रबी में स्वीट कॉर्न की खेती कर अधिक लाभ कमाये - Krishisewa

Growing Sweet Corn to earn more profit

स्वीट कॉर्न एक विशेष प्रकार की मक्का है जो कि अधिक मीठी होती हैं। इसलिए इसे स्वीट कॉर्न (मीठी मक्का) कहते हैं। इस मक्का को दूधिया अवस्था में ही तोड़कर काम लिया जाता हैं। स्वीट कॉर्न की खेती वर्ष भर की जा सकती हैं। ये फसल कम समय में तैयार हो जाती हैं। अत: इससे कम समय में अधिक लाभ कमाया जा सकता हैं। स्वीट कॉर्न की अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अधिक माँग होने के कारण डिब्बाबन्दी करके निर्यात भी किया जा सकता हैं। शहर के आसपास के क्षेत्रों में स्वीट कॉर्न की खेती अधिक लाभकारी हैं। 

स्वीट कॉर्र्न उगाने की विधि

खेत का चुनाव व तैयारी:

रेतीली दोमट से चिकनी दोमट मिट्टी जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो उत्ताम रहती हैं। लवणीय व क्षारीय भूमि इसके लिए उपयुक्त नहीं होती हैं। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके 2-3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिये तत्पश्चात् पाटा लगाकर खेत को समतल कर लें। अंतिम जुताई के समय 18-20 गाड़ी गोबर की खाद प्रति हैक्टेयर भूमि में मिला दें। 

किस्मों का चयन :

मक्का की संकुल किस्म, माधुरी के भुट्टे 55 से 60 दिन में तोड़े जाते हैं। इसके दानो का रंग पीला होता हैं। इसकी खेती रबी या जायद मौसम में की जाती हैं। इसके अलावा प्रिया, अल्मोडा स्वीट कॉर्न, ऑरेन्ज स्वीट कॉर्न आदि किस्मों का प्रयोग करें। हमेशा प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करना चाहिये।

बीज दर:

स्वीट कॉर्न का बीज हल्का होने के कारण 10-12 किग्रा बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त रहता हैं।

बुवाई का समय:

रबी में स्वीट कॉर्न की बुवाई 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर के मध्य करनी चाहिये।

बुवाई की विधि:

बुवाई कतारों में ही करनी चाहिये। कतार से कतार की दूरी 75 से 100 सेमी रखनी चाहिये जिससे तुडाई में सुविधा रहती हैं। बीज को 5 सेमी गहराई पर बोना चाहिये। पौधे से पौधे की बीच 20-25 सेमी का अन्तराल रखना चाहिये। इसमें पौधे की संख्या 65 से 80 हजार प्रति हैक्टेयर होनी चाहिये।

बीजोपचार:

मृदा व बीज जनित बीमारियों से बचाव हेतु बीज को सदैव थाइरम 3 ग्राम/किग्रा की दर से अथवा 4 ग्राम/किग्रा बीज को एप्रोन 35 एस. डी. नामक कवकनाशी से उपचारित कर बोयें।

उर्वरक:

स्वीट कॉर्न के लिये नत्रजन 75 किग्रा, फास्फोरस 30 किग्रा व जिंक सल्फेट 20 किग्रा प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती हैं। इसमें फास्फोरस व जिंक साल्फेट की पूरी मात्रा बुवाई के समय 10-15 सेमी की गहराई पर कतारों में ऊर कर देना चाहिये व नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के समय व आधी मात्रा को 2-3 बार अलग-अलग अवस्थाओं पर देना चाहिये। 

खपतवार प्रबन्धन:

स्वीट कॉर्न की फसल को शुरू के 35 दिनों तक खपतवार से मुक्त रखना चाहिये। प्रभावी खपतवार नियंत्रण के लिये बुवाई के बाद तथा बीज अंकुरण से पहले 1-1.5 किग्रा एट्राजीन/है. की दर से 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। बाद में उगने वाले खपतवारों के लिये एक बार अन्तराशस्य कियाऐं करके नियंत्रित किया जा सकता हैं।

सिंचाई:

खरीफ में यदि वर्षा न हो तो सिंचाई अवश्य करें परन्तु रबी की फसल में 4-6 सिंचाइयों की आवश्यकता होती हैं। फूल आने व दूधिया अवस्था पर सिंचाई अवश्य करें।

