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खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) का अनुमान है कि वैष्विक खाद्य उत्पादन में 2030 तक 40 प्रतिशत तथा 2050 तक 70 प्रतिशत तक बढ़ाने की आवष्यकता है। भारत में अनाज और तिलहन की फसलों में 10 से 20 प्रतिशत तक का नुकसान अनुमानित है (चहल, 2011)। सरकारी रिकार्ड के अनुसार, अकेले साल 2010 में सरकारी गोदामों में 11,700 टन भण्डारित खाद्यान्न सड़ जाने से भारत को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा है (चहल, 2011)। अनाज की खपत की भारी मांग और उसके महत्व को ध्यान में रखते हुए अनाज के उचित भंडारण को नकारा नहीं जा सकता।

इसलिये सुरक्षित भण्डारण के लिये कई पारम्परिक प्रथाएँ आसानी से प्रयोग में लाई जाती है व काफी किफायती और वातावरण के अनुकूल है। ये प्रक्रियाएं आमतौर पर स्थानीय रुप से उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होती है। घरेलू स्तर पर अधिकतम प्रयोग में लाए जाने वाली पारम्परिक प्रथाओं की सूचि का यहाँ विवरण किया गया है। इसके अलावा खाद्यानों का एक बड़ा हिस्सा घरेलू स्तर पर भण्डारण प्रक्रिया के दौरान (40-50 प्रतिशत) नश्ट होता है (खाद्य और कृशि संगठन, 2011)। घरेलू स्तर उपर सुरक्षित भण्डारण एक जरूरी प्रक्रिया है क्योंकि कीटों एवं सूक्ष्म जैविक कारक खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता एवं पौश्टिकता में भारी कमी का मुख्य कारण है इसके साथ-साथ ये कारक अनाजों की मात्रा में भी भारी कमी लाते है। कीटों और जैविक कारक अपने विशाक्त पदार्थों को उत्पादित कर और अपने मलमूत्र से लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव डालते है।

अनाज संकमित कीटों के प्रकार

  1. कवक : कवक एक कोषिकीय बीजाणु है जिनमें जनन स्वत: ही होता है इसलिए इनके बीजाणुओं को पर्यावरण की पहुंच से दूर रखा जाना चाहिए ताकि ये भंडारित अनाज को संक्रमित ना कर सके। भंडाारित अनाजों में कवक संक्रमण की अवस्था को पहचानना मुष्किल है। संक्रमण का फैलाव बीजाणुओं द्वारा होता है जो वातावरण में मौजूद हवा और कीटों द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान फैलते है। दाने का कालापन और तीखी गंध, कवक संक्रमण के कुछ मुख्य लक्शण है जिससे अनाज की गुणवता, रंग और स्वाद प्रभावित होते है और खाने की वस्तुओं की पौश्टिकता में भी भारी कमी आती है। भण्डारित स्थान पर उमस और नमी का होना कवक संक्रमण का प्रमुख कारण है। अनाज को कवक के संक्रमण से बचाने के लिए पूरी तरह सूखा कर भंडारण करना ही उचित माना जाता है।
  2. कीट- भृंग और पंतग दो मुख्य प्रकार के कीट होते है जो भण्डारित दालों और अनाजों को नुकसान पहुंचाते है। कीटों को जिंदा रहने के लिए आवष्यक सभी शर्ते भंडार गृह में अच्छी तरह से मौजूद होती है। दोनो के बच्चों को पहचानना बहुत ही मुष्किल होता है क्योंकि ये बहुत छोटे बीज के समान आकृति वाले होते है जो कि बीजों के अंदर रहकर नुकसान पहुचाँतें है। टूटे हुए बीजों को भण्डारित करने से कीटों व कीड़ों को बुलावा मिलता है इसलिए कभी भी साबूत बीजों के साथ टूटे हुए बीजों को भण्डारित न करें।
  3. चूहे -भंडारित अनाज को नुकसान पहुंचाने में चूहे भी एक प्रमुख कारण है। चूहें जूट के बने हुए थैलों  में आसानी से छेद करके बीजो का काफी नुकसान पहुंचा देते है जिससे खाद्य पदार्थ की गुणवता में कमी आने से अनेक प्रकार हानिकारक बीमारियां फैलती है। चूहों की रोकथाम पिंजरों का प्रयोग कर व रासायनिक उपचार दोनो प्रकार से किया जा सकता है परन्तु पिंजरे का प्रयोग करना अधिक सार्थक माना जाता है।

तालिका 1 भंडारित अनाज के प्रमुख हानिकारक कीट

क्रं. सं.

