मलबरी रेशमकीट को विभिन्न जलवायु स्थितियों और विस्तृत क्षेत्र वाली मिट्टी में उगाया जा सकता है। बेहतर पद्धतियों को अपनाकर कोकुन की अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। लेकिन इसके लिए अधिक ऊपज देने वाली उत्तम किस्म की पत्ती का होना आवश्यक शर्त है। रेशमकीट का पालन लार्वा अवधि के दौरान पाँच विभिन्न चरणों से होते हुए होती है। लार्वा अवधि में उसे विशेष रूप से निर्मित रेशमकीट पालन शेड में रखा जाता है। साथ ही, उच्च कोटि का रेशम प्राप्त करने के लिए उचित समय पर प्रबंध और गहन देखभाल की जाती है।

मलबरी कृषि और रेशमकीट पालन की सर्वोत्तम पद्धतियाँ

पूरे पालन अवधि के दौरान रेशमकीट को काफी सावधानीपूर्वक देखभाल की जाती है और उसके भोजन के लिए उत्तम किस्म के मलबरी पत्ते का इस्तेमाल किया जाता है। बेहतर वातावरण का निर्माण और कृमि व बीमारियों से रक्षा इनके पालन की अन्य आवश्यक शर्त्ते हैं। रेशमकीट के लिए अनुकूल स्थितियाँ प्रदान करने के लिए एक अलग से पालनघर और पालन उपकरण व साधनों की आवश्यकता होती है। एक साल में 5 से 10 फसलों का पालन किया जा सकता है और प्रत्येक फसल की जीवन अवधि लगभग 70-80 दिनों की होती है।

मलबरी कृषि

1. मलबरी प्रज़ाति

वी-1 और एस-36 उच्च ऊपज़ देने वाली मलबरी प्रजाति है और रेशमकीट पालन के लिए अत्यंत उपयुक्त है। ये दोनों प्रजाति पोषक पत्ती प्रदान करती है जो रेशमकीट पालन में लार्वा के लिए अत्यंत आवश्यक है। इन दो प्रजातियों की विशेषताएँ निम्न हैं -

एस – 36 प्रज़ाति - इसकी पत्तियाँ हृदय आकार की मोटी और हल्के हरे रंग के साथ काँतियुक्त होती है। पत्तियों में उच्च आर्द्रता होती है तथा उसमें अधिक पोषक तत्व होते हैं। प्रति वर्ष एक एकड़ में लगभग 15 हज़ार से 18 हज़ार किलो ग्राम मलबरी पत्तियाँ प्राप्त होती हैं।

वी -1 प्रजाति - यह प्रजाति वर्ष 1997 के दौरान जारी की गई और खेती में काफी लोकप्रिय है। पत्तियाँ अण्डाकार, बड़े आकार की, मोटी, आर्द्रता लिए हुए गहरे हरे रंग की होती है। एक वर्ष में लगभग 20-24 हज़ार किलो ग्राम मलबरी पत्तियाँ प्राप्त की जा सकती है।

2. रोपण पद्धति

वृक्षारोपण की व्यवस्था दो कतारों में की जाती है जहाँ (90+150 सें.मी) X 90 सें.मी या 60 सें.मी X 60सें. मी. की दूरी उपयुक्त होती है। वृक्षारोपण की दोहरी कतार के लाभ इस प्रकार है-

  • दोहरी कतार के बीच जगह होने से अंतर कृषि गतिविधि तथा पत्तियों के परिवहन हेतु पावर टिलर का उपयोग किया जा सकता है। इसके द्वारा ड्रिप सिंचाई सुविधा होती है।
  • प्रति एकड़ अधिक संख्या में वृक्षों को लगाया जा सकता है।
  • आसानी से एवं शीघ्रतापूर्वक पत्तियों को ले जाया जा सकता जो आर्द्रता हानि की संभावना को कम करता है।
  • डंठल कटाई (शूट हार्वेस्टिंग) से 40 प्रतिशत तक श्रम की बचत होती है।

3. गोबर एवं खाद का प्रयोग

प्रति हेक्टेयर 8 मीट्रिक टन की दर से साल में दो बार गोबर का प्रयोग करें। मलबरी के वी-1 प्रजाति के लिए एनपीके का प्रयोग 350:140 :140 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से तथा मलबरी के एस-36 प्रजाति के लिए 300 :120:120 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रति वर्ष 5 बराबर भागों में बाँट कर करें।

