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सरल भाषा में प्रोबायोटिक का मतलब ‘जीवन से सम्बन्धित है’ यह शब्द ग्रीक भाषा से उत्त्पन्न हुआ है. प्रोबायोटिक सबसे पहले वर्नर कोल्थ ने १९५३ में दिया था. वास्तविक परिभाषा में प्रोबायोटिक एक ऐसा तत्व है जो एक जीव से पैदा होता है तथा दूसरे की वृद्धि में सहायक होता है. इसको हम दूसरे रूप में कह सकते है, एक जीवित सूक्ष्मजीव जो मेजबान के शरीर में आंत में रह रहे सूक्ष्मजीवों के बीच में संतुलन बनाए रखता है. लेक्टोबेसिल्स और बयोफिडम सबसे ज्यादा उपयोगी व लाभकारी प्रोबायोटिक जीवाणु है.

शरीर के अन्दर एक तन्त्र होता है जो लाभदायक और हानिकारक जीवाणुओं में अंतर बता सकता है. शरीर में आंत के अन्दर हानिकारक और जहरीले जीवाणु बीमारी उत्त्पन्न करते हैं जैसे-दस्त लगना, पेट में दर्द होना, उल्टी आना इत्यादि. कोलास्ट्रडियम डिफिसल एक ऐसा हानिकारक जीवाणु है जिससे उत्त्पन्न jajजटिलताएँ बार-बार व लम्बे समय तक एंटीबायोटिक लेने पर भी रह जाते हैं.

 

प्रोबायोटिक अपनी प्राकृतिक अवस्था में या उनके बीजाणु रूप में हो सकता है. बीजाणु रूप में प्रोबायोटिक एक लम्बे समय तक जीवित रहता है और यह पेट के माध्यम से बह्दान्त्र gaas(गैसट्रओ इंटेसटिनल ट्रैक्ट) तक पहुंचता है व आगे बढना शुरू करता है. यहां पहुंचकर बैक्टीरिया की शक्ति स्वस्थ कालोनियों को विकसित करता है तथा बह्दान्त्र की दीवार से जुड़ा रहता है.

प्रोबायोटिक के रूप में अहर्ता प्राप्त करने के लिए मानदंड:-

 सामान्यता, एक जीवाणु को प्रोबायोटिक के रूप में प्रयोग करने के लिए निम्नलिखित गुण होने चाहिए.

  • प्रोबायोटिक गैर रोगजनक होना चाहिए जो मेजबान के स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाएं.
  • यह उत्पाद के शैल्फ जीवन तक जीवित रहना चाहिए.
  • यह मेजबान द्वारा स्वीकार्य होना चाहिए.
  • इसके अन्दर प्रतिरोध जीन या एंटीबायोटिक प्रतिरोध जीन नहीं होने चाहिए तथा विषाणुओं के विरुद्ध प्रतिरोधी गतिविधियों दिखाने में सक्ष्म होना चाहिए.

प्रोबायोटिक के रूप में बैक्टीरियल स्त्रोत:-

आमतौर पर, लैक्टिक एसिड बैक्टिरिया प्रयोगशाला में व्यापक रूप से मानवीय और स्थलीय पशु प्रयोजनों के शोध के लिए प्रयोग किया जाता है. लैटिक एसिड बैक्टिरिया आसानी से मनुष्य की आंत में रह सकते हैं, इनमें आंत का अम्लीय व क्षारीय वातावरण सहन करने की क्षमता होती है. ये बैक्टिरिया लेक्टोज को लेक्टिक एसिड में बदल कर आंत की पी.अच. को कम कर देते हैं तथा हानिकारक बैक्टिरिया को इकटठा होने से रोकते हैं. सबसे ज्यादा शोध में प्रयोग होने वाले व उपयोगी लेक्टिक एसिड बैक्टिरिया लेक्टो बेसीलाई व बाई-फिडोबैक्टिरिया हैं. अन्य सामान्यत: अध्ययन प्रोबायोटिक में बीजाणु बनाने वाले बेसिलस व खमीर हैं. बेसिलस प्रजाति में चिपके रहने की क्षमता के अलावा, रोध प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने वाले प्रोटीन उत्पन्न करना तथा रोगों से लड़ने की शक्ति देना हैं. प्रोबायोटिक बैक्टिरिया की सूची जो मुख्य रूप से प्रयुक्त होती है, नीचे दी गई हैं.

लक्टोबेसिलस प्रजातियां:-

लक्टोबेसिलस एसिडोफिल्स, एल. केसी, एल. फर्मनटम, एल. गेजर, एल. जोह्न्सोनाई, एल. लेक्टिस, एल. पैराकेसी, एल. पलानटेरम, एल. रुटेरी, एल. रमनोसस, एल. सालिवेरियस.

