह पूरे देश में सफलतापूर्वक उगाया जाता है। आम पाले के लिए अति संवेदनशील है अतः बाग़ को आरम्भ के कुछ वर्षों में पाले से बचाना अति आवश्यक है।

आम पर लगने वाले नाशीजीव कीट

१. गुठली का घुन (स्टोन वीविल)

इस घुन की इल्ली आम की गुठली में छेद कर के घुस जाती है और उसके अन्दर अपना भोजन लेती रहती है। कुछ दिनों बाद ये गूदे में पहुँच जाती है और उसे क्षति पहुंचती है। कुछ देशों ने इस कीट से ग्रसित बाग़ से आम का आयात अपने यहाँ पूर्णरूप से प्रतिबंधित कर दिया है।    

रोकथाम:

इस कीड़े को नियंत्रित करना अत्यंत दुष्कर होता है इसलिए जो भी फल पेड़ से गिरे उसे तथा पेड़ की सूखी पत्तियों और शाखाओं को एकत्रित कर नष्ट कर देना चाहिए। इससे इस कीड़े की भी रोकथाम कुछ हद तक हो जाती है।

२. जाला कीट/टेन्ट केटरपिलर –

प्रारम्भिक अवस्था में केटरपिलर पट्टी की उपरी सतह को तेजी से खाता है उसके बाद पत्तियों का जाल या टेन्ट बनाकर उसके अन्दर छिपकर पत्तियों  को खाता रहता है |

रोकथाम:

१.एज़ाडीरेक्टिन ३००० पी पी एम ताकत का २ मिलि/लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें

२.जुलाई के महीने में कुइनोलफोस (०.०५%) या मोनोक्रोतोफोस  (०.०५%) का २-३ छिडकाव करें

३. दीमक कीट –

दीमक सामान्यतः सफ़ेद, चमकीले एवं मिट्टी के अन्दर जीवन यापन करने वाला कीट है| यह जड़ को खाता है तत्पश्चात सुरंग बनाकर ऊपर की ओर बढता जाता है| यह तने के ऊपर कीचड़ का जमाव करके अपने आप को सुरक्षित करता है|

 

रोकथाम:

१. तने के ऊपर कीचड़ की  गैलरी को हटाना चाहिए|

२. तने के ऊपर १.५% मेलाथियान का छिड़काव करे|

३. २ महीने बाद  पेड़ के तने को मोनोक्रोटोफोस (१ मिली /लीटर) से मिट्टी को ड्रेंच करे|

४. १० ग्राम/लीटर बिवेरिया बेसिआना  घोल का छिडकाव करे|

४. फुदका/भुनगा कीट –

यह कीट आम की फसल को सबसे अधिक क्षति पहुंचाते है| इस कीट की तीन जातियाँ आइडिओस्कोपस क्लैपिअलिअस, आइडिओस्कोपस नैतोचुलास , आइडिओस्कोपस एत्किन्सोइस हानिकारक है| लार्वा एवं व्यस्क कीट कोमल प्ररोह पत्तियों एवं पुष्पक्रमो का रस चूसकर हानि पहुचाते है| इसकी मादा १००-२०० तक अंडे नई पत्तियों एवं मुलायम प्ररोह में देती है, तथा इनका जीवन चक्र १२-२२ दिनों में पूरा हो जाता है| इसका प्रकोप जनवरी फरवरी से शुरू हो जाता है |    

रोकथाम :

1.बिवेरिया बेसिआना फफूंद का ०-५ % घोल का छिडकाव

2.नीम तेल ३००० पी पी एम @२ मि .ली./लीटर पानी का घोल का छिडकाव

3.कार्बोरिल ०.२ % या क़ुइनोल्फोस  ०.०६३  %  या  डाई मेठेओत  ०.०६ %

या मिथाइल ओदेमितान ०.०५ % घोल का छिडकाव 

4.परभक्षी कीट जैसे मेलाडा बोनेंसिस एवं क्राईसोपा मित्र कीट का संरक्षण करना

 

५. फल मक्खी (फ्रूट फ्लाई)

ओरिएण्टल फल मखी बैक्टोसेरा डॉरलेसिस आम के फल का भयानक कीट है और इसी कारण आम के निर्यात की समस्या हो गई है| इस कीट की सुड़ियाँ आम के अन्दर घुसकर गूदे को खाती है जिससे फल ख़राब हो जाता है|

रोकथाम: यौनगंध का घोल मिथाइल युजिनाल ०.०८ % एवं मेलाथियान ०.०८ % बनाकर डिब्बे में भरकर पेड़ो पर लटका देने से नर मखिया आकर्षित होकर मेलाथियान द्वारा नष्ट कर दी जाती है| एक हक्टेयर बाग में १० डिब्बे लटकाना चाहिए |

