अशवगंधा (असगंधा) जिसे अंग्रेजी में विन्टर चैरी कहा जाता है तथा जिसका वैज्ञानिक नाम विदानिया सोमनिफेरा है, भारत में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण औषधीय फसल है जिसमें कई तरह के एल्केलाइड्स पाये जाते है। अशवगंधा को शक्तिवर्धक माना जाता है।भारतवर्ष में यह पौधा मुख्यतया गुंजरात, मध्यप्रदेष, राजस्थान, पष्चिमी उत्तरप्रदेष, पंजाब, हरियाणा के मैदान, महाराष्ट्र, पष्चिमी बंगाल, कर्नाटक, केरल एवं हिमालय में 1500 मीटर की ऊंचाई तक पाया जाता हैं। मध्यप्रदेष में इस पौधे की विधिवत् खेती मन्दसौर जिले की भानपुर, मनासा एवं जावद तथा नीमच जिले में लगभग 3000 हेक्टर क्षेत्रफल में की जा रही है।

  भारत के अलावा यह औषधीय पौधा स्पेन, फेनारी आइलैण्ड, मोरक्को, जार्डन, मिस्त्र, पूर्वी अफ्रीका, बलुचिस्तान (पाकिस्तान) और श्रीलंका में भी पाया जाता है। 

वगंधा के औषधीय गुण एवं उपयोग

अशवगंधा के पौधे 3 से 6 फीट तक ऊंचे होते हैं इसके ताजे पत्तों तथा इसकी जड़ को मसल कर सूंघने से उनमें घोडें के मूत्र जेसे गंघ आती है। संभवतया इसी वजह से इसका नाम अशवगंधा पड़ा होगा। इसकी जड़ मूली के जैसी परन्तु उससे काफी पतली (पेन्सील की मोटाई से लेकर 2.5 से 3.75 सेमी. मोटी) होती है तथा 30 से 45 से.मी. तक लम्बी होती है। यद्यपि यह जंगली रूप में भी मिलती हैं परन्तु उगाई गई अशवगंध ज्यादा अच्छी होती है।

अशवगंघा में विथोपिन और सोमेनीफेरीन एल्केलाईड्स पाए जाते हैं जिनका उपयोग आयुर्वेदिक तथा यूनानी दवाईयां के निर्माणा में किया जाता हैं इसके बीज, फल, छाल एवं पत्तियों को विभिन्न शारीरिक व्याधियों के उपचार में प्रयुक्त किया जाता हैं। आयुर्वेद में इसे गठिया के दर्द, जोड़ों की सूजन, पक्षाघात तथा रक्तचाप आदि जैसे रोगों के उपचार में इस्तेमाल किया किए जाने की अनुषंसा की गई है। इसकी पत्तियां त्वचारोग, सूजन एवं घाव भरने में उपयोगी होती है। विथोपिन एवं सोमेनीफेरीन एल्केलाइड्स के अलावा निकोटीन, सोमननी, विथनिनाईन, एल्केलाइड् भी इस पौधें की जड़ों में पाया जाता है। अष्वगंधा पर आधारित शक्तिवर्धक औषधियां बाजार मे टेबलेट, पाउडर एवं केप्सूल फार्म में विभिन्न ब्रान्डों  जैसे वीटा-एक्स गोल्ड, षिलाजीत, रसायन वटी, थ्री नाट- थी्र, थर्टीप्लस, एनर्जिक-31 आदि के रूप में विक्रय किया जाता है।

वगंधा की बढ़ती मांग:-

अशवगंधा के अनेक औषधीय गुणों के कारण आज इसकी देश विदेश में व्यापक स्तर पर मांग बढी़ है। परन्तु जिस तेजी से  यह मांग बढ़ रही हैं, उसकी तुलना में इसके उत्पादन तथा आपूर्ति का एक ही साधन था, जंगलों से इसकी प्राप्ति परन्तु निरन्तर तथा अन्धाधुन्ध वनों के दोहन के कारण एक ओर जहां उपयुक्त गुणवत्ता वाली आंवला व अष्वगंधा मिला पाना मुष्किल हो रहा हैं वहीं दूसरी ओर इसकी आपूर्ति में भी निरन्तर कमी आ रही है।

अशवगंधा से विभिन्न प्रकार की आयुर्वेदिक दवाइंया बनाई जाती हैं जिसका विवरण इनकी उपयोगिता में दिया गया हैं। यदि इनकी खेती व्यावसायिक रूप से की जाती है, तो यह कृषकों के लिए काफी उपयोगी होगी। साथ ही आयुर्वेद औषधियों के निर्माण से गरीब लोगों के लिए सस्ती औषधि उपलब्ध हो सकेगी।

