Protection of Autumn Planted Sugarcane Crop from Subterranean Pests - Krishisewa

Protection of Autumn Planted Sugarcane Crop from Subterranean Pests 

गन्ना एक प्रमुख नगदी फसल है जिस पर चीनी उद्योग का अधिकांश भाग निर्भर करता है। गन्ना अन्य फसलों की अपेक्षा लम्बी अवधि की फसल है। यह वर्ष के हर एक मौसम से गुजरते हुए अपना जीवन काल पूरा करती है। गन्ना में विद्यमान मिठास के कारण फसल की रोपाई से लेकर कटाई तक हानिकारक कीटों का आक्रमण होता रहता है।

गन्ना को क्षति पहुँचाने वाले कीटों का प्रकार एवं क्षति की सीमा, कृषि जलवायु एवं अपनाएं गई सस्य क्रियाओं पर निर्भर करता है। गन्ना फसल की रोपाई आजकल संसाधन उपलब्ध होने पर वर्ष में किसी भी समय कर सकते हैं। परन्तु सामान्यतया गन्ना की रोपाई शरदकाल (अक्टूवर-नवम्वर) एवं वसंतकाल (फरवरी-मार्च) में किया जाना अधिक प्रचलित है।

शरदकालीन गन्ना फसल अधिक मुनाफा देती है क्योंकि इसके अन्तर्गत अन्तरवर्ती खेती का समावेश किया जा सकता है। ईख के साथ अर्न्तवर्ती फसल जैसे धनियां, मेथी, राजमा, गोभी, टमाटर, लहसुन, अजवायन, जीरा, मंगरैला आदि लगाकर अतिरिक्त आय की प्राप्ति हो जाती है। जबकि वसंतरोप में अन्तरवर्ती खेती का विकल्प नहीं हो पाता है।

इस प्रकार शरदकालीन फसल की काफी महत्ताा बढ़ जाती है। अत: फसल की कीटों से सुरक्षा करना नितान्त आवश्यक हो जाता है। गन्ना को हानि करने वाले कीटों को क्षति करने के आधार पर तीन श्रेणियों में में विभाजित किया जा सकता है जैसे छिद्रक कीट, रस चूसक कीट एवं भूमिगत कीट । कीटों से निजात पाने के लिए उनके उचित प्रबन्ध की आवश्यकता है। उनकी पहचान, क्षति के लक्षण, क्षति की सीमा, आपात के समय की जानकारी आवश्यक है।

भूमिगत कीटों के अन्तर्गत मुख्यत: दीमक, सफेद गड़ार एवं सैनिक कीट जिनका आक्रमण ईख की प्रारम्भिक अवस्था अर्थात रोपनी के समय से ही प्रारम्भ हो जाता है। प्रस्तुत लेख में शरदकालीन (अक्टूवर-नवम्बर) रोप में गन्ना को भूमिगत कीटों से सुरक्षा हेतु उनके प्रवन्धन की जानकारी दी जा रही है। जिसे गन्ना उत्पादक अपनाकर अपनी फसल को प्रारम्भिक अवस्था से ही सुरक्षित रख सकते हैं।

आपात अनुकूल परिस्थितियां :

  • खेत के आस-पास दीमक के माँद कीे उपस्थिति।
  • गर्म एवं शुष्क जलवायु की लम्बी अवधि।
  • जलवायु परिवर्तन पर अनियमित वर्षा।
  • बिना परीक्षण किये बाहरी गन्ने की प्रजाति का फसल चक्र में शामिल।
  • फसल का कमजोर होना।
  • फसल की निगरानी में लापरवाही एवं समय पर नियंत्रण न करना।
  • पेड़ी फसल का अधिक रकवा ।

गन्‍ने में दीमक का प्रकोप

दीमक एक बहुभक्षी कीट है और इसमें बहुरुपता पाई जाती है। इनके परिवार में पाँच सदस्य होते हैं। पंखधारी नर एवं मादा जो प्रकाश पर आकर्षित होते हैं। यह कीट अपने पंखों को गिरा देने के बाद राजा-रानी में परिणत हो जाते हैं। सामान्यतया एक परिवार में एक ही राजा-रानी होते हैं। यही एक स्थान से दूसरे स्थान में रहकर संख्या बढ़ाने का कार्य करते हैं।

दूसरे सदस्य के अर्न्तगत कमेरी जिसको पंख नहीं होते हैं। इसके जननांग अविकसित एवं सम्पूर्ण परिवार का पालन पोषण का भार इन्हीं के ऊपर होता है। यह कुल परिवार का 80 से 90 प्रतिशत तक होते हैं। सैनिक सदस्य का शरीर बड़ा एवं जवड़े काफी नुकीले होते हैं। यह केवल परिवार को रक्षा प्रदान करते हैं।

राजा अपेक्षाकृत छोटा होता है और सदैव रानी के साथ रहता है। इसका कार्य केवल प्रजनन करना होता है। रानी का वक्ष एवं सिर बहुत छोटे होते हैं तथा उदर काफी बड़ा और लम्बा होता है। रानी का कार्य केवल अण्डे देना है।

जीवन चक्र

जुलाई के महीने में जब काफी बरसात होती है तब पंखदार नर और मादा जो आगे चलकर राजा-रानी बनेंगे, उड़ान भरते हैं और आपस में संगम करते हैं। पंख बाद में दूट जाते हैं और भूमि पर गिर जाते हैं। इससे जो बचते हैं, वह भूमि के अन्दर घर बनाकर रहते हैं। मादा का उदर काफी फूल जाता है और लगभग 30 हजार से 80 हजार तक अण्डे देती है।

अण्डा पीला वृक्ताकार एवं चमकदार होता है। अण्डों से 2-3 दिन में निम्फ (शिशु) निकलते हैं और तुरन्त ही भोजन की तलाश में घूमने लगते हैं। बाद में कमेरी बनकर बाहर से भोजन एकत्र करते हैं। निम्फ से प्रौढ़ बनने तक लगभग 6-13 महीने लगते हैं और 4-5 बार निर्मोचन करते हैं।

पंख वाले नर और मादा बन जाते हैं जो कि बरसात में संध्या के समय में झुण्ड के झुण्ड निकलते हैं और 80-90 प्रतिशत कमेरी बनते हैं। इस प्रकार इनकी केवल एक ही पीढ़ी पाई जाती है।

दीमक से क्षति

इस कीट की कमेरी ही फसल को क्षति करती है जो मटमैले रंग की होती है और मुँह काला होता है। यह गन्ना की जड़ तथा स्तम्भ दोनों को खाकर क्षति करते हैं। आक्रांत पौधे सूख जाते हैं। आक्रान्त पौधों में मिट्टी भर जाती है। समय पर प्रबन्धन न किया गया तो सम्पूर्ण फसल भी नष्ट हो सकती है।

आपात काल

दीमक बहुभक्षी कीट होने के कारण गन्ना की फसल पर सालों भर आपात देखा जा सकता है। वर्षा ऋतु में प्रकोप में काफी कमी आ जाती है। खेत में नमी की कमी, बलुई एवं हल्की मिट्टी में दीमक का प्रकोप अधिक पाया जाता है। मुरहन फलस से खूंटी (पेड़ी) फसल पर अधिक आपात देखा गया है।

गन्‍ने मे सफेद गराड़ कीट का प्रकोप

इस कीट का शरीर मुलायम, सफेद, अंग्रेजी के 'सी' अक्षर के आकार के समान एवं मजबूत मुखांगों वाले होते हैं। इसके जीवनकाल में चार अवस्थाएँ होती हैं। प्यूपावस्था पूर्ण होने पर ये व्यस्क बन जाते हैं। प्रारम्भ में प्रौढ़ क्रीम रंग के होते हैं। बाद में उनका अगला पंख कठोर, भूरे हल्के लाल रंग का हो जाता है जो उसके शरीर को ढ़के हुए होता है।

जीवन चक्र

मादा सहवास के दो-तीन दिन पश्चात अण्डें देना प्रारम्भ कर देती हैं। अण्डें एक-एक करके जमीन में 10-15 सें0मी0 गहराई में सिंचाई नाली तथा वृक्षों के आस-पास दिये जाते हैं। एक मादा 50-60 अण्डे देती है।

अण्डे दूधिया रंग के 3 मि0मी0 लम्बे तथा 1.4 मि0मी0 चौड़े होते होते हैं। अण्डावस्था 8-10 दिन की होती है। अण्डे से ग्रव निकलता है जिसकी लम्बाई 53मि0मी0 तथा 7 मि0मी0 चौड़ाई होती है। ग्रव काल 8-10 सप्ताह का होता है।

ग्रव जब पूर्ण विकसित हो जाता है तो वह जमीन में 30-150 सें0मी0 आकार का माँद बनाकर सितम्बर के अन्तिम तथा अक्टूवर के प्रथम सप्ताह में प्यूपा में परिणत हो जाता है। मॉद अवस्था 12-16 दिन की होती है।

इसके बाद व्यस्क बन जाते हैं। नर 16 से 22 मि0मी0 लम्बा तथा 8.5 से 12 मि0मी0 चौड़ा होता है। मादा 16.5 से 22 मि0मी0 लम्बी तथा 9 से 12 मि0मी0 चौड़ी होती है। सम्पूर्ण जीवन काल 141 से 228 दिन का होता है। वयस्क प्रकाश की तरफ आकर्षित होते हैं।

गराड कीट से क्षति

पर्याप्त नमी तथा पोषक जड़ों के लम्बे समय तक उपलब्ध रहने पर कीट के वृध्दि में सहायक होते हैं। अनावश्यक रासायनिक कीटनाशी दवाओं का उपयोग करने परमित्र कीटों की कमी हो जाने पर भी कीट की जनसंख्या में बढ़ोत्तारी देखी जा सकती है।

गन्ना फसल के पास नीम, बबूल, आम इत्यादि वृक्षों के होने पर कीट के आपात में अत्यधिक वृध्दि होती है। यह कीट बरसात के पूर्व गन्ने को जड़ों एवंगन्ने के निचले भाग को अत्यधिक क्षति करता है। इस कीट का प्रकोप प्रारम्भ में खेत में जगह-जगह पर होता है।

महामारी का रुप हो जाने पर सम्पूर्ण फसल भी नष्ट हो सकती है। इस कीट के द्वारा फसल को लगभग 80 प्रतिशत तक नुकसान का अनुमान लगाया गया है।

आपात काल

इसकी ग्रव अवस्था ही फसल को क्षति करती है। भूमि के नीचे गन्ने की जड़ों एवं गन्ने के निचले भाग को ग्रसण कर हानि करते हैं। यह कीट पहली बरसात के बाद सक्रिय हो जाता है।

गन्‍ना फसल का सैनिक कीट

इस कीट का प्रौढ़ हल्का भूरा रंग का होता है तथा पिल्लू हल्का हरापन लिए हुए होता है। मादा अण्डें पत्तिायों की लीफसीथ के बीच पंक्तियों में या गुच्छों में या भूमि में रात के समय देती है। अण्डा प्रारम्भ मेंचमकीला सफेद या हल्का भूरा और धीरे-धीरे पीला होकर काला हो जाता है।

लार्वा मटमैला सफेद बाद में हरा रंग में परिणित हो जाता है। इस कीट के पिल्लू दिन में मिट्टी के अन्दर छिपे रहते हैं तथा रात में बाहर निकलकर पत्तिायों के मध्य शिरा को छोड़कर पत्तिायों के बाकी भाग को खा जाते हैं। इस कीट का आपात मानसून से पूर्व मार्च से जून तक पाया जाता है। मध्यम तापक्रम एवं आद्रता में इस कीट की वृध्दि अधिक होती है।

गन्‍ने के भूमिगत कीटों का समेकित प्रबंधन

फसल उत्पादन तकनीकों में समेकित कीट प्रबन्धन के अन्तर्गत खेत के चुनाव से लेकर फसल की कटाई तक की सभी क्रियाओं का समावेश है। इस विधि में नाशजीवों के नियन्त्रण हेतु वानस्पतिक उत्पादों जैविक नियन्त्रण, यांत्रिक नियंत्रण एवं रसायनों की संस्तुति की जाती है।

  • गन्ने के खेत में कच्ची गोबर की खाद का व्यवहार कदापि न करें क्योंकि कच्ची गोबर की खाद दीमक का प्रिय भोजन है।
  • खेत की कई वार गहरी जुताई करके अण्डे एवं शिशु नष्ट किये जा सकते हैं।
  • आक्रान्त गुल्लियों का रोपनी में व्यवहार न करें। गुल्लियों का चुनाव कीट मुक्त फसल से ही करना चाहिए।
  • खेत में उचित नमी की अवस्था में ही रोपनी करें।
  • गन्ने की रोपाई के पूर्व खेत में 75 कि0ग्रा0 नीम की खल्ली या 5 कि0ग्रा0 वेवीरिया वेसियाना फफूंद नासक को 100 कि0ग्रा0 सड़ी गोबर की खाद में मिलाकर प्रति हे0 की दर से व्यवहार करना चाहिए।
  • गुल्लियों को क्लोरोपायरीफॉस-20 ई0सी0 दवा का 5 मि0ली0/लीटर पानी के घोल में उपचारित कर रोपनी में प्रयोग करें।
  • पंक्तियों की आपस की दूरी 90 सें0मी0 से कम न रखें ताकि हवा एवं प्रकाश पर्याप्त मात्रा में मिलता रहे।
  • धान की फसल को गन्ने की फसल चक्र में अपनायें।
  • वर्षा ऋतु के पूर्व पानी की पहली फुहार पड़ने पर इनके वयस्क बाहर निकलते हैं उस समय नियंत्रण करना आसान होता है।
  • खेत में दीमक के माँद को खोजकर उन्हें नष्ट कर देना चाहिए।
  • प्रकाशपाश का प्रयोग कर इन्हें एकत्र कर नष्ट किया जा सकता है। प्रकाशपाश की ऊँचाई फसल की ऊँचाई के बराबर या थोड़ा ऊपर होना चाहिए।
  • मई-जून माह में पिल्लू नियंत्रण हेतु क्र्वानलफोस-5 जी का 5 कि0ग्रा0 अथवा क्लोरोपायरीफॉस 20 ई0सी0 का 5 लीटर प्रति हे0 की दर से देना चाहिए।
  • सफेद गिराड़ के वयस्क निकलकर जब पेड़ों पर एकत्रित होते हैं उस समय मोनोक्रोटोफोस 40 ई0सी0 का 1 मि0मी0/लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से उनको नष्ट किया जा सकता है।
  • परभक्षी पक्षी उल्लू, कौआ, चमगादड़ इत्यादि का संरक्षण उन कीटों की रोकथाम के लिए अत्यन्त उपयोगी है।
  • दीमक के नियन्त्रण हेतु 22 लीटर नीम तेल 220 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हे0 की दर से व्यवहार किया जा सकता है।
  • दीमक के अधिक आपात की स्थिति में खेत में पानी कम से कम नौ इंच भर देना चाहिए।

Authors:

डा0 हरी चन्द, अनिल कुमार एवं नागेन्द्र कुमार

कीट विज्ञान विभाग

डा0 राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर-848 125, बिहार

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