अन्राशस्य:

स्वीट कॉर्न के साथ में सोयाबीन, मूंग, उड़द की फसल बोई जा सकती हैं इसके लिये मक्का की 30-30 सेमी पर दो कतार बोई जाती हैं तथा इसके बाद मूंग, उड़द या सोयाबीन की दो कतारे 30-30 सेमी पर बोयें। मक्का व अरहर को 1:1 कतार के अनुपात में बोनी चाहिये।

कीट प्रबन्धन

तना छेदक:

इसके नियंत्रण हेतु बुवाई के 15 से 30 दिन के मध्य कार्बोरिल 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण 1.85 किग्रा प्रति हैक्टेयर पानी में घोलकर छिड़के अथवा फसल जब 15 दिन की हो जावें तब कार्बोफ्यूरान 3 प्रतिशत कण 5-8 किग्रा प्रति है. की दर से पौधों के पोटों में डालें।

मोयला:

पौधों में नर मंजरी निकलते समय इसका आक्रमण होता है इसके निंयत्रण हेतु 250-300 मि. ली. फास्फोमिडान 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

फड़का:

इसका प्रकोप होने पर मिथाइल पेराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण 25 किग्रा प्रति हैक्टेयर की दर से भुरकाव करें। इस दवा का भुरकाव खेत के चारों तरफ भी करें। 

रोग प्रबन्धन

राजस्थान तुलासिता:

इस रोग में बुवाई के 15-20 दिन बाद नीचे की 2-3 पत्तिायाँ छोड़कर पत्तिायों पर हल्के हरे से पीले रंग की धारियाँ बन जाती हैं तथा यह रोग नीचे से ऊपर की तरफ बढ़ता हैं। इसके नियंत्रण के लिए जून की पहली वर्षा आते ही बुवाई करें। बीज की मात्रा 10-15 प्रतिशत अधिक रखें मेटालेक्सिल-35 एस. डी. की 4 ग्राम प्रति किग्रा की दर से बीजोपचार करें।  

तना विगलन:

इस रोग को उखटा रोग भी कहते हैं। इसमें मांजर आने के बाद पौधा मुरझाकर सूखने लगता हैं। रोगी पौधे के तने का रंग भूमि की सतह के पास से भूरा पड़ जाता है जो बाद में सूखकर सिकुड़ जाता हैं। नियंत्रण के लिए मई-जून में 2 बार गहरी जुताई करें। पौधों की संख्या अधिक नहीं रखें। 

कर्वुलेरिया पत्ता धब्बा रोग:

इसमें रोगी पौधों की पत्तिायों पर छोटे-छोटे पीले रंग के बहुत सारे धब्बे बन जाते हैं। रोब की तीव्रता में धब्बे पत्ताी की पूरी सतह पर फैलकर उसे सुखा देते हैं। नियंत्रण के लिए केवल उन्नत व प्रमाणित बीज ही बोयें तथा   फसल की कटाई के पश्चात् बचे रोगी अवशेषों को जला दें और मैन्कोजेब दवा के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें। 

भुट्टों की तुड़ाई :

स्वीट कॉर्न के भुट्टों की तुड़ाई दूधिया अवस्था होने पर ही कर लें। परागण के 15-20 दिन बाद इसमें शर्करा की मात्रा सर्वाधिक (22-40 प्रतिशत) होती हैं। इसके बाद शर्करा स्टार्च में परिवर्तित होने लगती हैं जिससे मिठास व गुणवत्ताा कम होने लगती हैं। अत: तुड़ाई का उपयुक्त समय परागण के 18-20 दिन बाद होता हैं। 

उपयोग :

स्वीट कॉर्न को सेक कर या उबाल कर खाया जा सकता हैं। इससे अनेक प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन भी तैयार किये जाते हैं। इसकी अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अच्छी माँग होने के कारण डिब्बाबंदी करके निर्यात करने पर अधिक आमदनी प्राप्त की जा सकती हैं। 

 


लेखक 

डॉ. सन्दीप कुमार शर्मा एंव डॉ. एस. के. शर्मा

अनुसंधान निदेशालय

महाराणा प्रताप कृषि एंव प्रौद्योगिकी विश्वविधालय, उदयपुर (राज.)

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