4. सिंचाई

सप्ताह में एक बार 80 से 120 मिली मीटर की दर से सिंचाई ।  पानी की कमी होने की स्थिति में किसान ड्रिप सिंचाई का प्रयोग कर 40प्रतिशत पानी की बचत कर सकते हैं।

रेशमकीट पालन

1. संकरित रेशमकीट

आईवीएलपी के अंतर्गत सीएसआर-2 X सीएसआर-4 एवं द्विगुण संकरित (कृष्ण राजा) जैसे उन्नत बाइवोल्टाइन संकरित रेशमकीट की सिफारिश की गई है।

2. चावकी पालन

अण्डे के फूटने से लेकर परिपक्व अवस्था तक पहुँचने में एक रेशम कीट को पाँच अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। कीटों की दूसरी अवस्था युवा अवस्था या चावकी अवस्था कहलाती है। चूँकि यह प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते और इसके संक्रमित होने की संभावना अधिक रहती इसलिए चावकी पालन हेतु विशेष ध्यान देने की जरूरत है। अतएव चावकी पालन केन्द्रों में नियंत्रित परिस्थितियों के भीतर पले रेशमकीट प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

3. बड़े उम्र में पालन

बड़े उम्र के कीटों का पालन तीसरे इनस्टार से शुरू होती है। ये कीड़े बहुत अधिक पत्तियाँ खाने वाले होते हैं।

4.पालन घर

मलबरी रेशमकीट पालन एक पूर्णतः घरेलू व्यवसाय है। इसके लिए 24-28 डिग्री सेल्सियस के बीच तापमान और 70-80 प्रतिशत आर्द्रता वाले मौसम की जरूरत होती है। इसलिए किफ़ायती ठंड वातावरण बनाये रखने के लिए दीवार व छत की बनावट के लिए उपयुक्त सामग्री का चयन,भवन का अभिसरण, निर्माण पद्धतियाँ, डिज़ाइन इत्यादि पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। आगे, पत्तियों की रख-रखाव, चावकी पालन, परिपक्व अवस्था पालन एवं मोल्टिंग के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध होनी चाहिए। साथ ही, उस स्थान की साफ-सफाई और रोगमुक्तीकरण व्यवस्था भी अच्छी तरह होनी चाहिए। पालन के प्रकार और मात्रा के अनुसार पालन घर का आकार होनी चाहिए। 100 डीएफएल के लिए 400 वर्ग फीट क्षेत्रफल वाला सतह प्रदान किया जा सकता है (डीएफएल- डिज़िज़ फ्री लेइंग (रोग मुक्त स्थान), 1डीएफएल = 500 लार्वा )।

5.पालन उपकरण

परिपक्व अवस्था वाले रेशमकीट उच्च तापमान,उच्च आर्द्रता और न्यूनतम स्तर वाले हवा के आवागमन व्यवस्था को सहन नहीं कर पाते हैं। इसलिए कमरे के तापमान को न्यूनतम स्तर पर बनाये रखने के लिए पालन घर में दो ओर से हवा के आने व जाने की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि रेशमकीट द्वारा छोड़े गये मल से उत्पन्न बड़ी मात्रा में गैस आसानी से बाहर निकल सके। 100 डीएफएल (50 हजार लार्वा) के लिए न्यूनतम उपकरण आवश्यकता को निम्न तालिका में दर्शाया गया है -

सारणी- 100 डीएफएलएस (50 हजार लार्वा) पालन हेतु अपेक्षित पालन उपकरण

क्रम संख्या

सामग्री

मात्रा

1

शूट पालन रैक (40’ गुणे 5) 5 स्तरीय

01

2

रोटरी माउंटेजेज़ या चंड्राइक

35

3

पॉवर स्प्रेयर

01

4

आर्द्रतामापी

01

6.रोगमुक्त करना

पालन घर या उपकरणों को संक्रमणरहित बनाये रखने के लिए इसे दो बार साफ की जानी चाहिए। पहली बार पूर्ववर्ती फसल की तैयारी के तुरंत बाद 5 प्रतिशत ब्लिचिंग पाउडर से तथा दूसरी बार दूसरे फसल के दो दिन पहले 2.5 सैनिटेक (क्लोरीन डाई-ऑक्साइड) के घोल से साफ की जानी चाहिए। रोगमुक्त करने का सुझाव निम्न तालिका में दर्शाया गया है-

