पपीते का बिहार की कृषि में प्रमुख स्थान है। पपीते में 20 से अधिक रोगों का आक्रमण होता है, जिनमें कवक एवं विषाणु जनित रोग प्रमुख हैं। बिहार राज्य में सबसे अधिक समस्या विषाणु जनित रोगों की है जिसके कारण किसान पपीते की खेती में कम रूचि ले रहे हैं।

 

कवक जनित रोग:

आर्द्र गलन (डैम्पिंग आॅफ):

यह पौधशाला में लगने वाला गम्भीर रोग है जिससे काफी हानि होती है। इसका कारक कवक पीथियम एफैनिडरमेटम है जिसका प्रभाव नये अंकुरित पौधों पर होता है। इस रोग में पौधे का तना प्रारम्भिक अवस्था में ही गल जाता है और पौधा मुरझाकर गिर जाता है।

नियंत्रण के उपाय:

  • पौधशाला में जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए एवं इसके लिए पौधशाला की उँचाई आस-पास की सतह से उपर होनी चाहिए जिससे जल जमाव न हो।
  • नर्सरी की मिट्टी का उपचार फार्मेल्डिहाइड के 2.5 प्रतिशत घोल से करने के बाद 48 घंटे तक पाॅलीथीन सीट से ढ़क देना चाहिए।
  • बीजोपचाार कार्बेन्डाजिम अथवा मेटालैक्सिल $ मेन्कोजेब के मिश्रण से 2 ग्राम/किलो बीज की दर से करें।
  • पौधशाला में लक्षण दिखते ही मेटालैक्सिल $ मेन्कोजेब के मिश्रण का 2 ग्राम/लीटर पानी से छिड़काव करंे।

तना तथा जड़ सड़न रोग (कालर राॅट):

इस रोग में तने के निचले भाग के छाल पर जलीय (गीले) चकत्ते बनते हैं जो बाद में बढ़कर तनों के चारो तरफ से घेर लेते हैं। तने का उपरी छिलका पतला होकर गलने लगता है। उपरी पत्तियाँ मुरझाकर पीली हो जाती है, और पत्तियाँ गिर जाती है। रोगी पौधे में फल नही बनते हैं और यदि बन जाते हैं तो गिर पड़ते हैं। तने के आधार सड़ जाने के कारण पूरा पौधा टूटकर गिर जाता है। इस कारण जमीन के नीचे जड़े गलने लगती है। पौधे की पत्तियाँ पीली पड़ने लगती है और असमय ही नीचे गिरना आरम्भ कर देती है। बाद में सारी पत्तियाँ गिर जाती है और पौधा गलकर जमीन पर गिर जाता हैं।

नियंत्रण:

  • बगीचे में जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए।
  • रोगी पौधों को जड़ सहित उखाड़कर जला देना चाहिए, और रोगी पौधों के स्थान पर दूसरे नये पौधे नही लगाना चाहिए।
  • जून, जुलाई और अगस्त के महीने में पौधों पर आधार से 50 से.मी. की ऊँचाई तक बोर्डो मिश्रण लगाने से रोग से बचा जा सकता है।
  • यदि तने में धब्बे दिखाई देते हों तो (मेटालैक्सिल $ मेन्कोजेब) का घोल बनाकर 2 ग्राम/लीटर पानी की दर से पौधे के तने के पास मिट्टी में छिड़काव करना चाहिए।

फल सड़न रोग:

यह पपीते के फल का प्रमुख रोग है। इसके कई कवक कारक हैं जिसमें कोलेटोट्रोईकम ग्लियोस्पोराइड्स प्रमुख है। अध पके एवं पके फल रोगी होते है। इस रोग में फलों के उपर छोटे गोल गीले धब्बे बनते हैं। बाद में ये बढ़कर आपस में मिल जाते हैं तथा इनका रंग भूरा या काला हो जाता हैं। यह रोग फल लगने से लेकर पकने तक लगता है जिसके कारण फल पकने से पहले ही गिर जाते हैं।

नियंत्रण:

  • काॅपरआक्सीक्लोराईड 2.0 ग्राम/लीटर पानी में या मेन्कोजेब 2.5 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से रोग में कमी आती है।
  • बगीचे में जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए।
  • रोगी पौधों को जड़ सहित उखाड़कर जला देना चाहिए, और रोगी पौधों के स्थान पर दूसरे नये पौधे नही लगाना चाहिए।

कली एवं फल के तनो का सड़ना:

यह पपीता में लगने वाली एक नई बीमारी है जो फ्यूजैरियम सोलनाई नामक कवक के द्वारा लगती है। शुरु में इस रोग के कारण फल तथा कलिका के पास का तना पीला हो जाता है जो बाद में पूरे तने पर फैल जाता है। जिसके कारण फल सिकुड़ जाते हंैे तथा बाद में झड़ जाते हंैे।

नियत्रण:

             इसकी रोकथाम के लिए काॅपरआक्सीक्लोराइड (2 ग्राम प्रति लीटर पानी मे) का छिड़काव करना चाहिए।

             रोगी पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए।

             पपीते के बगीचे के आस-पास कद्दू कुल के पौधे नही होने चाहिए।

चूर्णी फफूंद:

यह रोग ओडियम यूडिकम एवं ओडियम कैरिकी नामक कवक से होता है। इससे प्रभावित पत्तियों पर सफेद चूर्ण जैसा जमाव हो जाता है जो बाद में सूख जाती हैं।

नियत्रण:

  • इस रोग की रोकथाम के लिए घुलनशील सल्फर (2 ग्राम प्रति लीटर पानी में) का छिड़काव करना चाहिए।
  • रोगी पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए।
  • पपीते के बगीचे के आस-पास कद्दू कुल के पौधे नही होने चाहिए।

रिंग स्पाॅट रोग/वलय रोग:

पपाया वलय चित्ती विषाणु इस रोग का कारक है। इस रोग में पपीते की पत्तियाँ कटी फटी सी हो जाती हैं तथा हर गाॅठ पर कटे फटे पत्ते निकलते हैं। पत्तियों के तने तथा फलों पर छोटे गोलाकार धब्बे बन जाते हैं और पौधे की वृद्धि रूक जाती है। पत्ती का डंठल छोटा हो जाता है और पुरानी पत्तियाँ गिर पड़ती है। पत्तियाँ छोटी खुरदरी तथा फफोलेदार हो जाती है। फूल काफी कम लगते हैं, एवं फल का आकार स्वस्थ पौधों की तुलना में काफी कम हो जाता हैं। इस रोग से इस राज्य में पपीते की खेती काफी सीमित होती जा रही है। अगर पहले वर्ष के फल में रोग के लक्षण दिखते है, तो फल तोड़ने के बाद पौधों को उखाड़ देना चाहिए।

बरसात के मौसम में इस किस्म में विषाणु (वाइरस) रोग लगता है जिससे फल का आकार प्रकार विकृत हो जाता है। इससे बचने के लिए खेत के ढ़ंग मे परिवर्तन कर देने से यह रोग नहीं लगता है। इसके लिए सितम्बर माह में बीज नर्सरी या गमलों में बोने चाहिए तथा अक्टूबर-नवम्बर तक पौधे खेत में लगा देने चाहिए। इस तरह प्रथम बरसात का समय रोग मुक्त रखने के लिए बच निकलता है। जाड़े तथा गर्मी में पौधे मजबूत एवं सहनशील हो जाते है। अतः अगले वर्ष बरसात होते ही पपीते के पौधे काफी मात्रा मे फल-फूल देना प्रारंभ कर देते है। अगली बरसात में विषाणु रोग का थोड़ा बहुत प्रकोप होने पर भी फल के गुणों पर कोई खास बुरा प्रभाव नहीं पड़ता है।

नियंत्रण:

  • रोगी पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए।
  • माहँू के नियंत्रण के लिए डाइमेथेएट 1 मिली/लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • पपीते के बगीचे के आस-पास कद्दू कुल के पौधे नही होने चाहिए।
  • नीम की खली एवं नीम के तेल का प्रयोग करने से भी रोग में कमी आती है।
  • वर्षा ऋतु के समाप्ति के बाद पपीता का बाग लगाने पर यह रोग कम दिखाई देता है।

पर्ण कुंचन रोग:

यह पपीते का एक गंभीर विषाणु रोग है। इस रोग के कारण शुरु में पौधों का विकास रुक जाता है और पत्तियाँ गुच्छा नुमा हो जाती हेै तथा पतियों का आकार छोटा हो जाता है। पत्तियों का उपरी सिरा अन्दर की ओर मुड़ जाता है। प्रभावित पौधेंा में फूल एवं फल नही लगते हैं।

नियंत्रण:

  • सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए डाइमेथेएट 1 मिली/लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • रोगी पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए।

Authors:

अतुल कुमार एवं सोनी कुमारी

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली