खरपतवार वे अवांछित पौधे हैं जो खेत व अन्य स्थानों पर उग जाते हैं एवं वांछित फसल के साथ पोषक तत्वों, पानी, हवा, प्रकाष आदि के लिए प्रतिस्पर्धा करते है। परजीवी खरपतवार अपना जीवन-चक्र की उत्तारजीविता के लिए आंशिक या पूर्ण रूप से दूसरे स्वपोशित पौधों पर निर्भर रहते हैं। ओरोबैंकी, भूँईफोड़ या आग्या (बु्रमरेप) मुख्यतया सरसों कुल की फसलों का अपर्ण हरिती व्यक्त पुष्पीय पूर्ण रूप से मूल परजीवी खरपतवार होता हैं। यह सुपर सिंक अर्थात फसल द्वारा सश्लेषि‍त प्रदार्थ को चूस कर फसल के उत्पादन को अपेक्षित रूप से कम कर देता है। आरोबेंकी आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण द्विबीजपत्रीय फसलों की जड़ों पर आक्रमण करते हैं।

आरोबेंकेसी कुल की प्रजातियों से आरोबेंकी क्रेनाटा, आरोबेंकी सर्नुआ, आरोबेंकी रेमोसा व आरोबेंकी इजिप्टियाका ही आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। ओ. इजिप्टियाका सरसों (क्रुसीफेरी) कुल के अतिरिक्त कई सोलोनेसी कुल के पौधे जैसे टमाटर, बेंगन, तम्बाकू, आलू का भी परजीवी खरपतवार हैं। सरसों की फसल में इसके प्रकोप से 10 से 70 प्रतिशत तक हानि हो सकती हैं। खरपतवार सरसों, तोरिया, राया आदि फसलों पर ओरोबैंकी इजिप्टिका का आक्रमण्ा सबसे पहले राजस्थान के अलवर, भरतपुर, सवाईमाधोपुर आदि क्षेत्रौ में देखा  गया हैं। यह परजीवी सरसों उगाये जाने वाले सभी क्षेत्रौ जैसे राजस्थान, उत्तारप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा आदि में पाया जाता हैं। खेतों में भूँईफोड़ की उपस्थिति किसानों को कम फायदेमंद, अपरपोषी फसल उगाने या खेत को खाली छोड़ने के लिए बाध्य कर सकती है। यह परपोषी पौधो के साथ पोषक तत्वों एवं जल की आपूर्तिं मे तीव्र प्रतिस्पर्धा कर पौधों को कमजोर बना देता है। फलस्वरूप पौधो की वृद्वि रूक सकती है एवं ग्रसित पौधों से प्राप्त उपज अप्रत्याशित मे कमी होती है। कभी-कभी कृषक को प्रदेश की मुख्य तिलहनी फसल अर्थात सरसों के स्थान पर अन्य फसल के उत्पादन के बारे में सोचने को विवश कर देता हैं। ओरोबैंकी क़ी उपस्थिति किसानों को कम फायदे मंद, अपरपोषी फसल उगाने या खेत को खाली छोड़ने के लिए बाध्य कर सकती है।

जीवन-चक्र

आरोबेंकी इजिप्टियाका एक सीधा, पीला-भूरा, पुष्पदंडधर पूर्ण रूप से जड़-परजीवी है जिसके शल्क मसूराकार एवं पुष्प नीले होते हैं। पौधा क्लारोफिल रहित होता है। भूँईफोड़ द्विबीज पत्रीय एकवर्षीय पौधे हैं जो केवल बीजों द्वारा प्रजनन करते हैं। बीज सामान्यत: गहरे भूरे, अण्डाकार, होते हैं और इनका वजन 3 से 6 माइक्रोग्राम होता है । बीजों की संख्या प्रति पौधा 10000 से 50000 तक होती है जो कि प्रजाति पर निर्भर करती है। पकने के बाद कुछ बीज तो बीजकोष में रह जाते हैं लेकिन ज्यादातर भूमि पर गिर जाते हैं। सामान्यत: बीज भूमि में 10 वर्षों या अधिक समय तक जीवनक्षम बने रहते हैं।

