मटर एक फूल धारण करने वाला द्विबीजपत्री पौधा है। इसकी जड़ में गांठे मिलती हैं। मटर के एक बीज का वजन ०.१ से ०.३६ ग्राम होता है। सब्जियो मे मटर का स्थान प्रमुख रहा है। इसकी खेती हरी फल्ली (सब्जी), साबुत मटर, एवं दाल के लिये किया होता है। आजकल मटर की डिब्बा बंदी काफी लोकप्रिय हो रही है। इसमे प्रचुर मात्रा मे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, रेशा, पोटेशियम एवं विटामिन्स पाया जाता है। स्वाद एवं पौष्टिकता की दृष्टि से दलहनी फसलो मे से मुख्य फसल है। इस लेख के माध्यम से मटर में पौध संरंक्षण करके अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा  सकता है

पौध संरंक्षणः-

मटर की फसल मे रोगो मे मुख्य रूप से चूर्णिल आसिता, गेरूआ एवं उकटा लगता है वही कीटो मे मुख्य दरूप से फली भेदक, माहो एवं पर्ण सुरंगक नुकसान पहुंचाते है।

1. चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्ड्यू):- इस रोग का प्रकोप शुष्क मोसम मे फलियां बनते समय होता है। सामान्यतः जल्दी तैयार होने वाली किस्मो मे यह रोग कम लगता है। इस रोग मे पत्तियों पर सफेद चूर्ण युक्त धब्बे बनने लगते हैै। रोगग्रस्त पौधा सफेद चूर्ण से ढंका दिखाई देता है जिसके कारण पौधो मे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया मंद पड़ जाती है एवं पौधे छोटे रह जाते है। रोग की तीव्रता होने पर नये फूल नही आते है एवं फलियो का विकास नही होता। फलियो मे बनने वाले दाने छोटे रह जाते है।

नियंत्रणः- जल्दी तैयार होने वाली किस्मो का चयन करना चाहिये। नत्रजन की मात्रा ज्यादा नही देनी चाहिये इससे रोग का तीव्रता बढ़ती है। फसल चक्र अपनाना चाहिये। बीजो को कार्बेंडाजिम या बाविस्टिन (3 ग्राम/कि.ग्रा. बीज) से उपचारित कर बोना चाहिये। खड़ी फसल मे रोग का प्रकोप होने पर घुलनशील गंधक (3 ग्राम) या बाविस्टिन (1 ग्राम) या केलेक्सिन (1 ग्राम) मे से किसी एक दवा को प्रति लीटर पानी मे घोलकर 15 दिन के अंतराल मे 2 बार छिड़काव करना चाहिये। रोग प्रतिरोधी किस्मो जैसे पूसा प्रगति, रचना, अंबिका, शुभ्रा, अपर्णा, अर्का अजीत, फूले प्रिया, आजाद मटर-4, जवाहर मटर-4,5 आदि को लगाना चाहिये।

2. गेरूआ (रस्ट):- रोग का प्रारंभिक लक्षण पौधे के हरे भागो पर पीले, गोल या लंबे धब्बे समूहो मे पाये जाते है जो बाद मे भूरे रंग मे परिवर्तित हो जाते है। यह रोग नम जलवायु वाले क्षेत्रो मे अधिक उग्रता से उत्पन्न होता है।

नियंत्रणः- फसल चक्र अपनाना चाहिये। रोगरोधी किस्मे जैसे हंस, अर्का अजीत आदि का चयन करना चाहिये। खड़ी फसल मे रोग का प्रकोप होने पर घुलनशील गंधक (3 ग्राम) या बाविस्टिन (1 ग्राम) या केलेक्सिन (1 ग्राम) मे से किसी एक दवा को प्रति लीटर पानी मे घोलकर 15 दिन के अंतराल मे 2 बार छिड़काव करना चाहिये या सल्फर पाउडर 25 कि.ग्रा. राख के साथ मिश्रण करके प्रति हेक्टेयर भुरकाव करना चाहिये।

3. उकटाः- इस रोग मे प्रभावित खेत की फसल हरा का हरा मुरझाकर सूख जाता है। यह रोग पौधें में किसी भी समय प्रकोप कर सकता है। अगेती फसलो मे यह रोग ज्यादा लगता है।

नियंत्रणः- गी्ष्मकालीन गहरी जुताई करके खेतों को कुछ समय के लिये खाली छोड देना चाहिये। बीज को ट्राइकोडर्मा विरडी (5 ग्राम/किलो बीज) या कार्बेंडाजिम (3 ग्राम/किलो बीज) से उपचारित करके बोना चाहिये। फसल चक्र अपनाना चाहिए। प्रभावित खडी फसल में रोग का प्रकोप कम करने के लिये गुडाई बंद कर देना चाहिए क्योंकि गुडाई करने से जडों में घाव बनतें है व रोग का प्रकोप बढता है। संक्रमित क्षेत्रो मे देरी से तैयार होने वाली किस्मो को लगाना चाहिये।