६. गा्ल मीज

इनके लार्वा बौर के डंठल पत्तियों, फूलों, और छोटे-छोटे फलों के अन्दर रह कर हानि पहुचाते हैं| इनके प्रभाव से फूल एवं फल नहीं लगते| फलों पर प्रभाव होने पर फल गिर जाते है| इनके लार्वा सफेद रंग के होते है, जो पूर्ण विकसित होने पर भूमि में प्यूपा/कोसा में बदल जाते है |

रोकथाम:

इनके रोकथाम के लिए गर्मियों में गहरी जुताई करना चाहिए| रासायनिक दवा ०.०५% फास्फामिडान का छिडकाव बौर घटने की स्थिति में करना चाहिए |

७. गुजिया (मिली बग):

इस कीट के लार्वा और वयस्क बौर एवं फलो के वृंद से रस चूसते है| तीब्र प्रकोप की दशा में प्ररोह एवं बौर सूख जाते है तथा प्रारंभिक अवस्था में फल भी सूख कर झड जाते है| यह कीट मधुश्राव भी करता है जिसपर कलि फफूंद उग आती है|

 

रोकथाम :

१. गुजिया को पेड़ पर चढ़ने से रोकने के लिए दिसंबर के अंतिम सप्ताह में ताने के चारों ओर २५ सेमी चौड़ी ४०० गेज पोलीथीन की पट्टी धरती से १.५-२.० फीट की ऊँचाई पर सुतली से बांध देनी चाहिए एवं निचले सिरे पर ग्रीस लगा देनी चाहिए|

२. अन्डों से निकले गुजिया की रोकथाम के लिए मेलाथियान ५% रसायन की २५० ग्राम प्रति पेड़ के हिसाब से तने के चारों ओर बुरकाव कर खुरपी से मिट्टी में मिलाना चाहिए |

३. यदि किसी कारणवश गुजिया पेड़ पर चढ़ गया हो तो ऐसी अवस्था में क़ुइनोल्फोस २५% इ सी २ मिली  अथवा मोनोक्रोटोफोस ३६% एस एल १.५ मिली प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिडकाव करें।

८. तना छेदक

इस कीड़े को तनों पर बुने हुए जालों में फंसे उनके मल की मौजूदगी से पहचाना जाता है।

 

 रोकथाम:

इस कीड़े की रोकथाम के लिए इसके द्वारा बनाये गए छेदों को किसी पतले तार से साफ़ कर उनमें १ प्रतिशत वाले डायजिनान/०.०५% मोनोक्रोटोफोस को रुई में भिगोकर या रुई के साथ पेट्रोल डाल कर छेद को बंद कर देना चाहिए, तथा कमजोर/ मृतप्राय शाखाओं को पेड़ से अलग कर देना चाहिए।

९. धब्बेदार बग

 इस कीड़े के केवल शिशु और मादाएँ नुकसान पहुँचाते हैं। ये दोनों आम के पौधों का कोशिका रस चूस लेते हैं। इसके मुलायम तने और मंजरियाँ सूख जाती है तथा अधपके फल गिर जाते हैं।

रोकथाम:

पेड़ के आस-पास की मिट्टी की गुड़ाई करने से इस कीड़े के अंडे नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा पौधे के मुख्य तने के धरती के पास वाले भाग पर 30 से०मी० चौड़ी अल्काथीन या प्लास्टिक की एक पट्टी लपेट देने से व उस पर कोई चिकना पदार्थ लगाने से इस कीड़े के शिशु पेड़ पर नहीं चढ़ पाते हैं यह काम दिसम्बर के महीने में कर देना चाहिए क्योंकि यही वह समय होता है जब कीड़े के अण्डों से बच्चे निकलने लगते हैं और फ़िर पेड़ पर चढ़ने लग जाते हैं। इसके साथ किसी भी उपयुक्त कीटनाशक का छिड़काव जनवरी एवं फ़रवरी माह में करें।

आम पर लगने वाले रोग

१. सफ़ेद चूर्णी रोग (पाउडरी मिल्ड्यू)

बौर आने की अवस्था में यदि मौसम बदली वाला हो या बरसात हो रही हो तो यह बीमारी प्रायः लग जाती है। इस बीमारी के प्रभाव से रोगग्रस्त भाग सफ़ेद दिखाई पड़ने लगता है।अंततः मंजरियाँ और फूल सूखकर गिर जाते हैं।

रोकथाम:

इस रोग के लक्षण दिखाई देते ही आम के पेड़ों पर ५ प्रतिशत वाले गंधक के घोल का छिड़काव करें। इसके अतिरिक्त ५०० लीटर पानी में २५० ग्राम कैराथेन घोलकर छिड़काव करने से भी बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में बौर आने के समय मौसम असामान्य रहा हो वहां हर हालत में सुरक्षात्मक उपाय के आधार पर ०.२ प्रतिशत वाले गंधक के घोल का छिड़काव करें एवं आवश्यकतानुसार दुहराए।

