लोबिया की खेती के लिए गर्म व आर्द्र जलवायु उपयुक्त है। तापमान 24-27 डिग्री सें.ग्रे. के बीच ठीक रहता है। अधिाक ठंडे मौसम में पौधाों की बढ़वार रूक जाती है।

लगभग सभी प्रकार की भूमियों में इसकी खेती की जा सकती है। मिट्टी का पी.एच. मान 5.5 से 6.5 उचित है। भूमि में जल निकास का उचित प्रबंधा होना चाहिए तथा क्षारीय भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है।

किस्में :

पूसा कोमल :

यह किस्म बैक्टीरियल ब्लाईट प्रतिरोधाी है  इसे बसंत, ग्रीष्म तथा वर्षा तीनो मौसम लगाते है। फली का रंग हल्का हरा, मोटा गुदेदार 20-22 से.मी. लम्बा होता है। इसकी उपज 100-120 क्ंविटल/हेक्टेयर होती है।

अर्का गरिमा :

यह खम्भा(पोल) प्रकार की किस्म है यह 2-3 मी उची होती है। इसे वर्षा ऋतु एवं बसंत ऋतु लगाया जा सकता है।

पूसा बरसाती :

इस किस्म को वर्षा ऋतु लगाया जाता है फली का रंग हल्का हरा 26-28 से.मी. लम्बा एवं 45 दिनो मे पक कर तैयार हो जाती है। इसकी उपज 70-75 क्ंविटल/हेक्टेयर होती है।

पूसा फालगुनी :

यह छोटी झाडीनुमा किस्म है फली का रंग गहरा हरा, सीधा एवं 10-20 से.मी लम्बा एवं 60 दिनो मे पक कर तैयार हो जाती है। इसकी उपज 70-75 क्ंविटल/हेक्टेयर होती है।

पूसा दोफसली :

यह किस्म बसंत, ग्रीष्म तथा वर्षा तीनो मौसम के लिये उपयुक्त है फली का रंग हल्का हरा एवं 18 से.मी लम्बा होता है। 45-50 दिनो मे पक कर तैयार हो जाती है। इसकी उपज 75-80 क्ंविटल/हेक्टेयर होती है।

अन्य किस्मे : पूसा सुकोमल (मोजैक वाइरस प्रतिरोधाी), काषी गौरी तथा काषी कंचन।

बीज दर :

साधाारणतया 12-20 कि.ग्रा. बीज/हेक्टेयर की दर से पर्याप्त होता है। बीज की मात्रा प्रजाति तथा मौसम पर निर्भर करती है। बेलदार प्रजाति के लिए बीज की कम मात्रा की आवष्यकता होती है।

बुवाई का समय :

गर्मी के मौसम के लिए इसकी बुवाई फरवरी-मार्च में तथा वर्षा के मौसम में जून अंत से जुलाई माह में की जाती है।

बुवाई की दूरी :

झाड़ीदार किस्मों के बीज की बुवाई के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45-60 सें.मी. तथा बीज से बीज की दूरी 10 सें.मी. रखी जाती है तथा बेलदार किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 80-90 सें.मी. रखते हैं। बुवाई से पहले बीज का राइजोबियम नामक जीवाणु से उपचार कर लेना चाहिए। बुवाई के समय भूमि में बीज के जमाव हेतु पर्याप्त नमी का होना बहुत आवष्यक है।

उर्वरक व खाद :

गोबर या कम्पोस्ट की 20-25 टन मात्रा बुवाई से 1 माह पहले खेत में डाल दें। लोबिया एक दलहनी फसल है, इसलिए नत्रजन की 20 कि.ग्रा, फास्फोरस 60 कि.ग्रा. तथा पोटाष 50 किग्रा/हेक्टेयर खेत में अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए तथा 20 कि.ग्रा. नत्रजन की मात्रा फसल में फूल आने पर प्रयोग करें।

खरपतवार नियंत्रण :

 दो से तीन निराई व गुड़ाई खरपतवार नियंत्रण के लिए करनी चाहिए। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए स्टाम्प 3 लीटर/हेक्टेयर की दर से बुवाई के बाद दो दिन के अन्दर प्रयोग करें।