4. तुलासिता :- इस रोग में पत्तियों की उपरी सतह पर प्रारंभिक अवस्था में पीले रंग के धब्बे दिखाई देते है जिसके नीचे सफ़ेद रुई के समान फफूंदी की वृद्धि दिखाई देती है

नियंत्रणः- इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इस मिश्रण को २५० मि.ली. प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें 

5. सफ़ेद विगलन :- यह रोग पर्वतीय क्षेत्र में व्यापक रूप से फैलता है इस रोग से पौधों के सभी वायवीय भाग रोग से ग्रसित हो जाते है जिससे पूरा पौधा सफ़ेद रंग का होकर मर जाता है पौधे के रोग ग्रस्त भागों पर सफ़ेद रंग की फफूंदी उग जाती है और बाद में रोग ग्रस्त भागों में ऊपर तथा अन्दर काले रंग के गोल दाने बन जाते है |

नियंत्रणः- फसल की बुवाई नवम्बर के प्रथम सप्ताह से पहले नहीं करनी चाहिए , जिस खेत में इस रोग का प्रकोप पिछले सालों अधिक देखने को मिला हो उसमे कम से कम ५ वर्षों तक मटर तथा अन्य दलहनि फसले न बोई जाएँ अर्थात फसल चक्र में बदलाव कर दें  , जनवरी के पहले सप्ताह से जब बीमारी के लक्षण फसल में दिखाई पड़े तब नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इस मिश्रण को २५० मि.ली. प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें  |

6. झुलसा (आल्टरनेरिया ब्लाईट ) :- सभी वायवीय भाग पर इसका प्रकोप होता है  सर्व प्रथम नीचे की पत्तियों पर किनारे से भूरे रंग के धब्बे बनते है |

नियंत्रणः- इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इस मिश्रण को २५० मि.ली. प्रति पम्प के द्वारा फसल में तर-बतर कर छिड़काव करें  |

7. बीज विगलन :-इस रोग में बीज अंकुरण से पहले या  अंकुरण के समय सड़ना प्रारंभ हो जाते है जिससे खेत में बीजों का अंकुरण भली प्रकार से न होने के कारण पौधों की संख्या काफी कम रह जाती है |

नियंत्रणः- इसकी रोकथाम के लिए बीज को बोने से पूर्व नीम का तेल या गौमूत्र या कैरोसिन से बीज को उपचारित कर फसल की बुवाई करें |

कीट नियंत्रण

1. फली भेदकः- देर से बोई गई फसल में इस कीट का आक्रमण अधिक होता है इस कीट की इल्ल्यिां फलियां बनते समय उसमे छेद करके अंदर घुसकर दानो को खा जाती है जिसके कारण संक्रमित फलियां उपयोग करने योग्य नही रह जाती।

नियंत्रणः- फलियो की तुड़ाई करने के बाद कार्बारिल 50 डब्लू पी. की 2 किलो मात्रा को घोल बनाकर या मेलाथियान 2 मि.ली./ली. पानी के हिसाब से घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिये।

2. माहोः- इस कीट का प्रकोप जनवरी के बाद प्राय: होता है यह कीट पत्त्यिो एवं तनो से रस चूसकर चिपचिपा मधु के समान रस स्त्राव करती है जिन पर बाद मे काली फफंदी रोग विकसित हो जाती है। जिसके कारण पौधो मे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया मंद पड़ जाती है एवं पौधे छोटे रह जाते है। फलियां कम लगती है एवं विषाणु रोग को फैलाने म भी सहायता करती है।

नियंत्रणः- नियंत्रण के लिये रोगार या मेथाइल आक्सी डेमेटान की 2 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल मे 2 बार प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिये।

3. पर्ण सुरंगक कीट (लीफ माइनर):- इस कीट का आक्रमण पौधे की प्रारंभिक अवस्था में ही शुरू हो जाता है इस कीट की इल्लियां पत्तियो मे सुरंग बनाकर हरे पदार्थ एवं क्लोरोफिल को खा जाती है जिससे पत्तियो मे सफेद रंग की धारियां बन जाती है। पत्तियां मुरझाकर सूख जाती है एवं फूल/फलियां बहुत कम लगते है।

नियंत्रणः- सही समय पर बंुवाई करना चाहिये। नियंत्रण के लिये रोगार या मेथाइल आक्सी डेमेटान की 2 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल मे 2 बार प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिये।


Authors:

हरजिन्द्र सिंह**, वी एस आचार्य*, रमेश कुमार सांप** और बीरबल नाथ***

** पी॰एच.डी (कीट विभाग ), *असिस्टेंट प्रोफेसर (कीट विभाग ), ***एम. एस.सी (पौध व्याधई विभाग )

कृषि महाविधालय, बीकानेर

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