सूत्रकृमि सूक्ष्म, कृमि के समान जीव है जो पतले धागे के समान होते है, जिन्हे सूक्ष्मदर्शी से आसानी से देखा जा सकता है। इनका शरीर लंबा, बेलनाकार व पूरा शरीर बिना खंडो का होता है। मादा सूत्रकृमि गोलाकार व नर सर्पिलाकार आकृति के होते है। इनका आकार 0.2 मिमी.-10 मिमी. तक हो सकता है। सूत्रकृमियों में प्रमुख रूप से फसल परजीवी सूत्रकृमि है जो कि मृदा में या पौधे की उत्तको में रहते है। इनमें मुख्य रूप से जड़ गांठ सूत्रकृमियों का विभिन्न फसलों पर प्रकोप ज्यादातर देखा गया है, जो पौधे के जड़ों पर आक्रमण करते है।  जिससे जड़ों की गांठे फूल जाती है व जड़ों द्वारा जल व पोषक तत्व ग्रहण करने की क्षमता कम हो जाती है या रूक जाती है, जिससे पौधा आकार मे बौना, पौधों की पत्तियां पीली, पौधा मुरझाने लगता है एवं फसल की ओज व उपज क्षमता कम हो जाती है।

इन सूत्रकृमियों के मुख्य भाग में सुर्इ के समान एक संरचना होती है जिसे स्टाइलेट कहते है, जिसके द्वारा ये जड़ों मे संक्रमण करके उसके कोशिकाओं व उत्तकों से पोषण लेते है, जिससे जड़ों का बढना रूक जाता है, जड़ें फूल जाती है व आपस में विभक्त होकर गुच्छा बना लेती है।

सूत्रकृमि विभिन्न प्रकार की सब्जियों मे रोग उत्पन्न करता है, जिसका पहचान आम किसान नही कर पाते एवं अन्य रोगनाशी रसायनों का छिडकाव कर रोकथाम करने का प्रयास करते है, जिससे उनका श्रम, पैसा व समय बर्बाद होता है एवं सफलता भी नही मिलती। अतः इन सूत्रकृमि की पहचान करना जरूरी है एवं इनसे होने वाले रोगों की पहचान कर इन्हे विभिन्न विधियों द्वारा नियंत्रण किया जाना चाहिये। अतः इसकी आवश्यकता को देखते हुये इस लेख मे इनके रोगजनक, रोग के लक्षण एवं रोकथाम के उपाय निम्नानुसार दिये जा रहे है।

जड़ गांठ रोग:- यह रोग मुख्यत: कददू वर्गीय सब्जियों, चुकंदर, गाजर, टमाटर, बैगन, मिर्च, भिण्डी, प्याज, चौलार्इ, शकरकंद आदि सब्जी फसलों को नुकसान पहुंचाता है।

रोग जनक:- मेलाइडोगायनी जावानिका, मेलाइडोगायनी इनकोगनिटा, मेलाइडोगायनी अरनेरिया प्रजातियां।

आलू का सिस्ट सूत्रकुमि:- इसे गोल्डन निमेटोड के नाम से भी जाना जाता है।

रोग जनक:- ग्लोबोडेरा रोस्टोचाइनेनिसस व ग्लोबोडेरा पेलीडा।

प्याज का तना व बल्ब सूत्रकृमि:- यह मुख्य रूप से प्याज व लहसून में नुकसान पहुंचाता है।

रोगजनक:- डिटिलेनिचस डिप्सेसी

रोग के लक्षण:- सब्जियों के खेत में रोगी पौधे व उनके लक्षणों को देखकर आसानी से पहचान की जा सकती है, जो इस प्रकार है। रोगग्रस्त पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती है, पौधा मुरझा जाता है, पौधा बौना हो जाता है। पौधों को उखाड़कर देखने पर यह दिखता है कि जड़े सीधी न होकर आपस मे गुच्छा बना लेती है, जड़ों पर गांठे बनकर फूल जाती है। पौधों मे फूल व फल देरी से लगतें है व झड़ने लगतें है, फलों का आकार छोटा हो जाता है व उसकी गुणवत्ता कम हो जाती है।

रोग से हानि:- हमारे देश मे किसान सब्जियों से अधिक लाभ प्राप्त करने के लिये इनकी सघन खेती करते है, जिससे सूत्रकृमियों को आसानी से पोषण मिल जाता है, जिससे इनकी संख्या कर्इ गुना बढ़ जाती है। सूत्रकृमियों से हानि मृदा में उपस्थित इनकी संख्या, बोर्इ जाने वाली इनकी पोषक फसल आदि पर निर्भर करता है। सामान्य अवस्था मे 20-40 प्रतिशत तक नुकसान होता है एवं रोग की अधिकता होने पर 70-80 प्रतिशत तक भी हानि हो सकती है। एक किये गये शोध के आधार पर रोग की भयानकता होने पर कददू वर्गीय सबिजयों में 65-70, मिर्च-टमाटर मे 60-65, बैगन मे 50-60, गाजर व चौलार्इ मे 40-50 प्रतिशत तक का नुकसान पाया गया है।

रोग प्रबंधन:-

सूत्रकृमियों से रोकथाम के लिये निम्न विधियां अपनाये जा सकते है।

फसल चक्र:- सूत्रकृमियों की कर्इ प्रजातियां जैसे- ग्लोबोडेरा, मेलाइडोगायनी, हेटरोडेरा आदि मृदा मे लंबे समय तक सक्रिय नही रहते अत: फसल चक्र अपनाकर इनकी रोकथाम की जा सकती है। जिन खेतों मे जड़ गांठ रोग का प्रकोप हो रहा है वहां ऐसी सब्जियों या अन्य फसलों का चुनाव करें जिनमे यह रोग नही लगता जैसे- राजमा, मटर, मक्का, गेहंू, ग्वार, पालक, सलाद आदि।

स्वच्छ कृषि औजारों का प्रयोग:- एक खेत से दूसरे खेतों में कृषि औजारों के प्रयोग से पहले इन्हे अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिये। ताकि यदि एक खेत में सूत्रकृमियों की उपसिथति है तो वे अन्य खेतों में कृषि औजारो के माध्यम से ना जावें।

रोग रहित पौध का चुनाव:- स्वस्थ, साफ एवं रोगरहित पौध का चुनाव करना चाहिये।

कार्बनिक खाद का प्रयोग:- कार्बनिक खादें सूत्रकृमियों के प्रति प्रतिरोध उत्पन्न करने वाले कुछ ऐसे कवक व बैक्टिरिया को बढ़ावा देती है, जिससे इनका संक्रमण कम हो जाता है। खादों को भूमि की जुतार्इ करते समय या बीज बोने या पौध लगाने के 20-25 दिन पहले डालना चाहिये। इनमें मुख्यत: नीम, सरसों, महुआ, अरण्डी, मूंगफली आदि की खली को 25-30 किंवटल/हेक्टेयर की दर से डालना चाहिये।

शत्रु फसलें व रक्षक फसलें:- कुछ फसलें जैसे शतावर, कि्रस्टेयी क्रोटोलेरिया आदि जड़ गांठ सूत्रकृमि की संख्या को कम करतें है। सफेद सरसों आलू के सिस्ट सूत्रकृमि को रोकता है। ये फसलें शत्रु फसले कहलाती है। इनके अलावा कुछ ऐसे फसलें है जिनके जडों से ऐसे रासायनिक द्रव्य निकलतें है जो सूत्रकृमियों के लिये विष का काम करतें है जैसे गेंदा, सेवंती आदि। इन्हे अंर्तवर्तीय फसलों के रूप मे मुख्य फसलों के बीच मे या मुख्य फसल के चारो तरफ 2-3 कतारों मे लगाना चाहिये।