जलवायु एवं भूमि निर्धारण

बलुई, दूमट या हल्की मिटटी, जिसका पी.एच. मान. 7.5 से 9.0 हो तथा जिसमें जल निकास की पर्याप्त व्यवस्था हो, अशवगंधा की खेती के लिए उपयुक्त होती हैं। कृषि वैज्ञानिकों का मत है कि अपेक्षाकृत निम्न श्रेणी की भूमि का उपयोग किये जाने पर भी इसकी खेती से संतोषजनक उत्पादन मिल सकता हैं यह एक पछेती खरीफ फसल हैं जिसे 650 से 750 मि.मि. वर्षा वाले श्रेत्रों में अच्छी  तरह से उत्पादित किया जा सकता हैं एवं इसकी उत्पाद गुणवत्ता भी अच्छी रहती हैं अशवगंधा की खेती के लिए जवाहर अशवगंधा-20 प्रजाति ज्यादा उपयुक्त पाई गई है।

खेती की तैयारी एवं बीज की मात्रा एवं बीजारोपण:-

सीधे बीज से अशवगंधा की बुआई हेतु 4-5 किलों बीज प्रति एकड़ की दर से तैयार खेत में भारी वर्षा के उपरान्त छिड़काव विधि से बोये जाते हैं। वैसे इसकी बिजाई जुलाई माह के बाद सितम्बर माह में की जा सकती है। बिजाई से पूर्व दो ट्राली गोबर अथवा कम्पोस्ट खाद प्रति एकड़ खेत में मिलाना अच्छी फसल के लिए आवष्यक होगा। बीज को बोने से पूर्व उन्हें डायमेथ एम-45 से 3 ग्राम प्रति किलों की दर से उपचारित किया जाता है। बिजाई के 25-30 दिन बाद विरलीकरण कर 150-200 पौधे प्रति वर्ग मीटर रखे जाते है। नर्सरी से पौधे तैयार करके भी रोपण किया जा सकता हैं इस विधि में 2 किलोग्राम बीज को मानसून आने के समय नर्सरी में बोया जाता है। 6-7 दिनों में अंकुरण पूर्ण होने के 6 सप्ताह के पष्चात ये पौधे रोपण हेतु तैयार हो जाते है। पौधे 60 से.मी. व 60 सेमी के अन्तर पर लगाये जाते है। बुवाई से पहले 6 किलों नाइट्रोजन एवं 6 किलों स्फुर प्रति एकड़ मिट्टी में मिलाया जाता है।

सिंचाईः-

इसमें यदि बारिष अच्छी हो जाती है तो सिंचाई की आवष्यकता नहीं रहती है।

फसल की कटाई:-

अशवगंधा की फसल की कटाई इसकी बिजाई के 150 से 170 दिन के बाद (दिसम्बर से फरवरी माह तक) की जाती है। फसल की परिपक्वता इसके फलों के लाल होने एवं पत्तियों के सूखने से मालूम होती है परिपक्वता हो जाने पर सम्पूर्ण पौधे को उखाड़ लिया जाता हैं तथा तदोपरांत जड़ों के गुच्छे से 1-2 सेमी. ऊपर से तना अलग कर दिया जाता हैं सुखाने की सुविधा हेतु जड़ों को 7 से 10 सेमी लम्बाई के टुकड़ों में काट लिया जाता है तथा जड़ों की ग्रेडिंग कर ली जाती है। फलों को सूखे पौधे से तोड़कर उनकी गहाई करके बीज निकाल लिये जाते है। प्रायः अष्वगंधा की फसल से प्रति एकड़ तीन क्विंटल जड़ें तथा 20 से 30 किलोग्राम बीज प्राप्त होता है।

उपज एवं लाभ:-

छः माह की अवधि की अष्वगंधा की खेती पर प्रति एकड़ लगभग 6000/- रू की लागत आती हैं तथा इसके उत्पादों से लगभग 20000/- की प्राप्तियां होती है। यदि खेती कार्बनिक पद्वति से की जाए तो फसल की 30 प्रतिषत अधिक कीमत मिल सकती है।

अष्वगंधा एक बहुउपयोगी औषधीय फसल है जिसे कृषक वर्ग व्यवसायिक खेती के रूप में अपनाकर अधिकाधिक लाभ प्राप्त कर सकता है।


Authors:

बंशी लाल वर्मा एवं डाआरसीकुमावत

विसावाचस्पति छात्र एवं आचार्य,

कृषि अर्थषास्त्र विभाग, श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि महाविद्यालय,

जोबनेर, जयपुर (राज.)-303329

Email:- This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.