Weeds in the vegetables and their management

एक विशेष स्थिति में अवांछनीय पौधे खरपतवार माने जाते है। सब्‍जी फसलों में खरपतावार के कारण उत्‍पादन तथा गुणवत्‍ता में महत्‍वपूर्ण कमी होती है। अत: इन फसलों में समय पर खरपतवार नि‍यंत्रण अतयंत आवश्‍यक सस्‍य क्रि‍या है। सब्जी की फसल को अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक दुरी पर लगाते हैं जिससे खरपतवार की बढवार के लिए अनुकूल वातावरण प्राप्त होता है और वे अधिक वृद्धि करते हैं।

फसल में खरपतवार के लक्षण

  1. ये प्राकृतिक रूप से स्थाई प्रवृति वाले होते हैं।
  2. ये एक, दो तथा बहुवर्षीय होते हैं।
  3. इनमें विषम परिस्थितियों में उतर जीवित रहने की क्षमता पाई जाती है।
  4. इनमें फूल, फल तथा बीज जल्दी तथा अधिक संख्या में बनते हैं।
  5. इनमें परिपक्वता जल्दी आ जाती है।
  6. इनके बीज अगर अनुकूल परिस्थिति नहीं प्राप्त करते हैं तब भी काफी लम्बे समय तक स्वस्थ तथा योग्य अवस्था में भूमि में पड़े रहते हैं।
  7. यह फसलों की अपेक्षा प्रति पौधा लाखों की तादाद में बीज पैदा करते हैं।
  8. खरपतवार बीजों के अतिरिक्त अपने अन्य कायिक भागों से भी वंश वृद्धि करते हैं। जैसे- दूब घास तने से, हिरनखुरी जड़ों से, कांस प्रकंदों द्वारा तथा पत्तियों द्वारा भी कई खरपतवार उग आते हैं।
  9. जड़ें काफी गहरी जाती हैं और वे अपनी राइजमों में काफी समय तक के लिए भोजन एकत्रित कर लेती हैं।
  10. इनके बीजों की बनावट, रंग, आकार सहचर फसलों के समान होता है जैसे प्याज व जंगली प्याज के बीज आकार-प्रकार में काफी मिलते-जुलते हैं।
  11. प्रतिकूल दशाओं में भी जैसे- कम नमी में, बंजर जमीन में, कीटों व रोगों के आक्रमण के बावजूद सब्जी की फसलों की अपेक्षा अच्छी वृद्धि करते हैं।
  12. इनके बीज विषम परिस्थितियों में भी अंकुरण क्षमता रखते हैं।
  13. इनको नियंत्रित करने के लिए अधिक मजदूर, विशेष उपकरण व रसायन की आवश्यकता होती है जो उत्पादन लगत को कम करती है।

सब्जियों में खरपतवार की समस्या अन्य फसलों से अधिक के कारण:-

  1. सब्जी की फसल को अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक दुरी पर लगाते हैं जिससे खरपतवार की बढवार के लिए अनुकूल वातावरण प्राप्त होता है और वे अधिक वृद्धि करते हैं।
  2. सब्जी की फसलों को अधिक खाद व उर्वरक की आवश्यकता होती है जो खरपतवारों की वृद्धि को प्रोत्साहित करते हैं।
  3. सब्जी में कम मात्रा में परन्तु थोड़े समय बाद ही सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है जिससे खरपतवारों के बीज आसानी से अंकुरित हो जाते हैं।
  4. अधिकांश सब्जियां प्रारम्भ में धीमी गति से वृद्धि करने वाली होती हैं अत: वे खरपतवारों की वृद्धि के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती हैं। जब खरपतवारों की संख्या अधिक हो जाती है तो सब्जियाँ उनके साथ प्रतियोगिता नहीं कर पाती हैं।

खरपतवार से सब्‍जी फसल को होने वाली हानि:-

  1. भूमि में उपस्थित पोषक तत्व तथा भूमि में प्रयोग किये गये उर्वरक को खरपतवार ग्रहण करते हैं जिससे फसल पोषक तत्वों का समुचित प्रयोग नहीं कर पाती है।
  2. खरपतवार, जल, वायु, सूर्य का प्रकाश तथा स्थान के लिए फसल के पौधों से प्रतियोगिता करते हैं तथा बढवार को प्रभावित करते हैं।
  3. खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए अधिक मजदूर, नये यंत्र तथा रसायनिक दवाओं का प्रयोग करना पड़ता है, ये न केवल उत्पादन लागत को बढाते हैं बल्कि उत्पाद को भी प्रदूषित करते हैं।
  4. रसायनिक दवाओं के प्रयोग से उत्पाद की गुणवता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  5. खरपतवार हानिकारक कीटों-जीवों आदि को प्रतिकूल तथा अनुकूल परिस्थितियों में आश्रम देते हैं जिससे फसलों में बिमारियों व कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है तथा उत्पादन में कमी आती है।
  6. खरपतवार मानव स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं।
  7. खरपतवारों में बड़े तथा अधिक संख्या में पत्ते निकलते हैं जो सब्जी के पौधों को छाया प्रदान करते हैं जिससे पौधों में प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होता है।