रोग ग्रस्त पौधों को नष्ट करके:- यदि आरंभ में सूत्रकृमि का प्रकोप बहुत कम है तो रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिये। इससे रोग का प्रकोप कम हो जायेगा।

ग्रीष्म कालीन गहरी जुतार्इ:- मर्इ-जून के महीने मे खेतो की मिट्टी पलट हल से 15-30 से.मी. गहरी जुतार्इ करके छोड़ दे, जिससे सूत्रकृमियों के अण्डे व डिंभक उपरी सतह पर आ जातें है जो सूर्य ताप व चिडि़या आदि द्वारा नष्ट हो जाते है, जिससे सूत्रकृमि के प्रकोप को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

मृदा सौर निर्जमीकरण द्वारा:- यह एक आसान, सुरक्षित व प्रभावशाली विधि है, जिसके द्वारा सूत्रकृमियों के साथ-साथ विभिन्न कीटों, रोगजनक एवं खरपतवारों की रोकथाम भी हो जाती है। इस विधि में गर्मियों में (मर्इ-जून) मृदा मे सिंचार्इ करके 15-30 से.मी. गहरार्इ तक गहरी जुतार्इ करके उसे 4-5 सप्ताह तक पालीथीन शीट से ढंक दिया जाता है, जिससे मृदा मे उच्च तापक्रम द्वारा सूत्रकृमि नष्ट हो जाते है।

खरपतवार नियंत्रण:- खेतों मे उगने वाले कर्इ प्रकार के खरपतवारों पर सूत्रकृमि पनाह लेकर पोषण प्राप्त करके अपना जीवन चक्र पूरा कर लेते है तथा आने वाली फसल पर आक्रमण करके हानि पहुंचाते है अत: समय समय पर खरपतवारों का नियंत्रण करते रहें।

गर्म जल उपचार:- 46 0 सेलियस तापक्रम जल द्वारा आलू एवं प्याज के कंदों/बीजों को 1 घण्टे तक उपचारित करने से सूत्रकृमि नष्ट हो जाते है।

आच्छादित फसलों द्वारा:- कुछ आच्छादित फसलें जैसे-सनर्इ, दूब घांस, वेलवेट बिन आदि कुछ ऐसे है जिन्हे मुख्य फसल के पहले या बाद मे उगाकर सामान्य रूप से जड़ गांठ सूत्रकृमि का रोकथाम किया जा सकता है।

रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करके:- सूत्रकृमियों के प्रबंधन का यह सबसे सरल, सस्ता व प्रभावकारी उपाय है। इस सारणी की सहायता से कुछ फसलों के सूत्रकृमियों के प्रति रोधक क्षमता रखने वाले सब्जियों के किस्मों के उदाहरण दिये जा रहे है, जिन्हे किसान चयन करके सूत्रकृमियों का नियंत्रण कर सकते है।

फसल का नाम

सूत्र कृमि प्रजाति

रोग प्रति रोधी किस्में

खरबूज

जड़ गांठ सूत्रकृमि

हरा मधु (मध्यम प्रतिरोधी)