मृदा तापमान, नमी, पोषक तत्व, मृदा गठन, पी.एच. और परपोषी पौधे द्वारा प्रदत उत्तोजक अकुंरण के लिए महत्वपूर्ण है। इसके बीज का अंकुरण परपोषी की जड़ों से मिलने वाले रासायनिक संकेतो की प्रतिक्रिया में होता है। अनुकूल अवस्था में फसल की बिजाई के 7-10 दिन बाद इस खरपतवार के बीज परपोषी पौधे द्वारा प्रदत रासायनिक उत्तोजक जैसे एलिक्टरोल, आरोवेंकोल और अन्य कोटिलनीयस व जेसमोनेट की उपस्थिति में एक मूलाकुंर उत्पन्न करता है जोरसायन-अनुवर्ती परपोषी पौधे की जड़ों की तरफ बढ़ता है। रासायनिक उत्तोजकों की स्थिरता मृदा में बहुत ही कम अवधि की होती है। जैसे ही मूलाकुंर की नोक परपोषी की जड़ से जुड़ती है यह बढ़ती जाती है और एक चूषकांग बना लेती है। एक सफल संलगन के लिए जरूरी है कि परजीवी के बीज परपोषी पौधे की जड़ों के 3 से.मी. के दायरे में हो। चूषकांग बनने के बाद शिखर पर कोशिकांए विकसित होती है और वल्कीय व अन्त:स्तर कोशिकाओं को तोड़ते हुए संवहन पूल में घुस कर संवहन-प्रणाली के साथ सम्बंध बनाने के बाद नव-पादप जो हल्के रंग के लगभग पारदर्शी धागे जैसे होता हैं का परपोषी की जड़ से बाहर का हिस्सा फूल कर एक गुलिका बनाता है। उपयुक्त परपोषी के अभाव में नव-पादप मुरझा कर मर जाते हैं। परपोषी की संवहन-प्रणाली के साथ संबधं बनाने के बाद परजीवी अपने पोषक-तत्व एवं जल परजीवी से प्राप्त करते हैं। वृध्दि के एक या दो सप्ताह या इससे भी ज्यादा (4-6 सप्ताह) समय बाद गुलिका पर एक कोपल-कली का विकास होता है जिससे एक पुष्पीय स्पाईक बनती है जो लम्बी होती जाती है और मृदा की सतह से बाहर आती है।

भूँईफोड़ अपनी ज्यादातर वानस्पतिक अवस्था भूमि के नीचे ही बिताता है तथा अपने परपोषी के पुष्पक्रम बनने की शुरूआत के तुरन्त बाद केवल फूल निकलने के लिए ही बाहर आता है। अकुंरण से उद्गमन होने में 30-45 या फिर 90-120 दिन का समय लगता हैं। उद्गमन होने के 6 से 9 दिन बाद पुष्पन शुरू हो जाता है और बीजोत्पादन अगले 7 दिन के अन्दर हो जाता है ।

लक्षण

आरोबैंकी से ग्रस्त सरसों के पौधें छोटे रह जाते है। ओरोबैंकी के चूषकांग (हॉस्टोरिया) सरसों की जड़ो में घुस कर पोषक तत्व प्राप्त करते हैं। सावधानी से उखाड़ कर देखे तो पता चलता है कि ओरोबैंकी की जड़े सरसों की जड़ो के अन्दर घुसी हुई दिखती है। सरसों के पौधे की नीचे मिट्टी से निकलते हुए ओरोबैंकी परजीवी दिखाई पड़ते है। इसके प्रक़ोप से विभिन्न फसलों में पैदावार में क्षति व बुवाई क्षेत्र में कमी के साथ ही फसलों की गुणवता भी कम करते हैं फलस्वरुप उपलब्ध फसल-विकल्पों में भी कमी करनी पड़ती है।