बाईफिडोबैक्टिरिया प्रजातियां:

बी. बायोंफिड्म, बी. ब्रेव, बी. लेक्टिस, बी. लोन्गम.

स्ट्रेपटोकोक्स प्रजातियां:-

एस. थर्मोफिल्स.

प्रोबायोटिक के रूप में गैर- बैक्टीरियल स्त्रोत-खमीर, स्क्रोमायसिस क्रीविसिस, इन्हेँ साधारणतया प्रतिरोधक क्षमता को उत्तेजित करने के रूप में अध्ययन किया जाता हैं. खमीर में प्रोबायोटिक्स वाले भी कुछ गुण विधमान हैं. खमीर एंटीबायोटिक दवाओं से प्रभावित नहीँ होता हैं. यह प्रोबायोटिक की जीवाणुरोधी चयापचयों की उपस्थिति में समान्यता: सूक्ष्मजीवों में गडबड़ी को रोकने के लिए की गई तैयारी में लाभप्रद हैं.

प्रोबायोटिक का कार्य करने का तन्त्र

विरोधी यौगिकों का उत्पादन:-

विरोधी यौगिकों से अभिप्रय है ऐसे रसायनिक पदार्थ जो बैक्टिरिया द्वारा उत्पन्न होते है तथा अन्य हानिकारक जीवों के लिए विषयुक्त और निरोधात्मक हैं. इन पदार्थों को प्राथमिक या माध्यमिक चयापचयों के दवारा उत्पन्न कर सकते हैं ओंर इसलिए, निरोधात्मक कार्यवाई के भी विभिन्न तरीके हैं. सूक्ष्मजीवों  की आबादी ऐसे रसायनिक पदार्थ उत्पन्न करती है जो दूसरे सूक्ष्मजीवों की आबादी पर जीवाणुनाशक प्रभाव डालती है. ऐसे बैक्टिरिया जो निरोधात्मक पदार्थ उत्पन्न करते हैं, विषाणुओं की वृद्धि में रूकावट पैदा करते हैं. साधारणतया, बैक्टिरिया का एंटीबैक्टीरियल प्रभाव (अकेले या समूह में) निमनलिखित कारणों से हो सकता है.

  • एंटीबायोटिक का उत्पादन.
  • बैक्टिरियोसिन, लाईसोजाइम, प्रोटिएजिज और हाइड्रोजन प्रोक्साईड का उत्पादन.
  • रसायनिक पदाथों के उत्पादन से पी.एच. वैल्यू में अंतर आना.

अन्य निरोधात्मक जीवाणुओं द्वारा उत्पादित योगिकों में कार्बोनिक अम्ल, हाइड्रोजन पराक्साइड, कार्बनडाईओक्साइड और सिडेरोफोर्स सामिल हैं. बेक्ट्रियोसिन प्रोटीन के उत्पाद हैं जो बेक्टीरिया से उत्पन्न होकर दूसरे जीवाणुओं को रोकने व मारने में सहायक है.

रसायनिक व उपलब्ध ऊर्जा के लिए प्रतियोगिता:-

अलग माइक्रोबियल आबादी का एक ही पारिस्थितिकी तंत्र में एक ही समय में रहना, रसायनिक व उपलब्ध ऊर्जा की प्रतियोगिता से निर्धारित किया जा सकता हैं. लगभग सभी सूक्ष्मजीवों के विकास के लिए आयरन की आवश्यकता होती है, आयरन पृथ्वी पर सबसे प्रचूर मात्रा में संक्रमण धातु है, इसकी विलयता बहुत कम है. इसलिए इसकी जैव उपलब्धता भी कम है. सिडेरोफोर  (लोहे का आयरन विशेष चिलेटिंग एजेन्ट) का आण्विक वजन कम है, यह उपजी लोहे को घोल सकता है तथा इसे सूक्ष्मजीवों के विकास के लिए उपलब्ध करा सकता है. सिडेरोफोर का परिस्तिथिक महत्व, लोहे की कमी महसूस करने वाले उत्तकों और शरीर  के तरल पदार्थों से जाना जा सकता है. यह एक आवश्यक पोषक तत्व को पर्यावरण से साफ कर देता है, जिससे प्रतियोगी वंचित रह जाते हैं. गैर- रोगजनक बैक्टीरिया जो सिडेरोफोर को उत्त्पन्न कर सकते, लोहे के लिए सफलतापूर्वक और मेजबान के उत्तकों और शरीर के तरल पदार्थ का अत्याधिक लोहे पर जोर देने व वातावरण में प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम होते है. इन्हें प्रोबायोटिक्स के रूप में प्रयोग किया जा सकता हैं.