हिन्दीनाम

संक्रमित  होनेवालेअनाज

1         

आटा घुन

अनाज एवं अनाज उत्पादों, सुखे फलों एवं तम्बाकू

2         

दलहनी  घुन

राजमा सहित विभिन्न प्रकार की दाले

3         

लोबिया घुन

दालें

4         

लोबिया भृंग

सोयाबीन सहित विभिन्न प्रकार के दालें

5         

दलहन भृंग

सोयाबीन एवं राजमा के अलावा विभिन्न प्रकार के दाले

6         

धान का शल्भ

चावल, मक्का, सोयाबीन, मूँगफली, सूखे मेवे, नारियल, आटा

7         

अनाज का भूरा तिलचट्टा

मक्का, गेहूँ

8         

उश्ण कटिबंधीय गोदाम कीट

चावल, मक्का, मूँग की दाल, सोयाबीन, मूँगफली, सूखे मेवे, नारियल, आटा

9         

अनाज का चूरा शल्भ

चावल, मक्का, गेहूँ, सोरगम

10       

आस्ट्रेलियाँ गेहूँ भेदक

पौध, चावल, मक्का, सोरगम, कंदमूल

11       

धान का भृंग

चावल, मक्का, गेहूँ, सोरगम, दाले

12       

अंगोमोइटस अनाज पतंग

धान, गेहूँ व मक्का

13       

लल आटा भृंग

सभी प्रकार की दाले व मसाले

14       

लाल घुन

सभी प्रकार की दाले व मसाले

परंपरागत तरीकों द्वारा अनाज का किफायती व सुरक्षित भंडारण

स्थानीय रुप से उपलब्ध पौधे और उनके उत्पादों से अनाजों का सुरक्षित भंडारण के लिए पुराने समय से इस्तेमाल में लाया जाता रहा है। आधुनिक तौर-तरीके की तुलना में परंपरागत तौर तरीके अधिक सस्ते एवं आसानी से उपलब्ध है। प्रकृति ने मानव को कई औषधि व निरोगी गुण वाली जड़ी बुटियाँ वनस्पति के रूप में प्रदान की है जैसे-नीम, हल्दी, तुलसी इत्यादि। यहां उन्ही उत्पादों का उपयोग अनाज के सुरक्षित भंडारण के लिए किया गया है।

पुराने समय में भंडारण प्रक्रिया प्रत्येक समाज और देषों के क्षेत्र, गावं एवं समुदाय में अलग-अलग तरीके से हुआ करती थी। ज्यादातर देषों में उत्पादित अनाज का भंडारण बांस एवं मिट्टी के बने बास्केट, जूट के थैले में किया जाता था। यह प्रक्रियां आसानी से उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग कर इस्तेमाल में लाई जाती है।

1    धूप में सूखाकर 

यह भंडारण की बहुत आसान एवं टिकाऊ विधि है लंबे समय से इसका प्रयोग अनाज में नमी, कीटों के प्रजनन में रोकथाम के लिए किया जाता रहा है। इस विधि में कटाई के बाद अनाज को धूप में सूखाकर लंबे समय के लिए उसे भंडारित कर देते है। इससे कीटों में होने वाली प्रजनन क्रिया रूक जाती है। यह विधि बड़े एवं छोटे दोनों स्तर के किसानो के लिए बहुत लाभदायी व प्रभावी है। यह प्रक्रिया अप्रैल, मई व जून के महीने में एक करने से किसी भी प्रकार के कीड़ो और कीटों पर काबू पाया जा सकता है।