तुड़ाई :

लोबिया की नर्म व कच्ची फलियों की तुड़ाई नियमित रूप से 4-5 दिन के अंतराल में करें। झाड़ीदार प्रजातियों में 3-4 तुड़ाई तथा बेलदार प्रजातियों में 8-10 तुड़ाई की जा सकती है।उपज : हरी फली की झाड़ीदार प्रजातियों में उपज 60-70 क्विंटल तथा बेलदार प्रजातियों में 80-100क्ंविटल हो सकती है।

बीज उपज : 5-6 क्विंटल/हेक्टेयर।

प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

जीवाणुज अंगमारी (जैन्थोमोनास कैम्पेस्ट्रिस विग्नीकोला)

लक्षण:

रोग संक्रमित बीजों से निकलने वाले पौधाों के बीज पत्रों, एवं नई पत्तियों पर रोग के लक्षण सर्वप्रथम दिखाई पड़ते हैं। इस रोग के कारण बीज पत्र लाल रंग के होकर सिकुड़ जाते हैं। नई पत्तियों पर सूखे धाब्बे बनते हैं। पौधाों की कलिकाएं नष्ट हो जाती हैं और बढ़वार रूक जाती है। अन्त में पूरा पौधाा सूख जाता है।

नियंत्रण:

रोगी पौधाों के अवषेषों को नष्ट कर देना चाहिए। जल निकास का अच्छा प्रबंधा होना चाहिए। दो वर्षों का फसल चक्र अपनाना चाहिए। उपचारित बीज का प्रयोग करना चाहिए तथा उन्नत कृषि विधिायां अपनानी चाहिए। खड़ी फसलों में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 कि.ग्रा. एक हजार लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।

लोबिया मोजैक (मोजैक विषाणु)

लक्षण :

रोगी पत्तियां हल्की पीली हो जाती हैं। इस रोग में हल्के पीले तथा हरे रंग के दाग भी बनते हैं। रोग की उग्र अवस्था में पत्तियों का आकार छोटा हो जाता है और उन पर फफोले सदृष उभार आ जाते हैं। रोगी फलियों के दाने सिकुड़े हुए होते हैं तथा कम बनते हैं।

नियंत्रण :

रोगी पौधाों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए।स्वस्थ तथा अच्छे पौधाों से प्राप्त बीज को ही बीज उत्पादन के काम में लाना चाहिए। कीटनाषी जैसे मेटासिस्टॉक्स (ऑक्सी मिथाइल डेमेटॉन) या रोगार (डाइमेथोएट एक मि.ली. या डायमेक्रान (फॉस्फेमिडान) का 0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर 15-15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए।

फली भेदक कीट (मुरिका टेस्टुलैलिस)

लक्षण :

पौधे के परिपक्व होते समय इस कीट के इसके लार्वा फुलो के कलियो एवं फली मे छेदकर करके नुकसान पहुचाते है।

नियंत्रण :

इस कीट के नियंत्रण के लिये कार्बारिल 0.15 प्रतिशत या साईपरमेथ््रािन 0.0125 प्रतिशत की दर से  पौधे के कली अवस्था मे छिडकाव करना चाहिए।

माहु

इस कीट के शिशु वृध्दि कर रहे नये पौधे की पत्तियो के रस को चुसकर हानि पहुचाते है जिसके कारण पत्तिया सुखने तथा मुडने लगती है। तथा पौधे की वृध्दि रूक जाती है और फली नही बन पाती है। यह कीट मोजेक विषाणु रोग के भी फैलाती है।

नियंत्रण : इसकी रोकथाम के लिये फास्फोमिडान या डामेथोएट 0.05 प्रतिशत की दर से छिडकाव करना चाहिए।

 


Authors:

विजय कुमार सुंर्यवशी एवं नितेश गुप्ता (उधानिकी विभाग)

एम.एस.सी(कृषि)उघानिकी, ग्रा.कृ.वि.अ. वि.ख. बिल्हा, जिला बिलासपुर (छ.ग.)

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