आसंजन ब्लॉग के लिए प्रतियोगिता:-

एक संभव तन्त्र जो जीवाणुओं के उपनिवेशन को रोकने के लिए सहायक है, वह पेट या अन्य उत्तकों की सतहों पर आसंजन साइटों के लिए प्रतिस्पर्धा करता है. उत्तक सतह के बैक्टीरिया, आसंजन के बाद से रोगजनक संक्रमण के प्रारंभिक चरणों के दौरान महत्वपूर्ण होते है. आसंजन रिसेप्टर्स के लिए रोगजनक के साथ प्रतिस्पर्धा पहला प्रभाव हो सकता है. अवांछनीय आसंजन, भौतिक कारकों पर आधारित या विशिष्ट हो सकता है. पक्षपाती बेक्टीरिया और कोशिकाएं रिसेप्टर अणु की सतह पर आसंजन अणुओं को शामिल कर सकते हैं.

रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि:

इम्यूनो उत्तेजित पदार्थ वह रासायनिक यौगिक है जो जिवित प्राणियों की विषाणु, जीवाणु, कवक और परजीवी द्वारा संक्रमण के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली को और अधिक सक्रीय करता है. आतसमिजाज (वार्म-ब्लडिड) पशुओं के साथ प्रयोग में प्राप्त टिप्पनियों से संकेत मिलता है कि मौखिक रूप से प्रशासित प्रोबायोटिक बेक्टीरिया आंतो का संक्रमण बढ़ने में प्रतिरोध उत्त्पन्न करते है. यह भी सुझाव दिया गया है कि बेक्टीरिया, कोड व हेरिंग लार्वा में विकासशील प्रतिरक्षा प्रणाली की उत्तेजना में सहायक है.

औपनिवेशीकरण (कोलोनाइजेशन) व आसंजन :-

प्रोबायोटिक की नियमित आधार पर की गई आपूर्ति, उपनिवेश व मेजबान या उसके वातावरण में उपस्थित रहने में सहायक है. पेट या मेजबान की एक बाहरी सतह का उपनिवेश तथा बलगम परत के साथ आसंजन, तनाव की क्षमता, अच्छे प्रोबायोटिक्स के बीच प्रारंभिक चुनाव के लिए अच्छा मापदंड हो सकता है. प्रोबायोटिक, आंतों की सतह पर रोगजनक बैक्टीरियल लगाव की रोकथाम की प्रतिस्पर्धा है. इसलिए कुछ प्रोबायोटिक्स उपभेदों को उनकी क्षमता के अनुसार माना गया है.

पानी की गुणवत्ता में सुधार:-

कई अध्ययनों में प्रोबायोटिक्स विशेष रूप से बेसीलस सपी. को पानी की गुणवत्ता को सुधारने के रूप में दर्ज किया गया है. तर्क है कि ग्राम पॉजिटिव दण्डाणु सपी. आमतौर पर कार्बनडाईओक्साइड को वापस कार्बन पदार्थ से परिवर्तित करने में ग्राम नेगेटिव से ज्यादा सक्षम होते है. निरोधात्मक यौगिक जो प्रोबायोटिक्स द्वारा उत्तपन्न किए जाते है जैसे- बैक्टीरियोसिन, लाइसोजाइम, प्रोटीएजिज और हाइड्रोजन पराक्साइड, रोगजनकों के प्रतिकूल वातावरण बनाते हैं.

निष्कर्ष:- यह प्रलेखित है कि स्थलीय पशुओं और मनुष्यों में उपस्थित सूक्ष्मजीवों का संगठन उनके पोषण व स्वास्थ्य में महत्वपूर्ण भूमिका रखता है. प्रोबायोटिक्स जैसे पारम्परिक दही और अन्य किण्वित खाद्य पदार्थों में या पाउडर, गोलियां और कैप्सूल में मेजबान पर अच्छा प्रभाव डालता है. प्रोबायोटिक्स विभिन्न तरह की ब्रहदान्त्र की बीमारियों को रोकने व इलाज करने में लाभकारी प्रभाव रखने में सक्षम है. इनमें आंत जीवाणु जो कैंसर जैसे घातक बीमारी  के लिए उत्तरदायी होते है, को रोकने की भी क्षमता रखता है. अत: पारम्परिक दवा से अधिक प्राकृतिक विकल्प की बढती मांग से प्रोबायोटिक के बाज़ार में सुधार आने की उम्मीद है.


Authors:

पार्वती शर्मा एवम यशपाल

राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र, हिसार-१२५००१ (हरियाणा)

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