खजूर शुष्क और अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों की बहुत महत्वपूर्ण बागवानी फसल है, जहाँ का तापमान 50 डिग्री सेल्सियस के ऊपर, पानी और जल की प्रकृति क्षारीय हो, वार्षिक वर्षा 200 मिमी. से कम हो और कोई अन्य व्यवसायिक फसल नहीं होती हो । अतः उन क्षेत्रों के लिए खजूर की फसल एक वरदान है, क्योंकि खजूर की खेती में लागत कम, उत्पादन अधिक और बाजार में मांग भी अधिक होती है।

यह फसल इन क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन में केंद्रीय भूमिका निभाती है। उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व एशिया के शुष्क क्षेत्रों में खजूर के फल एक प्रमुख खाध्य फल है। खजूर की 3000 से अधिक किस्में हैं। खजूर एक बहुत ही पौष्टिक फल है, जिसमें शर्करा, आयरन, पोटेशियम, कैल्शियम और निकोटिक अम्ल आदि तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते है। एक किलोग्राम ताजा पके हुए फलों से लगभग 3150 किलो कैलोरी मिलती है। ताजा फलों में 20 % नमी, 50-65 % शर्करा, 2.5 % रेशे, 2.0 % प्रोटीन और 2.0 % के लगभग वसा, खनिज और पेक्टिक पदार्थ शामिल होते है। इस प्रकार, खजूर के फलों में बहुत पोषक खाद्य पदार्थ उपलब्ध है। रेगिस्तान के लोगों के आहार में जहां पूरे पोषक तत्व नही होते हैं, वहां खजूर उनके आहार का पूरक फल हो सकता हैं। लेकिन इसके उत्पादन में कई तरह के कायिक विकार आते है, जो फल उत्पादन और उसकी गुणवत्ता को कम कर देते हैं जिससे लागत बढ़ जाती है। खजूर में होने वाले प्रमुख कायिक विकारों का वर्णन विस्तार से नीचे दिया गया है।

ब्लैकनोज (Blacknose)   

 खजूर की डोका अवस्था के दौरान वातावरण में अत्यधिक नमी के कारण ब्लैकनोज विकार होता है। डेगलेट नूर और हायनी किस्में इस विकार के प्रति सबसे अधिक अतिसंवेदनशील होती हैं। इस विकार में फल निचले हिस्से से मुरझाकर सूखता हुआ काला पड़ जाता है, इसलिए इसको ब्लैकनोज कहते है। इसके नियंत्रण के लिए फलों को डोका अवस्था के दौरान उच्च आर्द्रता और वर्षा से बचाना चाहिये । फल विकास के समय मिट्टी में अत्यधिक नमी, अंतर-सस्य फसलें और खरपतवार आदि नही रहने चाहिये । फलों को भूरे रंग के कागज से ढककर भी ब्लैकनोज पर नियंत्रण पाया जा सकता है। फल का अत्यधिक झड़ना भी इस रोग को रोकता है।

 श्वेतनाभ (Whitenose)

आमतौर पर श्वेतनाभ रोग इराक, लीबिया और मोरक्को में पाया जाता है। रुताब की शुरूआती अवस्था (early Rutab stage) के दौरान लंबे समय तक तेज सूखी हवाएं चलने के कारण फल जल्दी पककर सूख जाते हैं। जिसके परिणामस्वरूप फल पुष्पकोश के नीचे (calyx end of the fruit) से श्वेताभ होकर सूख जाते हैं। इससे प्रभावित फल सूखकर कठोर हो जाते हैं और उनमें शर्करा की मात्रा भी ज्यादा हो जाती है। इस तरह के फल निर्जलीकरण  के लिए उपयुक्त होते हैं। 

क्रॉसकट्स (Crosscuts or V-cuts)  

क्रॉसकट्स फल डंठल और प्रपर्णों का कायिक विकार है, जो सर्वप्रथम संयुक्त राज्य अमेरिका, पाकिस्तान, इजराइल और इराक के खजूर उत्पादित क्षेत्रों में दर्ज किया गया था। सन 1934 में संयुक्त राज्य अमेरिका में क्रॉसकट्स से एक चौथाई तक फसल क्षतिग्रस्त हो गयी थी और सभी बगीचों हजारों की संख्या में फल गुच्छे ख़राब हो गये थे। फल डंठलो के आधार और प्रपर्णों के ऊतकों पर कट स्पष्ट रूप से दिखाई देता है जैसे कट कृत्रिम रूप से चाकू द्वारा लगाये गए हो। फल परिपक्व होने से पहले ही सुखकर गिर जाते है। प्रपर्णों के आधार में अत्यधिक पत्तियों होने के कारण अथवा पुराने पेड़ों में यह विकार सामान्यतः होता है। विशेष रूप से सायर और खदरावी किस्में इस विकार के प्रति अतिसंवेदनशील होती हैं। इस विकार से बचाव के लिए फल डंठलों की संख्या को कम रखें और अतिसंवेदनशील किस्मों का चुनाव न करें।