भूँईफोड़ का प्रबन्ध

भरपूर बीजोत्पादन, बीज की लम्बे समय तक मृदा में जीवन-क्षम बने रहने की क्षमता, केवल उपयुक्त परपोषी से प्रदत रासायनिक उतेजक की उपस्थिति में बीज अंकुरण, उद्गमन के बाद प्रबल, ओजस्वी व शीघ्र वृध्दि आदि आदतों और परपोषी-फसल के साथ नजदीकी साहचर्य के कारण परजीवी का प्रंबधन मुश्किल है। परजीवी खरपतवारों की उपस्थिति के कारण जब परपोषी फसलों का उत्पादन अधिक समय के लिए लाभदायक नहीं रहता तो किसान इन्हें छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। किन्तु प्रबंध के निम्नलिखित विकल्पों को एक एकीकृत सोच के साथ लागू किया जा सकता है :

(अ) निरोधात्मक उपाय

  • उन्नत किस्मों के स्वस्थ व प्रमाणित बीज जिनमें खरपतवारों क़े बीजों का संक्रमण न हो क़ा प्रयोग करें। परजीवी ग्रसित खेतों से प्राप्त सरसों के बीज के प्रयोग से सवर्था बचें। अगर स्वच्छ व परजीवी रहित बीज उपलब्ध न हो तो भूँईफोड़ के बीज को सरसों/राया के स्वस्थ बीज से बिजाई पूर्व यान्त्रिक विधि या इसे नीले थोथे/कापर सल्फेट के 25 प्रतिशत घोल में उपचारित करके अलग करें।
  • नये क्षेत्रों में परजीवी बीज के प्रवेश को रोकने हेतु परजीवी के बीज रहित सरसों के शुध्द बीज का उपयोग करना चाहिए।
  • अच्छी तरह किण्वित व अपघटित खादों का प्रयोग करें।
  • दूषित भूसा या फसल के अवशेष पशुओं को न खिलाएें।
  • ग्रसित खेतों में प्रयोग करने के बाद कर्षण व कटाई के कार्य मे आये उपकरणों की सफाई करें तदुरान्त अन्य खेत मे प्रवेश करावे और उचित पादप-स्वच्छता उपायों का पालन करें।

(ब) यान्त्रिक एवं भौतिक विधियां

  • गर्मी के महीनों मे और फसल की बुवाई के समय खेत की तैयारी हेतु गहरी जुताई (20 सै.मी. से अधिक) करें ।
  • हाथ से निकालना एवं जुताई: पुष्पन से पहले परजीवी पौधों को हटाकर इन्हें इधर-उधर फेकनें की बजाय एक स्थान पर इकठ्ठा करके जला दें बहुत ही प्रभावी एवं व्यावहारिक तरीका है। भूँईफोड़-ग्रसित फसल के अवशेषों को जलाने से खरपतवार के बीजों की वापिस मिट्टी में जाने की सम्भावना घट जाती है। यद्यपि हाथ से उखाड़ना कम स्तर पर लाभदायक है।
  • परजीवी को सावधानी से जमीन से ऊपर के तने को काटकर बीज बनने से पहले ही नष्ट कर देना चाहिए।
  • यदि बीज बन गये हो तो पौधौं को सावधानी से कुदली से निकालना चाहिये।
  • मृदा आतपन % नमी युक्त मृदा को (बिजाई के दौरान न्यूनतम या बिना विघ्न के) सफेद या काली प्लास्टिक की चादर द्वारा ढ़कने से बिना ढ़की हुई मिट्टी की तुलना में तापमान की वृध्दि हो सकती है। इससे आरोबेंकी की ग्रस्तता में कमी हो सकती है। परम्परागत जुताई की अपेक्षा बिना जुताई वाली स्थिति में आतपन के प्रयोग से आरोबेंकी का बेहतर नियन्त्रण पाया गया है।