2    नीम की पत्तियों का इस्तेमाल कीटों व कीड़ों के रोकथाम के रूप में

नीम की पत्तिायों का इस्तेमाल कीटों व कीड़ों को भंडारित अनाज से दूर भगाने के लिए किया जाता रहा है। इसके लिए पेड़ से ताजी पत्तिायों की जमा कर उन्हे छाया में सूखाकर जाता है सीधे अनाज के साथ मिलाकर, अनाज की पेटी को बंद कर दिया जाता है। यह विधि बहुत ही सस्ती, सुरक्षित एवं प्रभावी है। रागी को भण्डारित करने के लिए दक्षिणी भारतीय किसानों द्वारा नीम की पत्तिायों का इस्तेमाल कर कीटों व कीड़ों से सुरक्षा के लिए किया जाता है।

3    हल्दी

एक प्रति किलों अनाज में 40 ग्राम हल्दी का चूर्ण का भी उपयोग एक अच्छे विकल्प के रुप में किया जाता है। भंडारण से पहले अनाज को हल्दी के चूर्ण के साथ हल्के हाथ से रगड़ कर आधे घटें के लिए धूप में सूखा देते है। कच्ची हल्दी का इस्तेमाल भी कीटों से सुरक्षा के लिए किया जाता है। इसके तेज गंध एवं नाषीजीव रोधीगुण के कारण कीट अनाज से दूर रहते है। यह उपचार कीटों से लम्बें समय तक सुरक्षा प्रदान करती है और खाने की दृश्टि से भी सुरक्षित है।

4    मसालों का उपयोग

ग्रामीण महिलाओं द्वारा लाल मिर्च का प्रयोग भी खाद्य पदार्थों के सुरक्षित भण्डारण के लिए किया जाता रहा है। लहसुन के नाषीरोधी गुण के कारण कीड़ों के संक्रमण की संख्या को कम किया जा सकता है। लहसुन के गुच्छों को चावलों की सतह में रखकर अनाज की पेटी को अच्छे से बंद कर देते है। लहसुन की गंध के कारण कीडे पहुंच से बाहर हो जाते है इसलिए अनाज और चावलों के भंडारण में लहसुन के गुच्छों को प्रयोग किया जाता है।

5    मीठे प्रकंद का इस्तेमाल कीटों व कीड़ों की रोकथाम के लिए

50 किलोग्राम अनाज में 1 कि. ग्रा. मीठे प्रकंद को लें, उसका चूर्ण बनाकर कपड़े से बने छोटे थैले में भर कर उसे भंडारित अनाज के साथ पेटी में रख कर बंद दें।

6    नमक का प्रयोग कीटों की रोकथाम के लिए

पुराने समय से ही नमक का उपयोग कवक एवं जीवाणुओं से बचाव के लिए किया जाता रहा है नमक कीड़ों के प्रवेश को रोकता है। 1 कि. गा्र. लाल चने के साथ करीब 200 गा्रम नमक मिलाकर जूट से बने थैले में अनाज को इकट्ठा कर उसकी अच्छे से सिलाई कर दें परन्तु यह विधि 4 या 5 महीने के लिये ही सहायक है। नमक का प्रयोग बड़े स्तर पर इमली के भण्डाण के लिए भी उपयोगी है। इस विधि में इमली को तोड़ने के बाद उसे मिट्टी से बने घड़ो के अंदर के परतों के रुप में इक्टठा कर दिया जाता है। इसके बाद 1 किलोग्राम इमली मे 10 ग्राम नमक का मिश्रण किया जाता है। यह विधि नाषीजीवों के आक्रमण जैसे  भृंग, पंतगे आदि के रोकथाम में सहायक है।

7   चूना का प्रयोग कर उपचार करना

चूना नाषीजीवों को नियंत्रित करने के लिए बहुत पहले से ही प्रयोग में लाये जाने वाली विधि है। यह बहुत ही सस्ती एवं आसान उपाय है। नाषीजीवों को नियंत्रित करने के लिए, इस विधि में चूने का चूर्ण बनाकर उसे चावलों के साथ मिला दे फिर जूट से बने थैले में डालकर सूखे स्थान पर रख दे। इसकी महक से कीडें दूर भाग जाते है और उसकी प्रजनन प्रक्रिया को भी रोक देता है। साधारणत: 10 ग्राम चूने का इस्तेमाल 1 किलोग्राम अनाज को उपचारित करने में किया जाता है यह उपचार नाषीजीवों के आक्रमण से लबें समय तक बचाता है।