बरही विकारबरही विकार (Barhee disorder)

बास्टर्ड शाखा यह विशेष रूप से बरही किस्म में पेड़ के ऊपरी भाग के एक ओर झुकने की एक असामान्य दशा होती है। यह विकार सर्वप्रथम कैलिफोर्निया (यूएसए) में डार्ले एवं उसके सहयोगियों ने 1960 में दर्ज किया था । इससे प्रभावित पेड़ ज्यादातर दक्षिण में और कभी-कभी दक्षिण-पश्चिम दिशा में झुक जाते हैं। इजराइल में यह घटना बहुत गंभीर है जिससे पेड़ 90 डिग्री के कोण तक झुक जाता है। इस विकार से इजराइल में दायरी किस्म इसके प्रति अत्यधिक अतिसंवेदनशील पायी गई है । यध्द्यपि भारत में अभी तक यह विकार नहीं के बराबर है । इस विकार का कारण और नियंत्रण ढूंढ़ने में कोई ठोस सफलता नहीं प्राप्त हुई है। इसकी रोकथाम के लिये समान वजन की एक लोहे की भारी एंगल झुकने के विपरीत दिशा में बांध कर 2 से 3 साल के भीतर पेड़ को पुन: सही किया जा सकता है।

 ब्लैक स्काल्ड (Black scald)

ब्लैक स्काल्ड, ब्लैकनोज से एक अलग तरह का विकार है जो संयुक्त राज्य अमेरिका में गौण रूप में पाया जाता है। अभी तक रोग का कारण अज्ञात है। इसमें फल किनारे और बगल से काला पड़ जाता है और उसका स्वाद भी  कड़ा हो जाता है। इस विकार का कारण उच्च तापमान को माना जाता है, लेकिन सही कारण अभी भी अज्ञात है।

बास्टर्ड शाखाबास्टर्ड शाखा (Bastard offshoot)

इसमे खजूर की वनस्पतिक कलिकाओं में विशेष रूप से प्रशाखाओं के प्रपर्णों में, विकृत वृद्धि हो जाती है। यह विकार प्रमुखतः खजूर की कलिका में माइट (Makiella phoenicis K.) के संकमण से और वृदि नियामकों के अनियमित सांद्रता के कारण होता है। 


पत्ती शीर्ष का सूखाना (Leaf apical drying)

वयस्क खजूर में प्रशाखाओं की रोपण करते समय उनकी जड़ों को क्षति हो जाती है। इसलिए पत्तियों के शीर्ष सूख जाते है। लेकिन रोपाई के दो से तीन साल के भीतर यह अपनेआप ठीक हो जाते हैं।

 ऊर्वरवीकृत क्षति (Fertilization injury) 

इसप्रकार की क्षति केवल युवा ऊतक संवर्धित पौधों में रोपण के बाद के शुरूआती दो वर्षों में ही देखी जाती है। जब उर्वरक (एन, पी, के) पौधे के तने के बहुत नजदीक डाल देते हैं, तब यह उर्वरक युवा ऊतक संवर्धित पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। कई बार उर्वरक आवश्यकता से अधिक मात्रा में डाल देने से पौधे मर भी जाते है।

 पाला से नुकसान (Frost damage) 

खजूर पौधे की तापमान सहन की करने की क्षमता -5 से 50 डिग्री सेल्सियस तक है। पौधों के दैहिक विकास, फलन और फल की गुणवत्ता के लिए इष्टतम तापमान 32 से 38 डिग्री सेल्सियस के बीच का होता है। तापमान के 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाते ही पौधों की वानस्पतिक वृद्धि कम होने लगती है। तापमान के 45 डिग्री सेल्सियस के ऊपर जाते ही वानस्पतिक वृद्धि रुक जाती है। तापमान जब शून्य डिग्री सेल्सियस से नीचे गिर जाता है, तब खजूर में उपापचयी संबंधी विकार होने लगते है, जैसे पत्तियां आंशिक या पूर्ण रूप से सूख जाती है। प्रोटोप्लाज्मा का पानी जमकर जल कोशिकाओं से बाहर आ जाता है और जब बर्फ वापस पिघलती तो कोशिकाओं के बीच के स्थान में घाव बनने से पत्तियां भूरी पड़कर सूख जाती हैं। क्षति की गंभीरता ठंढ की तीव्रता और अवधि पर निर्भर करती है।