खरपतवार प्रबंधन:-

खरपतवार का उन्मूलन करना असंभव कार्य है क्योंकि इनका विस्तार एक खेत से दूसरे खेत में होता है जैसे बीज, कंदों, प्रकंदों तथा जड़ के द्वारा। यदि फसल में उगने वाले खरपतवारों को समय से नियंत्रित नहीं किया जाये तो हमारी सारी मेहनत बेकार चली जाती है। अत: खरपतवारों को उचित समय पर सफलतापूर्वक प्रबंधन लागत को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए। अत: निम्नांकित विधियों को अपनाकर खरपतवार को नियंत्रित किया जा सकता है।

निरोधी या बचाव विधि:-

इसके अंतर्गत वे सभी विधियां सम्मिलित हैं, जिनके द्वारा किसी क्षेत्र में नये खरपतवार के प्रवेश पर रोक लगाई जा सकती है:-

  1. सड़ी खाद का प्रयोग करें।
  2. शुद्ध बीज का प्रयोग करें।
  3. खरपतवार मुक्त पशु चारे का प्रयोग करें।
  4. स्वच्छ उपकरण का उपयोग।
  5. सिंचाई नालियों को खरपतवार मुक्त रखना।
  6. खरपतवार से प्रभावित क्षेत्रों में चरने वाले जानवरों को स्वच्छ फसल वाले क्षेत्र में जाने से रोकना।
  7. खेत की मेड़ों को खरपतवार मुक्त रखना।

खरपतवार उन्मूलन:-

खरपतवार उन्मूलन में क्षेत्र से खरपतवारों के सभी जीवित अंगों तथा बीजों को पूर्णतया निष्कासित करते हैं। यह काफी खर्चीली विधि है। खरपतवार उन्मूलन के लिए रसायनों का प्रयोग किया जाता है जिससे  खरपतवार नष्ट हों, परन्तु कई बार यह व्यय भूमि की कीमत से भी अधिक हो जाता है।

खरपतवारों नियंत्रण:-

खरपतवारों के संक्रमण को उस सीमा तक घटाना जिससे वे फसल के साथ प्रतियोगिता न कर सके तथा फसल उत्पादन पर कोई प्रभाव न पड़ सके एवं लाभप्रद उत्पादन संभव हो। फसल एवं खरपतवार प्रतियोगिता विधि: इस विधि का मूल उद्देश्य है ऐसे उपाय किये जाये जिससे खरपतवारों की बढवार कम हो तथा फसलों को कम से कम हानि हो। इनमें निम्न बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है:

  1. खेतों में खरपतवार से प्रतियोगिता रखने वाली फसल उगाना।
  2. तेजी से वृद्धि करने वाली किस्मों को लगाना ताकि खरपतवार की बढ़वार को रोक सके तथा उसे स्थान, हवा, पोषक तत्व तथा प्रकाश कम मात्रा में उपलब्ध हों।
  3. कम वृद्धि करने वाली सब्जियों के पौधे को आस – पास लगाना तथा बीज की मात्रा प्रति एकड़ बढ़ाकर उपयोग करना।
  4. साफ-सुथरे बीज बोना, जिसमें खरपतवार के बीज न हों तथा फसल चक्र अपनाना ताकि खरपतवारों को उगने में कठिनाई हों।

कृषि विधि:-

इस विधि में सस्य संवधि पद्धति अपनाकर खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है, इनमे ऐसी परिस्थिति पैदा की जाती है जिससे सब्जी में पौधे खरपतवारों की बढ़वार को दबाएँ रखें। इसके अंतर्गत निम्न पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं जो निम्न हैं।

  1. फसल उगने से पहले खेत की 2 – 3 गहरी जुताई करनी चाहिए।
  2. उचित फसलों का चयन।
  3. उचित फसल चक्र का प्रयोग।
  4. गर्मी में खेत को परती रखना।
  5. ऐसी किस्मों का प्रयोग करना जो अधिक बढ़वार व फैलाव के कारण खरपतवारों को ढक लें।
  6. साफ-सुथरे बीज का प्रयोग करना चाहिए, जिसमे खरपतवार के बीज न हो।
  7. गर्मियों में खेत की गहरी जुताई तथा जुताई से पूर्व खरपतवार को जला देना चाहिए, जिसमें खरपतवार के बीज नष्ट हो जाएं।
  8. अगेती किस्मों को उगाना चाहिए ताकि खरपतवारों को उगने का मौका न मिल सके।
  9. उर्वरक का प्रयोग पौधों की जड़ों के पास ही करना चाहिए ताकि अधिक से अधिक पोषक तत्व पौधों को प्राप्त हो सकें ।
  10. कार्बनिक मल्च (पलवार) तथा पॉलिथिन मल्च का प्रयोग करें