(स) सस्य क्रियाएं

  • पाश और अन्तर्वती फसलें : पाश फसलें जैसे अलसी (लाइनस यूसिटेटिसम लि.), सेम (फेसियोलस प्रजाति) आदि बिना आत्म क्षति के भूँईफोड़ बीजों का अंकुरण करती है। अन्तर्वती फसलें जैसे बरसीम (ट्राइफोलियम ऐलेग्जेण्ड्रिनम लि.) और लाल मिर्च (कैप्सिकम फ्रूटेसेन्स लि.) भी भूँईफोड़ प्रकोप के प्रति अति सवेंदनशील है।
  • अधिक प्रकोप वाले क्षेत्रों में सरसों की फसल ट्रेप क्रोप के रूप में बोनी चाहिये। 30-40 दिन में परजीवी के पौधैं बाहर निकलते दिखाई देवे तो नवम्बर के अन्त में गहरी जुताई करके सरसों सहित इसके भूमिगत तने को नष्ट कर देना चाहिये। इसके बाद अन्य फसल की बोवाई करनी चाहिए।
  • फसल-चक्रसंवेदनशील फसलों की उसी खेत में बारम्बार बिजाई को कम किया जाना चाहिए। जौ, गेहूं, अरण्डी और दालें (चना) बहुत प्रभावी हो सकती है। फसल-चक्र बहुत ही प्रभावी है और सामान्यत: प्रयोग किया जाता है जहां तक हो सके सरसों की फसल विकल्प वर्षों में लेनी चाहिए और किस्म भी बदलनी चाहिए ताकि परजीवी को विविध किस्में मिल सके। हैं। इस प्रकार फसल चक्र अपनाने से इस परजीवी को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित किया जा सकता हैं या लम्बे समय तक फसल चक्र अपनाकर इसकी उग्रता को रोका जा सकता हैं।
  • बिजाई का समय एंव फसल घनत्व% निश्चित परिस्थितियों में देरी से बिजाई द्वारा बीज अंकुरण के अनुकूल तापमान में परिवर्तन करके खरपतवार की परजीविता को कम किया जा सकता है। भारत में जल्दी बिजाई इस खरपतवार के अंकुरण को कम करने में सहायक हा ेसकती है, जिसका कारण तापमान का अनुकूलतम से अधिक होना है। बीज की मात्रा में की गई वृध्दि से स्पर्धा और संलगनों की संख्या में कमी हो सकती है
  • परपोषी-पादप प्रतिरोध/सहनशीलता% सरसों की परजीवी रोगरोधी किस्म, आर.आर.एन. 593 (दुर्गामणी) आरोबेंकी के प्रति सहनशील/प्रतिरोधक पाई गई है। सरसों की दुर्गामणि की बुवाई करें।
  • जल-प्लावन% अधिक नमी व जल-प्लावन इस परजीवी की वृध्दि एवं परिवर्ध्दन के लिए उपयुक्त नहीं है। खुली सिंचाई की तुलना में फव्वारा सिंचाई या सुरक्षित नमी के अंतर्गत उगाई गई राया/सरसों में भूँईफोड़ों की ग्रस्तता कम पाई गई।
  • पोषक-तत्वों का प्रबंध/नत्रजन उर्वरकों का प्रयोग% परजीवी पौधे कम उर्वरता वाली भूमि पर अधिक उगते हैं । सामान्यत: नत्रजन की नाइट्रेट अवस्था की तुलना में अमोनिकल अवस्था भूँईफोड के प्रति ज्यादा निरोधक है। अमोनियम नाइट्रेट से भी अंकुरण व मूलाकुंर की लम्बाई में कमी होती है।

(द) जैविक नियन्त्रण 

  • फ़ाइटोमाइज़ा आरोबेंकिया % एक-एक करके अण्डा परपोषी पौधों की दरारों में देती है। भिण्ड या तो बीजकोष में या फिर तने की सुंरगो में खाता है। यह अपना विकास 25 से 30 दिन के बीच पूरा करती है व औसतन 4 भिण्ड पैदा करती है तथा प्रतिवर्ष 2-4 पीढ़िया पूरी कर लेती हैं।
  • रोगाणु : भारत में एकमात्र फंफूदी स्कलेरोट्रीयम रॉल्फसाई का पता 1977 में लगा था। फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरियम वेरायटी आर्थोसिरस आ. इजिप्टियाका कपोलों के उद्गमन को 90-97 प्रतिशत तक कम करती है। अन्य फफूंदियां जो कि आरोबेंकी पर प्रभावी है वे राइजोक्टोनिया प्रजातियां व आल्टरनेरिया प्रजातियां हैं।