  •  -6 डिग्री सेल्सियस, पर पत्रक (leaflet) के किनारे पीले होकर सूख जाते हैं।
  •  -12 डिग्री सेल्सियस, पर बाहरी छ्त्रक के पत्ते सूखने लगते हैं (leaves of external crown desiccate)
  •  -15 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान पर छ्त्रक के पत्ते मध्य भाग से जम जाते हैं। यदि यह तापमान थोड़े लम्बे समय तक रह जाता है तो पेड़ के सारे पत्ते सूखकर जल जाते है।

शीर्ष कलिका और तने के आंतरिक व बाहरी वातावरण के तापमान में बहुत अंतर होता है। जैसे गर्मियों में 14 डिग्री सेल्सियस कम और सर्दियों में 12 डिग्री सेल्सियस तापमान अधिक होता है। जो वास्तव में, शीर्ष कलिका को तंतुक और पत्ती आधारों के द्वारा संरक्षित करता है। इसप्रकार यह खजूर की शीर्ष कलिका और तने को सर्दियों में ठंढ से और गर्मियों में उच्च तापमान के प्रति सापेक्ष स्थिर तापमान विकसित करने में मदद करता है। खजूर के पेड़ों में पाले का प्रभाव सीधा पत्तियों पर पड़कर उनको सुखा देता है। इससे फल पकते नहीं हैं। इस तरह का नुकसान संयुक्त राज्य अमेरिका और मोरक्को में अधिक देखा जाता है, जहाँ का तापमान सर्दियों में -15 डिग्री सेल्सियस के कम चला जाता है। कम तापमान से बचाव का सबसे अधिक व्यवहारिक और उपलब्ध सरल तरीका तापमान कम होने के साथ-साथ पेड़ों में सिंचाई करना है।

 खजूर की विभिन्न किस्मों का तापमान के प्रति व्यवहार  :

प्रतिरोधी : ज़हदी
कम अतिसंवेदनशील: हायनी, सायर और थोरी।
अतिसंवेदनशील  : बरही, डायरी, डेगलेट नूर, खदरावी, मेड़जूल।
अत्यधिक अतिसंवेदनशील :  :ब्रेन, खलास और घरस

पानी की कमी या अधिकता (Lack or excess of water)

खजूर के पेड़ की वृद्धि और विकास सिचाई जल की उपलब्धता और मिट्टी में नमी मात्रा में परिवर्तन के कारण बहुत प्रभावित होता है। पानी की विविधता के कारण फल के उत्पादन में कमी या सम्पूर्ण फसल भी ख़राब हो सकती है। मरू प्रदेशों में उच्च वाष्पन-उत्सर्जन की क्षतिपूर्ति करने के लिए  खजूर को 1,500 से 2,800 मिमी/वर्ष पानी की मात्रा की आवश्यकता होती है। लंबे समय तक पानी के अभाव के कारण पौधे के विकास और उपज में कमी आ जाती है। यदि,  सूखा कई महीनों तक जारी रहा तो खजूर सूखकर और मर भी सकते हैं। जबकी दूसरी ओर, जल का उच्च स्तर और अपर्याप्त जल निकासी या घुलनशील लवण की लीचिंग और परिवहन का अपूर्ण और उच्च वाष्पीकरण की दर मिट्टी में और सतह के पानी में लवण की सांद्रता में वृद्धि करते हैं। इसप्रकार यदि मिट्टी के घुलनशील लवण 6 प्रतिशत से ऊपर हो जाते है तो पौधे की वृद्धि और विकास को रोक देता है। सात प्रतिशत लीचिंग के साथ सिंचाई जल की लवणता 3.5 mmhos/सेमी (यानी 2240 पीपीएम) तक,  उपज को प्रभावित नहीं करता। 11 प्रतिशत लीचिंग के साथ सिंचाई जल की लवणता 5.3 mmhos/ / सेमी तक, उपज में 10 प्रतिशत तक की कमी करता है। 21 प्रतिशत लीचिंग के साथ लवणता 10 mmhos (यानी 6400 पीपीएम) तक हो जाती है, 50 प्रतिशत उपज में कम हो जाती है।


Authors:

विधा भाटी और जगन सिंह गोरा*

डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी छात्रा (बागवानी), स्वामी केशवानन्द राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर

*वैज्ञानिक (फल विज्ञान), केंद्रीय शुष्क बाग़वानी संस्थान, बीकानेर (राजस्थान )

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