Classification of anti fungal medicines and precautions in using them.

पौध रोग फसल के उत्पादन में न केवल कमी करते है वरन उत्पादन के गुणों का भी हनन कर उसका बाजार मूल्य कम कर देते है। पौध रोग नियंत्रण का मुख्य उददेश्य फसल को आर्थिक क्षति से बचाना है इस हेतु पौध रोग के निदान को महत्वपूर्ण स्थान देते हुये फफुंदनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है।

पौधों में अधिकांश रोग फफुंद द्वारा उत्पन्न होते है। फफुंदनाशक का अर्थ है वह रसायन जो रोगजनक फफुंद को नष्ट करने अथवा उनकी बढ़वार को अवरुद्ध करने मे सहायक होते है। कुछ रसायन फफुंदों की बढ़वार को अस्थाई रुप से रोक देते है और उन्हें नष्ट नहीं करते है। इन रसायनों को फफुंदरोधी कहते है। इसी तरह कुछ रसायन केवल फफुंद के बीजाणु बनने को रोकते है। इन रसायनों को बीजाणुक जननरोधी कहते है।

फफुंदनाशक दवाओं का वर्गीकरण :

इन दवाओं का तीन तरह से वर्गीकरण किया जा सकता है

  • रसायनिक प्रकृति के आधार पर
  • फफंदों के प्रति उनकी क्रियाविधि के आधार पर
  • दवाओं के सामान्य उपयोग के आधार पर

रसायनिक प्रकृति के आधार पर

1- गंधक युक्त दवायें :-

अकार्बनिक गंधक दवायें:- गंधक चूर्ण, घुलनशील गंधक, चूना गंधक घोल, 

कार्बनिक गंधक:-  फेरबम] थाइरम, जाइरम,  जिनेब, मेनेब,  नेबाम,  वेपाम।

2- ताम्रयुक्त दवायें :-

बोर्डो मिश्रण, बरंगंडी मिश्रण, क्यूपरस आक्साइड, कापर कारबोनेट,

सिथर झारकीय तांबा:- कापर आक्सीक्लोराइड।

3- पारायुक्त दवायें

अकार्बनिक :- मरकुरिक क्लोराइड,  मरक्युरस क्लोराइड

कार्बनिक :- फिनाइल मरकुरी एसीटेट, मिथोक्सी इथिल मरकुरी क्लोराइड

4- बेंजीन के यौगिक दवायें :- बे्रसीकाल, डाइक्लोरान, डाइनोकेप

5- विषम चक्रीय नार्इट्रोजन युक्त दवायें :- केप्टान, फोलपैट,  डाइफोलेटान

6- टिनयुक्त दवायें :- डयूटर

7- आक्साथिनयुक्त दवायें :- वाइटावेक्स, प्लान्टवेक्स

8- अन्य दवायें :- हिनासान] बेवसिटन, किटाजिन, एंटीबायोटिक्स

फफुंदो के प्रति उनकी क्रिया विधि के आधार पर

  1. रक्षक और आरोग्यकर
  2. रक्षक एवं उन्मुलक
  3. सर्वागी एवं असर्वागी

दवाओं के सामान्य उपयोग के आधार पर

बीज रक्षक मृदा फफुंदनाशी, पर्ण समुह एवं पुष्पपुंज रक्षक, फलरक्षक, उन्मूलक वृक्ष के क्षत उपचार फफुंदनाशी, प्रति जैविक

फफुंदनाशक दवाओं के उपयोग में बरती जाने वाली सावधानियां

फफुंदनाशक दवायें अत्यन्त असरकारक एवं मंहगी होती है यदि इनके उपयोग में सावधानियां न बरती जाये तो उनका कुप्रभाव मानव स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर भी देखा जा सकता है।

  1. विभिन्न-विभिन्न बिमारियों के लिये अलग-अलग दवायें इस्तेमाल की जाती है उपयुक्त दवा बिमारी के लिये उचित है उन्हीं दवाओं का उपयोग किया जाना चाहियें। इसकी सलाह विशेषज्ञ से अवश्य लेनी चाहियें।
  2. दवा का उपयोग खेत में करने के पुर्व आवश्यक सामग्री जैसे दवा की मात्रा निशिचत अनुपात में पानी की मात्रा के अनुसार तौलकर पुडि़या बना लेवे एवं पानी की उचित मात्रा का उपयोग करें। दवा की मात्रा तौलकर और पानी नापकर लिया जावे किसी भी दशा में अंदाजा विधि से दवा या पानी न लिया जावें अन्यथा लाभ के स्थान पर हानी हो सकती है।
  3. उचित समय पर दवा डालना आवश्यक है। इसलिये रोग की आरंभिक अवस्था में दवा का छिड़काव करें। ताकि रोगों को आसानी से नियंत्रित किया जा सकें।
  4. दवा का उपयोग करते समय दस्ताने का इस्तेमाल अवश्य करें। दवा को कागज या चम्मच या किसी अन्य वस्तु से ही उठाना चाहिये घोल बनाते समय साफ-सुथरी लकड़ी की छड का प्रयोग करना चाहियें।
  5. दवा का छिड़काव करते समय हवा के प्रवाह का ध्यान रखते हुये हवा की ओर मुaह करके भुरकाव या छिड़काव नहीं करना चाहिये।
  6. साधारणत: दवा का उपयोग सुबह या शाम के समय करना चाहिये क्योकि दोपहर में धुप अधिक होती है जिससे दवा छिड़कने के पश्चात पौधों द्वारा दवा को पर्याप्त मात्रा में शोषित करने के पुर्व ही दवा में उपसिथत नमी भाप बनकर उड़ जाती है और दवा असरकारक सीद्ध नहीं होती।
  7. फफुंदनाशक दवा का उपयोग करते समय कुछ भी खाना पिना वर्जित है। दवा का इस्तेमाल करने के बाद हाथों को अच्छी तरह साबुन से धोकर साफ कर लेना चाहिये।
  8. खेत में दवा का एक समान छिड़काव करें। इसके लिये कतारों से दवा का छिड़काव करें जिससे की पौधों पर दवा की समान मात्रा गिरे। जिस खेत में दवा का छिड़काव किया जा चुका है उसे अवश्यक चिन्हांकित कर ले ताकि दुबारा उसे दोहराया ना जावे।
  9. दवा डालने के पश्चात छिड़काव यंत्र को अच्छी तरह धोकर रखना चाहियें। वरना रसायनिक क्रिया द्वारा यंत्रों के भाग खराब हो सकते है।
  10. बची हुइ दवा को डिब्बा बंद करके एवं लेबल लगाकर रखना चाहियें।
  11. दवाओं को उचित स्थान पर रखे एवं बच्चों की पहुंच से दूर रखना चाहियें।

 


Authors:

रश्मि गौरहा

R.A.E.O.  DDA Office Raipur (C.G.)

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