Parasitic dodder plant and its control

परजीवी खरपतवार कृषि के लिए एक गंभीर समस्या है जिनको नियंत्रित करने के लिए उपलब्ध साधनों की प्रभावकारिता कम होती जा रही है। ये अपना भोजन बनाने और अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए दूसरी फसलों पर निर्भर रहते हैं। जैसे अमरबैल रिजके में, रूखड़ी मक्का और ज्वार में, औरोबंकी सरसों पर निर्भर रहती है। सबसे अधिक आर्थिक रूप से हानिकारक परजीवी खरपतवार रूखड़ी,  औरोबंकी और अमरबेल हैं।

अमरबेल तना परजीवी पौधा है जो फसलों या वृक्षों पर अवांछित रूप से उगकर हानि पहुँचाता है। मुख्य रूप से रिजके में इसकी गंभीर समस्या देखी गई है परन्तु अलसी, चुकन्दर, मिर्ची, प्याज, गाजर, सूरजमुखी, रामतिल, मेंहदी व कई वृक्षों पर इसकी विभिन्न जातियों का प्रकोप देखा गया है। अमरबेल का फैलाव बीज तथा कार्यिकी प्रवर्धन द्वारा होता है। अमरबेल परजीवी पौधे में उगने के 25-30 दिन बाद सफेद अथवा हल्के पीले रंग के पुष्प गुच्छे में निकलते हैं। प्रत्येक पुष्प गुच्छ में 15-20 फल तथा प्रत्येक फल में 2-3 बीज बनते है। अमरबेल के बीज अत्यंत छोटे होते है जिनके 1000 बीजों का वजन लगभग 0.70-0.80 ग्राम होता है। बीजों का रंग भूरा अथवा हल्का पीला एवं बरसीम तथा रिजके के बीजों के जैसा होता है। पकने के बाद बीज मिट्टी में गिरकर काफी सालों तक सुरक्षित पड़े रहते है तथा उचित वातावरण एवं नमी मिलने पर पुन: अंकुरित होकर फसल को नुकसान पहुँचाते है। परपोषी मिल जाने पर 35 दिन में परिपक्व हो जाते हैं। अमरबेल कभी एक साथ नही फैलती हैं, अत: खेत का लगातार निरीक्षण करना आवष्यक है। शुरू में 2-3 स्थानों पर व कालान्तर में पूरे खेत में फैल जाती हैं। अमरबेल जमीन पर पुष्पीय परजीवी पौधे की भाँति उगते हैं तथा बाद में लताओं की तरह बडकर पेड़ों के ऊपर छा जाते हैं। पेड़ों पर छाने के पष्चात लताओं से चूषक निकल कर टहनियों की छाल में प्रवेष कर जाते हैं। परजीवी पौधे चूषकांगों के द्वारा मेजबान पेड़ों से पानी तथा पोषकीय तत्व षोषित करते हैं जिसके कारण पेड  कमजोर हो जाते हैं। यह परजीवी, पत्ती विहीन होते हैं तथा इसमें बहुत कम क्लोरोफिल मिलता है।  इससे फलों की उपज, फलों का आकार एवं गुणवत्ता प्रमुख रूप से प्रभावित होती है। अमरबेल के प्रकोप से उड़द, मूंग में 30-35 प्रतिशत तथा लूसर्न में 60-70 प्रतिशत औसत पैदावार में कमी दर्ज की गई है।

cuscuta and control

रोकथाम:

अमरबेल का नियंत्रण करना बहुत कठिन होता है। जिनके नियन्त्रण के कुछ उपाय निम्नलिखित है

  • फसलों के अमरबेल रहित बीज को उपयोग में लिये जायें।
  • नमक के 10 प्रतिषत घोल में बीजोपचार से अमरबेल के बीज अलग हो जाते हैं। रिजके के बीजों को साफ पानी में धोकर काम में लें।
  • अमरबेल से प्रभावित चारे की फसलों को जमीन की सतह से काटने पर अमरबेल का प्रकोप कम हो जाता है।
  • अमरबेल से प्रभावित चारे की फसल को खरपतवार में फूल आने से पहले ही काट लेना चाहिए जिससे इसके बीज नहीं बन पाते है तथा अगली फसल में इसकी समस्या कम हो जाती है।
  • अमरबेल उगने के बाद परन्तु फसल में लपेटने से पहले (बुवाई के एक सप्ताह के अंदर) खेत में हैरो चलाकर इस खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है।
  • यदि अमरबेल का प्रकोप खेत में थोड़ी-थोड़ी जगह में हो तो उसे उखाड़कर इकट्ठा करके जला देना चाहिए।
  • घास कुल की फसलें जैसे गेहूं, धान, मक्का, ज्चार, बाजरा आदि में अमरबेल का प्रकोप नहीं होता है। अत: प्रभावित क्षेत्रों में फसल चक्र में इन फसलों को लेने से अमरबेल का बीज अंकुरित तो होगा परन्तु एक सप्ताह के अंदर ही सुखकर मर जाता है फलस्वरूप जमीन में अमरबेल के बीजों की संख्या में काफी कमी आ जाती है।
  • परजीवी पौधों की उपस्थित हेतु नियमित रूप से पेड़ों का निरीक्षण करना चाहिए तथा प्रभावी टहनियों को काट देने के पष्चात कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का पेस्ट लगाना चाहिए।
  • विभिन्न फसलों में पेन्डीमेथालिन 30 प्रतिशत (ईसी) नामक श्ााकनाशी रसायन को 3 किग्रा व्यापारिक मात्रा प्रति हैक्टेयर को 150 लीटर पानी में घोल बनाकर ''फ्लैटफैन'' नोजल लगे हुये स्प्रेयर द्वारा की दर से बुवाई के बाद परन्तु अंकुरण से पूर्व छिड़काव करने से अमरबेल का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है। छिड़काव के समय खेत में पर्याप्त नमी होना आवश्यक है। इस शाकनाशी के प्रयोग से अमरबेल के साथ-साथ दूसरे खरपतवार भी नष्ट हो जाते है।
  • शुरू में ही अमरबेल को रिजके सहित काट कर जलाकर नष्ट कर दें व कटे हुए स्थानों पर पेराक्वेट (1 प्रतिषत) छिड़कें। जिससे अमरबेल व सम्पर्क में आने वाला रिजका नष्ट हो जायेगा परन्तु सिंचाई के साथ रिजका पुन: फूट जायेगा।
  • यदि अमरबेल का प्रकोप पूरे खेत में न होकर थोड़ी-थोड़ी जगह पर हो तो इसके लिए ''पैराक्वाट'' अथवा ''ग्लायफोसेट'' नामक शाकनाशी रसायन का 1 प्रतिशत घोल बनाकर प्रभावित स्थानों पर छिड़काव करने से अमरबेल पूरी तरह नष्ट हो जाता है।

लेखक

 लोकेष कुमार जैन

सहायक प्राध्यापक, कृषि महाविद्यालय,

सुमेरपुर, राजस्‍थान -306902

(कृषि विष्वविद्यालय, जोधपुर)

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