8    राख द्वारा नाषीजीवों का नियंत्रण

यह विधि नियमित रूप से किसानों द्वारा पुराने समय से इस्तेमाल में लाई जा रही है। इस विधि में दालों को भण्डारित करने के लिए मिट्टी से बने घड़े के अंदर 3/4 भाग राख व बाकि बचे एक चौथाई भाग में गाय का गोबर और लकड़ी की राख से भरकर बंद कर दे। छ: महीने के बाद यह विधि फिर से दोहराएं। अनाज को भी इसी प्रकार गाय के गोबर की राख के साथ मिलाकर भण्डारित करते है जो कीट रोधी होती है।

9    कीटों व कीड़ों से बचाव के लिये माचिस की डिब्बियों का उपयोग

ग्रामीण महिलाओं द्वारा अनाज को भण्डारित करने में यह विधि बहुत पहले से इस्तेमाल में लाई जा रही है। इस विधि में सामान्यत: 6 से 8 माचिस की डिब्बियों को अनाज की पेटी की स्तह में, बीच मे व उपरी हिस्से में रखकर उसे अच्छे से बंद कर देते है। माचिस की तिल्लियों में फास्फोरस होता है जो कीड़ों के संक्रमण के राकथाम में सहायक होता है। इससे अधिक मात्रा प्रयोग में हानिकारक है।

10   नीम के घोल द्वारा उपचारित जूट से बने थैले का उपयोग

अनाज का सुरक्षित भण्डारण करने के लिए जूट से बने थैलें बड़ी मात्रा में उपयोगी है। भण्डारण से पहले थैलों को नीम के घोल से उपचारित किया जाता है।

नीम के घोल का तैयार करने की विधि: 10 लीटर पानी में 10 प्रतिशत नीम के बीज का चूर्ण बनाकर पोटली में बाँध कर पूरी रात पानी में डुबो कर रखें उसके बाद पोटली को निचोड़ कर आधे घण्टे के लिए थैलो को नीम के घोल में डाल देते है। थैले को हमेषा छाया में सुखाकर ही इसका इस्तेमाल अनाज भण्डारण के लिये करे। यह विधि एक वर्ष तक ही कीड़ों व कीटों से बचाव के लिए उपयोगी है। उपचारित जूट के बने थैलों का प्रयोग अनाज भण्डारण में बिना किसा भय के किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में 10 जूट थैले के लिये 2 से 8 लीटर नीम के बीज की आवष्यकता होती है।

 फसल उत्पादों का इस्तेमाल कीड़ों व कीटों की रोकथाम के रूप में

a.   नीम के बीज द्वारा प्राप्त उत्पाद:-

  • 10 प्रतिशत नीम के बीज से घोल तैयार करने के लिए 1 कि. ग्रा. नीम के बीजों का चूर्ण एवं 10 लीटर पानी की आवष्यकता होती है।
  • कपड़े की पोटली में 1 ग्राम नीम के बीज का चूर्ण बनाकर उसे 10 लीटर पानी में सारी रात डूबोकर रखें।
  • अगलं दिन पोटली को निचोड़ कर पानी कर इस्तेमाल नीम के घोल के रूप में करे।
  • जूट से बने थैले को उपचारित करने के लिए उसे आधे घंटे के लिए नीम के घोल में डाल दे। थैलों को हमेषा छाया मे ही सुखायें।

b.  नीम के तेल का उपयोग

1)  घरेलू एवं परंपरागत तौर पर नीम के तेल का उपयोग किसानों द्वारा बीजों को उपचारित करने में किया जाता है। 1 कि. ग्रा. अनाज को उपचारित करने के लिये 20 मि.ली. नीम का तेल काफी  है। नीम का तेल भृंग, घुन, लाल सुरी, सफेद लबें सिर वाली सुरी और पतंगे इत्यादि की रोकथाम में सहायक है।