यांत्रिक विधि:

  1. हाथ से खरपतवार उखाडऩा: यह विधि व्यावहारिक है तथा इससे खरपतवार नियंत्रण छोटे क्षेत्र पर नियंत्रित किया जा सकता है।
  2. खाली खेतों में उगे खरपतवार को तथा बीज या पौध लगाने से पहले जलाकर खरपतवारों को नष्ट किया जाता है।
  3. खरपतवार में बीज बनने से पहले या फूल आने की अवस्था में इस विधि का प्रयोग किया जा सकता है ताकि खरपतवारों की संख्या को अगले मौसम में नियंत्रित किया जा सके।
  4. पड़ती खेतों में पानी भरकर बहुवर्षीय खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है।  
  5. अधिक दूरी पर लगाई जाने वाली सब्जी में मल्च बिछाकर खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है।

जैविक विधि:

प्राकृतिक शत्रुओं को प्रयोग में लाना ताकि वे फसल के पौधों को नुकसान न पहुंचाए। इस विधि में सामान्यत: कीटों का प्रयोग किया जाता है जो खरपतवारों के फूल तथा फल एवं बीज को खाते हैं तथा फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाते।

खरपतवार नि‍यंत्रण की रसायनिक विधि :

खरपतवारों की वृद्धि को रोकने तथा उनको नष्ट करने के लिए रसायनों का प्रयोग आजकल काफी प्रचलित है । सब्जियों में खरपतवार नियंत्रण मुख्यत: हाथों से किया जाता है, परन्तु इसमें अधिक श्रम की आवश्यकता होती है जिससे उत्पादन लागत में काफी वृद्धि हो जाती है।

आजकल शाकनाशी के प्रयोग पर काफी बल दिया जा रहा है पर सब्जियों में रसायनिक खरपतवार नियंत्रण कम पैमाने पर करना चाहिए। इसका कारण यह है कि सब्जियों को हम अपरिचित अवस्था में प्रयोग करते हैं जिससे हानिकारक रसायनों की कुछ मात्रा पौधों में रह जाती है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है। किसानों को शाकनाशी के प्रयोग में काफी परेशानी भी आती है तथा यह शाकनाशी काफी महंगे है तथा किसानों को इन शाकनाशी की विस्तृत जानकारी भी नहीं होती है।

शाकनाशियों के प्रयोग के लिए आवश्यक पूर्व दशाएं:-

  1. प्रयोग से पहले उन पर लिखे निर्देशों को अच्छी तरह पढ़ लेना चाहिए।
  2.  संस्तुत मात्रा का ही प्रयोग करना चाहिए।
  3.   शाकनाशी के उपयोग से पहले या बाद में छिड़काव यंत्र को अच्छी तरह धोकर साफ कर लेना चाहिए।
  4.  रसायनों को निकटवर्ती क्षेत्रों में बहकर जाने से रोकना चाहिए।
  5.  छिड़काव यंत्र के टैंक तली में रसायन के घोल को बैठने से रोकने के लिए उसे निरंतर हिलाते रहना चाहिए।
  6.  रसायनों का प्रयोग सुबह या शाम के समय करना चाहिए।
  7. छिड़काव के दौरान गति नियंत्रित रखनी चाहिए जिससे समूचे क्षेत्र में छिड़काव समान रूप से हो।
  8.  रसायनों का प्रयोग करते समय नाक तथा मुंह को अच्छी तरह ढक लेना चाहिए।
  9.  शाकनाशी का प्रयोग हवा की दिशा में तथा नोजल के साथ प्रयोग करना चाहिए।
  10.   किसी मनुष्य पर शाकनाशी का कुप्रभाव पडऩे की दशा में स्थानीय डॉक्टर से तुरंत सम्पर्क करें।

 Authors

1तारा यादव, 2रामावतार यादव एवं 3डॉ वीर सिंह1

शोध छात्रा, विद्यानवाचस्पति (कीट विज्ञान) राजस्थान कृषि अनुसांधान संस्थान, दुर्गापुरा,

2शोध छात्र, विद्यानवाचस्पति, 3आचार्य, कीट विज्ञान विभाग, कृषि महाविद्यालय, बीकानेर 

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