२. कालवूणा (एन्थ्रेक्नोस)

यह बीमारी अधिक नमी वाले क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है। इसका आक्रमण पौधों के पत्तों, शाखाओं, और फूलों जैसे मुलायम भागों पर अधिक होता है। प्रभावित हिस्सों में गहरे भूरे रंग के धब्बे आ जाते हैं।

रोकथाम:

०.२ प्रतिशत जिनैब या ४:४:५० बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करें। जिन खेत्रों में इस रोग की सम्भावना अधिक हो वहां सुरक्षा के तौर पर शुकियाँ विकसित होने से पहले ही उपरोक्त घोल का छिड़काव करें।

३. ब्लैक टिप (कोएलिया रोग) रोग

यह रोग ईंट के भट्टो के आसपास के क्षेत्रो में उससे निकलने वाली गैस सल्फर डाई ऑक्साइड के कारण होता है। इस बीमारी में सबसे पहले फल का अग्रभाग काला पड़ने लगता है इसके बाद उपरी हिस्सा पीला पड़ता है। तत्पश्चात गहरा भूरा और अंत में काला हो जाता है। यह रोग दशहरी किस्म में अधिक होता है।

रोकथाम:

इस रोग से फसल बचाने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि ईंट के भट्ठों की चिमनी आम के पूरे मौसम के दौरान लगभग ५० फुट ऊँची रखी जाए। इस रोग के लक्षण दिखाई देते ही बोरेक्स १० ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से बने घोल का छिडकाव करें। फलों के बढ़वार की विभिन्न अवस्थाओं के दौरान आम के पेडों पर ०.६ प्रतिशत बोरेक्स के दो छिड़काव फूल आने से पहले तथा तीसरा फूल बनने के बाद छिड़काव करें। जब फल मटर के दाने के बराबर हो जाय तो १५ दिन के अंतराल पर तीन छिडकाव करना चाहिए |

४. गुच्छा/गुम्मा रोग (माल्फार्मेशन)

इस बीमारी का मुख्य लक्षण यह है कि इसमें पूरा बौर नपुंसक फूलों का एक ठोस गुच्छा बन जाता है।

रोकथाम:

बीमारी का नियंत्रण प्रभावित बौर और शाखाओं को तोड़कर किया जा सकता है। अक्तूबर माह में २०० प्रति दस लक्षांश वाले नेप्थालिन एसिटिक एसिड का छिड़काव करना और कलियाँ आने की अवस्था में जनवरी के महीने में पेड़ के बौर तोड़ देना भी लाभदायक रहता है क्योंकि इससे न केवल आम की उपज बढ़ जाती है अपितु इस बीमारी के आगे फैलने की संभावना भी कम हो जाती है ।

५. पत्तों का जलना

उत्तर भारत में आम के कुछ बागों में पोटेशियम की कमी से एवं क्लोराइड की अधिकता से पत्तों के जलने की गंभीर समस्या है। इस रोग से ग्रसित वृक्ष के पुराने पत्ते दूर से ही जले हुए जैसे दिखाई देते हैं।

रोकथाम:

इस समस्या से फसल को बचाने हेतु पौधों पर ५ प्रतिशत पोटेशियम सल्फ़ेट के छिड़काव की सिफारिश की जाती है। यह छिड़काव उसी समय करें जब पौधों पर नई पत्तियां आ रही हों । ऐसे बागों में पोटेशियम क्लोराइड उर्वरक प्रयोग न करने की सलाह भी दी जाती है। ०.१ % मेलथिओन का छिड़काव भी प्रभावी होता है। 

६. डाई बैक

इस रोग में आम की टहनी ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगती है और धीरे – धीरे पूरा पेड़ सूख जाता है। यह फफूंद जनित रोग होता है, जिससे तने की जलवाहिनी में भूरापन आ जाता है और वाहिनी सूख जाती है एवं जल ऊपर नहीं चढ़ पाता है |

रोकथाम: इसके रोकथाम के लिए रोग ग्रसित टहनियों के सूखे भाग से १५ सेमी नीचे से काट कर जला दें। कटे स्थान पर बोर्डो पेस्ट लगाये तथा अक्टूबर माह में कापर ऑक्सीकलोराइड का ०.३% घोल का छिडकाव करें। 


Authors:

डॉ. उमेश कुमार, राजीव कुमार

केंद्रीय एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन केंद्र

जैविक भवन सेक्टर ई(निकट इन्जीनेअरिंग कॉलेज चौराहा) जानकीपुरम लखनऊ-२२६०२१

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