2)  यदि नीम के तेल में नारियल तेल या अरंडी का तेल 1 : 1 के अनुपात में मिला दिया जाए तो परिणाम और भी प्रभावी होता है। सोयाबीन का तेल एवं मूँगफली का तेल भी सुरक्षात्मक दृश्टि से इस्तेमाल किया जा सकता है। सिट्रोनेला पत्तिायों से निर्मित उत्पाद नाषी संक्रमण के प्रतिरोधी एवं काफी प्रभावी परिणाम देने वाला होता है।

तालिका नं. 2 कवक प्रतिरोधी आवष्यक तेलों कीसूची

पादप

साधारणनाम

कार्यविधिस्तर

ग्रेविओलेंस पत्ति

नीम

सभी सक्रिय हैं।

एपियम ग्रोमिओलेंस (पत्ति)

केवेरि

कुरकुमा ऐरोमेटिका

जंगली अदरक

मेरिस्टिका

नटमेग

सिट्रस मेडिका

बड़ा निम्बू

सभी कवक संक्रमण प्रतिरोधी है।

कैजुलिया एक्सीलेरिस

गठालिया

कवकनाषी

ओसिमम कैनम

काली तुलसी

कवकनाषी

रोक थाम एवं नियंत्रण

1)  ढाँचे को साफ एवं मुरम्मत रखे :- ढाँचे को हमेषा साफ एवं सही तरीके से ही उपचार करें। गर्मी के महीनों में कीड़े ठण्ड की तुलना में ज्यादा क्रियाषील होते है इसलिये भण्डारण से पूर्व गर्मी के मौसम में सही तरीके से इसे पूरी तरह से उपचारित करें। भंडारण में होने वाले दरारों एवं छिद्रों को पूरी तरह से तुरंत मुरम्मत या बंद करवा देना ही सही होता है। पुराने अनाज को स्थान परिवर्तन करते समय उसे सही तरीके से जांचना चाहिए । यदि अनाज संक्रमित हैं तो उसे जल्द ही उपचारित करें।

2)  केवल साफ एवं सूखे अनाजों का ही भण्डारण करें:- अनाज के टुकड़े, धूल एवं भूसा: कीड़ों को अपनी तरफ आकर्शित करते है एवं कीड़ों के प्रजनन में सहायक होता है। लम्बे समय तक भण्डारण को देखते हुए अनाज को सही एवं समुचित तरीके से धूप में सुखाकर,  साफ करके ही भण्डारित करें।

3) विषेष स्वच्छता:- इस बात का विषेष ध्यान रखे कि भंडारण से पहले भण्डारण ढ़ाचा तथा यंत्र जैसे ट्रक आदि विषेष रुप से साफ हो। कोई भी पहले से पड़ा हुआ अनाज इत्यादि न हो ।

4)  अनाजों का नियमित निरक्शण:- नियमित देख-रेख भण्डारण प्रक्रिया का अति महत्वपूर्ण प्रयास और कदम सही दिषा में है ।

निश्कर्ष:- खाद्य पदार्थों की सही गुणवत्ताा को घरेलू स्तर पर बनाए रखने के लिये यह आवष्यक हो जाता है कि भण्डारण के विभिन्न वैज्ञानिक तरीकों को अपनाया जाए। ये सभी प्रयास सामग्री एवं विधि केवल भण्डारण के उद्देष्य से है परंतु प्रति वर्ष उपलब्ध होने वाले खाद्य सामग्री भण्डारण तभी संभव है जब भण्डारण घरेलू स्तर पर सही तरीके से हो ओर उनका भविश्य में इस्तेमाल वाणिज्यिक उद्देष्य  से हो इसलिये पर्यावरण अनुकूल, सुरक्षित ओर प्रभावी भण्डारण को प्रोत्साहित किये जाने की आवष्यकता है। उपयुक्त सारे प्रयास को पुन: नये सिरे से अपनाकर उन्हें ओर प्रभावी बनाने की आवष्यकता है जिससे भविश्य में आने वाली पीढ़ी लाभान्वित हो।


Authors:

सुषमा कुमारी पवार1, कविता रानी1, पंकज कुमार सिंह1, ममृता एच एम1, एस के सिंह1, कर्णम वेंकटेश1*

 गेहूँ अनुसंधान निदेशालय, करनाल-हरियाणा

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