पालनघर एवं उपकरणों को संक्रमणरहित करने की तालिका

दिवस

कार्य आदेश

कार्यों का विवरण

पूर्ववर्ती पालन की समाप्ति के बाद

01

रोगग्रस्त लार्वा, गले हुए खराब कोकुन को जमा कर जलाना

 

02

रोटरी माउंटेज़ के फ्लास को जलाना और धुँआ द्वारा रोगमुक्त बनाना

 

03

पालनघर एवं उपकरणों का पहली बार रोगमुक्तीकरण करना

ब्रशिंग के 5 दिन पहले

04

उपकरणों की धुलाई एवं सफाई

 

05

उपकरणों को धूप में सुखाना

ब्रशिंग के 4 दिन पहले

06

पोषण को 0.3 प्रतिशत भुने हुए चूने से कीटाणु रहित बनाना (ऐच्छिक)

ब्रशिंग के 3 दिन पहले

07

पालनघर एवं उपकरण को दूसरी बार रोगमुक्त बनाना

ब्रशिंग के 2 दिन पहले

08

पालनघर के सामने व आने-जाने के रास्ते को धूल-कण मुक्त बनाना

 

09

हवा के आवागमन हेतु पालनघर की खिड़कियों को खुला रखना

ब्रशिंग के एक दिन पहले

10

ब्रशिंग हेतु तैयारी

7.शूट पालन-एक किफायती उपाय

रेशमकीट पालन की इस पद्धति में अंतिम तीन अवस्थाओं का पालन एक स्वतंत्र पत्ती के स्थान पर मलबरी शूट देकर किया जाता है। पालन की यह सबसे किफायती पद्धति है जिससे 40 प्रतिशत तक पालन श्रम की बचत होती है। अन्य लाभ इस प्रकार है-

  1. रेशमकीट की संख्या कम होने पर बीमारी के फैलाव एवं संक्रमण में कमी।
  2. कीड़ों और पत्तियों को प्रक्रिया से अलग करते ही द्वितीयक संक्रमण घट जाता है।
  3. साफ-सफाई बनाये रखना।
  4. भंडारण और बेड पर होने की स्थिति में पत्ती की गुणवत्ता का बेहतर संरक्षण।
  5. बेड में बेहतर वायु संचरण।
  6. बेहतर कोकुन गुणवत्ता एवं लार्वा की उच्च उत्तर-जीविता।
  7. न्यून गैर आवर्ती व्यय।

8.पोषण

50-55 दिन पुराने शूट का पोषण प्रारंभ करें। इसकी कटाई सुबह के ठण्डे मौसम में 3-4 फीट की ऊँचाई पर करें। 60-65 दिन पुराने शूट का पोषण पाँचवीं अवस्था वाले कीटों के साथ की जानी चाहिए। कटाई की गई शूट का भंडारण ढीले में उर्ध्वाकार अवस्था में ठण्ड और आर्द्रता युक्त वातावरण में करनी चाहिए जो साफ, रोगाणुमुक्त एवं गीले कपड़े से ढके हुए हों।  बाई वोल्टाईन रेशमकीट के लिए चौथे अंतर्रूप में 460 कि.ग्राम और पाँचवें अंतर्रूप में 2880 कि.ग्राम मलबरी मंजरी के मात्रा की आवश्यकता होती है।  प्रतिदिन 3 बार भोजन देने (सुबह 6 बजे, दोपहर 2 बजे और रात 10 बजे) की सारणी को अपनाया जाना चाहिए।  मटमैले या अधिक पके हुए पत्तियों को न खिलाएँ।  प्रत्येक पोषण के दौरान बेड में लार्वा को समानांतर रूप में वितरित करें। पाँचवीं अवस्था के अंत में 100 डीएफएलएस के लिए 600 वर्ग फीट की जगह की आवश्यकता होती है। प्रत्येक सफाई/पोषण से पहले चॉप स्टीक से ध्यानपूर्वक सभी छोटे आकार वाले और बीमारी की आशंका वाले कीड़ों को हटा दें। लिये गये लार्वा को 0.3विलयन बुझे हुए चूने के 2 प्रतिशत ब्लीचिंग पाउडर में रखें। 