खीरा

जड़ गांठ सूत्रकृमि

बिकानेर

तरबूज

जड़ गांठ सूत्रकृमि

शाहजहांपुरी

तरोर्इ

जड़ गांठ सूत्रकृमि

मेरठ स्पेशल, पानीपती

कददू

जड़ गांठ सूत्रकृमि

जयपुरी, दासना

रखिया

जड़ गांठ सूत्रकृमि

आगरा, जयपुरी

आलू

सिस्ट सूत्रकृमि

कुफरी स्वर्णा, कुफरी थेनामलार्इ

टमाटर

जड़ गांठ सूत्रकृमि

हिसार ललित, पूसा-120, निमाटेक्स, रोमा-2, मंगला, अर्का वरदान, पूसा एच-2,4

बैगन

जड़ गांठ सूत्रकृमि

गोला, गुल्ला, ब्लेक ब्यूटी, जायंट आफ बनारस, पूसा लांग परपल

शकरकंद

जड़ गांठ सूत्रकृमि

कार्डनर, जीवेल, गारनेट, श्री भद्रा

टमाटर

रेनीफार्म सूत्रकृमि

कल्याणपुर-1,2,3

मिर्च

जड़ गांठ सूत्रकृमि

एन पी.-46-ए, पूसा ज्वाला, मोहिनी

लोबिया

जड़ गांठ सूत्रकृमि

जी ए यू-1

 

पौध संगरोध:- एक देश से दूसरे देशों में सूत्रकृमि के प्रसार को रोकने के लिये पादप संगरोध नियमों का बहुत महत्व है उदाहरण के लिये आलू का सिस्ट सूत्रकृमि पर ये नियम लागू है।

रासायनिक नियंत्रण:- कार्बोफ्यूरान/फोरेट को 2 कि.गा् सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर भूमि मे मिलायें या 3 गा्म/कि.गा् बीज दर से उपचारित करें या पौध को कार्बोसल्फान 25 र्इ.सी. 500 पी.पी.एम. से 1 घंटे तक उपचारित करके लगायें। कुछ दानेदार रसायन जैसे- एल्डीकार्ब (टेमिक) को 11 कि.गा्/हेक्टेयर की दर से मृदा मे मिलाये।

डार्इक्लोरोप्रोपीन (टिलोन) या आक्सामिल को 5-10 किंवटल/हेक्टेयर या निमागान 120 कि.गा्/हेक्टेयर की दर से भूमि मे मिलाना चाहिये।

पौध (नर्सरी) को कार्बोसल्फान 1 गा्./ली. पानी का घोल बनाकर आधा घंटा उपचारित करके लगाये।

समन्वित रोग प्रबंधनः- रोग प्रबंधन की विभिन्न विधियों मे से किसी एक विधि द्वारा सूत्रकृमियों का पूरी तरह रोकथाम नही किया जा सकता अत: दो या दो से अधिक विधियों का समावेश करके समन्वित रोग प्रबंधन द्वारा सूत्रकृमियों की रोकथाम की जा सकती है।

•           गी्ष्मकालीन गहरी जुतार्इ करनी चाहिये।

•           नर्सरी लगाने के पूर्व बीज शैया को कार्बोफ्यूरान, फोरेट आदि से उपचारित करना चाहिये।

•           फसल लगाने के 20-25 दिन पहले कार्बनिक खाद को मृदा में मिलाना चाहिये।

•           फसल चक्र अपनाये।

•           अंर्तवर्तीय फसल के रूप मे शतावर, गेंदा की 2-3 कतार मुख्य फसल के बीच मे लगाये।

•           रोग प्रतिरोधी जातिया का चयन करें।

•           अंत में यदि इन सबसे रोकथाम नही हो तब रसायनों का प्रयोग करें।

निष्कर्ष:-

सूत्रकृमियों के कारगर नियंत्रण के लिये सबसे पहले सूत्रकृमि की पहचान, रोगजनक, रोग के लक्षण आदि का पहचान होना आति आवश्यक है जिससे इसका रोकथाम करने के विभिन्न उपाय अपनाने मे आसानी हो सके तथा   वर्तमान मे बढते हुये रासायनिक तत्वों के प्रयोगों के कारण भूमि, जल, पर्यावरण, खाघ पदार्थ के खराब होने एवं मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले विपरीत असर को देखते हुये सूत्रकृमि नियंत्रण के लिये समनिवत रोग प्रबंधन का तरीका अपनाना चाहिये।


 Authors:

सीताराम देवांगन और घनश्याम दास साहू

 उघानिकी विभाग, इंदिरा गांधी कृषि महाविघालय रायपुर (छ.ग.).492012

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