(य) रासायनिक विधियां

1960 के दशक में अंत में 200 से भी अधिक शाकनाशियों का आ. इजिप्टियाका के बीज अंकुरण पर परीक्षण किया गया लेकिन बदलती फसल-पध्दतियां एंव वातावरणीय स्थितियां सुनिश्चित मात्रा और समय की मांग करती है।

  • मृदा प्रधूमक: मृदा प्रधूमकों जेसै मिथाइल ब्रोमाइड, भूँईफोड़ नियन्त्रण हेतु सबसे अधिक प्रभावी है।एम. बी. सक्रियता हेतु 70 प्रतिशत क्षेत्र जलधारण क्षमता व अच्छी तरह से जुती हुई भूमि जरूरी है और इसके लिए प्लास्टिक का पलवार विछाना आवश्यक है।
  • अंकुरण उत्तोजक% भूँईफोड़ नियन्त्रण हेतु शाकनाशियों सहित प्राकृतिक एवं कृत्रिम उत्तोजक प्रभावी साधन के रूप में बहुत सम्भावनाएं रखते हैं। परपोषी पौधों की अनुपस्थिति में उत्तोजक भूँईफोड़-अंकुरण को उकसा सकते है जिससे कि यह खरपतवार''आत्मघात अंकुरण'' का शिकार हो जाते हैं। स्ट्राइगोल सादृष्य जी.आर. 24 का 1-1.0 पी.पी.एम. की दर से प्रयोग करना बहुत ही प्रभावी है तथा 10-20 पी.पी.एम. जिब्रेलिक अम्ल इसका अनुसरण करता है।
  • ताँबे का भूँईफोड़ के बीज अंकुरण एवं नवपादप-परिवर्ध्दन पर नकारात्मक असर पाया गया है और राजस्थानमें 1000 लि./है. मात्रा में 25 प्रतिशत नीलेथोथे/कॉपर सल्फेट के घोल का ग्रसित भूमि पर छिड़काव करनेसे परजीवी के नष्ट होने का वर्णन किया गया है। पौधों की भूमि की सतह के पास 25 प्रतिशत ताम्रघोल का छिड़काव करने से परजीवी नष्ट किये जा सकते हैं।
  • आरोबैंकी पौधों पर सोयाबीन के तेल की 2 बूंदे प्रति कोपल (निर्गमनोत्तार) ड़ाल देने से पौधा मर जाता हैं। सरसों की पैदावार में वृध्दि पाई गई।
  • ओरोबैंकी पर 4 प्रतिशत ग्लाईफोसेट का सीधा छिड़काव करने से परजीवी नष्ट किये जा सकते हैं। ग्लाइफोसेट आसानी से भूमिगत हिस्सों, अपरिपक्व पत्तिायों और विभज्योतकों में स्थानातरित हो जाता है। इसकी कार्य-विधि एन्जाइम को बाधित करना है ।
  • ग्लाइफोसेट (60 ग्रा./है.) की घटी हुई मात्रा + नत्रजन, फॉस्फोरस, पोटाश उर्वरकों (1:1:2) से नियन्त्रण क्षमता में वृध्दि हुई और फसल को होने वाली पादप विषाक्तता में कमी आई।
  • ति‍लहनी तोरिया के पौधों में पाया जाने वाला एक संसोधित इनोल फास्फेट-शिकिमेट फास्फेट सिन्थेज (इ.एस.पी.एस.), जोकि ग्लाइफोसेट प्रतिरोधी है, के कारण, ग्लाइफोसेट डालने से भँईफोड़ का उत्तम नियन्त्रण पाया गया है।

 लेखक

लोकेश कुमार जैन

सहायक प्राध्यापक, कृषि महाविद्यालय, सुमेरपुर

(कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर)

This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.