9. बेड क्लीनिंग

अस्वस्थ लार्वा को हटाएँ और उसे 0.3 बूझा हुआ चूना विलयन में 2 प्रतिशत ब्लीचिंग पाऊडर में रखें।  बेड की सफाई करते समय पालन कक्ष में बेड को सतह पर इधर-उधर न फैलाएँ। 

10. तापमान और आर्द्रता बनाये रखना

तीसरे अंतर्रूप लार्वा के लिए बेहतर तापमान 26 डिग्री सें, चौथे अंतर्रूप के लिए 25 डिग्री से. और 5 वें अंतर्रूप के लिए 24 डिग्री से.आदर्श तापमान है तथा उसी प्रकार तीसरे अंतर्रूप के लिए आर्द्रता 80प्रतिशत तथा चौथे व 5 वें अंतर्रूप लार्वा के लिए 70 प्रतिशत आर्द्रता की आवश्यकता होती है। एयर कूलर, रूम हीटर, चारकोल स्टोव, भींगी थैली या भीगी हुई रेत का उपयोग करते हुए कूलिंग, हीटिंग और आर्द्रता वाले उपकरणों का उपयोग कर आवश्यक तापमान और आर्द्रता बनाए रखे।  हवा के आवागमन से रेशमकीट के शारीरिक तापमान को घटाने में मदद मिलती है।

11. निर्मोचन के दौरान देखभाल

निर्मोचन अवधि के दौरान पालन घर में खुली हवा और शुष्कता की स्थिति बनाये रखे। निर्मोचन के लिए कीड़ो के स्थिर होने के बाद बेड को धीरे से फैलाएँ तथा बेड को सूखा बनाए रखने के लिए बूझे हुए चूने के पाउडर का समान रूप से उपयोग करें।  अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाले तापमान और आर्द्रता तथा तेज़ हवा या अधिक प्रकाश का इस्तेमाल न करें।  निर्मोचन से 95 प्रतिशत कीड़ो के बाहर आने के बाद भोजन दें।

12.साफ-सफाई की व्यवस्था

पालनघर में प्रवेश करने से पहले अपने हाथ-पैर अच्छी तरह धोएँ। हाथ-पैर को अम्लीय साबून से व स्वच्छ घोल में धोएँ (0.5 बूझे हुए चूने के घोल में2-5 सैनिटेक/सेरिक्लोर या) फिर 0.3 प्रतिशत बूझे हुए चूने में 2 प्रतिशत ब्लीचिंग पाऊडर)  स्वच्छ घोल में हाथ धोएँ तथा रोगमुक्त कीडों को हटाने के बाद बेड की सफाई करें।  हर दिन रोगग्रस्त कीड़ों को बेसिन में उठाएँ और चूने के पाउडर तथा ब्लीचिंग पाउडर का इस्तेमाल करें तथा इन्हें दूर जगह ले जाकर गाड़ दें या अग्नि में जला दें। रेशमकीट पालन के समय कक्ष को हवादार और साफ-सुथरा रखें।

13. बेड रोगाणुमुक्तक का प्रयोग

विज़ेता, विज़ेता ग्रीन एवं अंकुश आदि पाउडर रेशमकीट को बीमारी से बचाने के लिए रेशमकीट के शरीर तथा पालन स्थान का रोगाणुनाशक है। उपयोग की पद्धति इस प्रकार है।  पतले कपड़े में पाउडर ले और प्रत्येक निर्मोचन के बाद रेशमकीट पर 5ग्राम/वर्ग फीट की दर से छिड़क दें। ऐसा बेड सफाई करने के चार दिन बाद तालिका में दर्शाये गये विधि के अनुरूप करें।

छिड़काव का समय

रोगाणुनाशक

ग्राम/वर्ग फीट बेड क्षेत्रफल

100 डीएलएफएस हेतु अपेक्षित मात्रा

तीसरे निर्मोचक के बाद व भोज़न से पूर्व

विज़ेता/विज़ेता ग्रीन अंकुश

5

900 ग्राम

चौथे अंतर्रूप के तीसरे दिन

विज़ेता अनुपूरक (खाद्य)

3

600 ग्राम

चौथे निर्मोचन के बाद भोजन देने से पूर्व

विज़ेता/ विज़ेता ग्रीन/ अंकुश

5

1200 ग्राम

पाँचवे अंतर्रूप के दूसरे दिन

विज़ेता अनुपूरक (खाद्य)

3

1300 ग्राम

पाँचवे अंतर्रूप के चौथे दिन

विज़ेता/ विज़ेता ग्रीन/ अंकुश

5

3000 ग्राम

पाँचवें अंतर्रूप के 6ठे दिन

विज़ेता खाद्य

3

1800 ग्राम

नोट-बारिश व ठंड के मौसम में मसकार्डिन रोग के नियंत्रण हेतु विज़ेता अनुपूरक की सिफारिश की गई है।

  • बरसात और ठंड के मौसम में यदि मसकार्डिन बीमारी उच्च हो तो इस पर नियंत्रण पाने के लिए विज़ेता अनुपूरक खाद्य की सिफारिश की गई है।
  • निर्मोचन के समय या कीड़ो द्वारा मलबरी पत्ती खाते समय पाउडर का छिड़काव न करें।
  • छिड़काव के बाद 30 मिनट तक रेशमकीट को आहार न दे।

14. विकसित कीड़ो का आधार

ऐसे उच्च स्तर वाले कोकुन प्राप्त करने के लिए समय पर रेशमकीट लार्वा का आधार अत्यंत आवश्यक है। सातवें दिन पर पाँचवें अंतर्रूप में रेशमकीट परिपक्वता की स्थिति में आता है। अतः पोषण देना बंद करे और कोकुन के निर्माण हेतु जगह ढूँढ़े। ऐसे लार्वा को तुरन्त पकड़े और अवलम्बक पर आधार दें। ध्यान यह रखा जाना चाहिए कि माऊंटेज़(आधार) पर लार्वा की संख्या प्रत्येक आधार की क्षमता से अधिक नहीं होनी चाहिए। लार्वा जब कताई की अवस्था में हों तब कमरे का तापमान 24 डिग्री से.के आसपास होनी चाहिए और सापेक्ष आर्द्रता 60-70 प्रतिशत होनी चाहिए, साथ ही, उसमें खुली हवा की सुविधा होनी चाहिए। बेहतर गुणवत्ता वाले कोकुन उत्पादन हेतु रोटरी आधार की सिफारिश की गई है। 100 डीएफएलएस के माऊंटिंग कीड़ों के लिए लगभग 35 सेट रोटरी माऊंटिंग (आधार) की आवश्यकता होती है। रोटरी माउंटिंग को लटकाने के लिए अलग से बरामदा की आवश्यकता होती है।

15. कटाई एवं छँटाई

कोकुन फसल की छः दिन पर कटाई होती है। विकृत कोकुन को हटाएँ। खराब कोकुन की छँटनी के बाद गुणवत्ता के आधार पर उसका श्रेणीकरण करें। ठंड के मौसम में कटाई के लिए एक दिन अधिक का समय दे।

16.विपणन

कोकुन को बाजार दिन के ठंडे समय में सातवें दिन ले जाएँ। कोकुन को 30-40 किलो ग्राम क्षमता वाले नॉयलॉन बैग में रख कर ढ़ीले से बाँधनी चाहिए और उसे ऐसी गाड़ी में ले जाना चाहिए जिसमें उसे रखने के लिए शेल्फ या दराज़ बने हों।

17. कोकुन ऊपज़

100 डीएफएलएस से 60-70 कि. ग्राम की औसत ऊपज़ होती है। एक साल में एक एकड़ मलबड़ी गार्डन में लगभग 700-900 किलो ग्राम कोकुन की फसल उगाई जा सकती है।


लेखक:

एस.एल.यादव, संतोष देवी सामोता, नरपत सिहं, एस.आर.मीणा. के.के.पीगोलीया एवं मंजू लता

राजस्‍थान कृष‍ि महाविद्याल्‍ाय , उदयपुर

राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय, जयपुर (राजस्‍थान )

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