Advanced production technology of aromatic Pamaroja grass in Arid regions 

रोशा घास या पामारोजा एक बहुवर्षीय सुगंधित घास है, जिसका वानस्पतिक नाम सिम्बोपोगान मार्टिनाई प्रजाति मोतिया है। जो पोएसी कुल के अन्तर्गत आता है। पामारोजा की खेती पामारोजा तेल केे आर्थिक उत्पादन के लिए उगाया जाता है | पूर्णतया शुष्क क्षेत्रों में उगाये जा सकने वाले इस पौधे के लिए ज्यादा पानी एवं खाद की आवश्यकता नहीं होती है। इस प्रकार भारत के शुष्क क्षेत्रों वाले भागों में पामारोजा की खेती करके पर्याप्त लाभ कमाया जा सकता है।

पामारोजा एक सुगन्धित पौधा है जो एक बार लगा देने के उपरान्त 4 से 6 वर्ष तक उपज देता है। पामारोजा 4 वर्ष तक अधिक उपज देता है, इसके पश्चात तेल का उत्पादन कम होने लगता है। इसका पौधा 10 डिग्री से 45 डिग्री सेल्सियस तक तापमान सहन करने की क्षमता रखता है। पामारोजा सूखा सहिष्णु है यह 150-200 सेमी तक लंबा होता है तथा सूखा की निश्चित अवधि का सामना और अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में एक वर्षा आधारित फसल के रूप में इसकी खेती की जा सकती है। पामारोजा की खेती उत्तरप्रदेश, जोधपुर (राजस्थान), आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात और मध्य प्रदेश में विशेष रूप से की जाती है | रोशा घास के प्रमुख रासायनिक घटक जिरेनियाल और जिरेनाइल एसीटेट हैं।

रोशा घास या पामारोजा बीज पामारोजा

रोशा घास या पामारोजा                 बीज पामारोजा

रोशा घास का उपयोग

पामारोजा का तेल बड़े पैमाने पर इत्र, सौंदर्य प्रसाधन, और स्वादिष्ट बनाने का मसाला में प्रयोग किया जाता है। एंटीसेप्टिक, मच्छर से बचाने वाली क्रीम और दर्द तेल के गुणों से राहत में यह बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाताहै। दवा में यह लूम्बेगो, सख्त जोड़ और त्वचा रोगों के लिए एक उपाय के रूप में प्रयोग किया जाता है।

जलवायु एवं मृदा :

उष्ण कटिबंधीय, गर्म, आर्द्र क्षेत्रों में 900 की ऊंचाई तक मैदानों-1000 मीटर के विकास के लिए अनुकूल हैं | रेतीली दोमट मिट्टी जिसका पी.एच.मान 7.0-8.5 के मध्य हो उपयुक्त रहती है।उचित जल निकास वाली मृदायें जिसका पीएच मान 7.5-9तक हो मिट्टी पर अच्छी पैदावार की जा सकती  है |

पामारोजा उगाने के लि‍ए खेत की तैयारी :

मानसून की शुरुआतहोने से पहले खेत अच्छी तरह से तैयार किया जाता है।खेत को 2-3 बार जोता जाता हैएवं सभी खूंटी और घास की जड़ों को हटा देना चाहिए | आखिरीजुताई के समय, सड़ीहुईगोबरकी खाद10 टन/हेक्टेयर मिट्टी में डालना चाहिएहै |

प्रवर्धन एवं पौध रोपण:

पामारोजा बीज के माध्यम से प्रचारित किया जा सकता है | बीज को रेत के साथ मिला कर 15-20 सेमी की दूरी पर नर्सरी की जाती है तथा नर्सरी को लगातार पानी छिड़काव के द्वारा नम रखा जाता है | बीज द्वारा, रोपण विधि से एक हेक्टेयर के लिए 2.5 किलो बीज की आवश्यकता होता है, नर्सरी का सर्वोत्तम समय अप्रैल-मई  होता है। पौध 4 सप्ताह के बाद रोपाई के लिए तैयार हो जाती  हैं |

रोपण दूरी एवं रोपण समय :

सामान्य दशाओं में 60 × 60 सेंटीमीटर की दुरी पर लगते है | असिंचित अवस्था में 30 × 30  सेंटी मीटर की दुरी पर लगते है| पामारोजा की रोपाई मानसून के आगमन (जून से अंत अगस्त) तक कर देनी चाहिए |

खाद एवं उर्वरक :

10 टन/ हे. सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मीकंपोस्ट को बोनेे से पहले देना चाहिए । पामारोजा में 100 : 50 : 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, फास्फोरसव पोटाश की अवश्यकता प्रति हे./वर्ष पड़ती हैं। लगभग 40 किलो /हे. नाइट्रोजन की मात्रा प्रत्येक फसल काटने के बाद तीन भाग में देना चाहिये | जिंक सल्फेट 25 किलो/हे. डालने पर उपज में वृद्धि होती है |

उन्नत किस्मेकुछ उन्नत किस्मों को सीएसआईआर-केंद्रीय औषधीय तथा सुगंधित पौधा संस्थान लखनऊ द्वारा विकसित किया गया है:

खेती की जाने वाली विभिन्न किस्मों/उपभेदों की विशेषताओं की तालिका

पीआरसी-1

तेल की उपज 225 किलोग्राम/हेक्टेयर, जिरेनियाल 75-80%

तृष्णा

तेल की उपज 250 किलोग्राम/हेक्टेयर, जिरेनियाल 78-82%, उत्तर भारत के मैदानी इलाकों के लिए उपयुक्त

तृप्ता

तेल की उपज 275 किलोग्राम/हेक्टेयर, तेल की मात्रा 0.7-1.0%, बौना, जल्दी परिपक्व

वैष्णवी

तेल की उपज 164 किलोग्राम/हेक्टेयर/कटाई, जिरेनियाल 78-82%, स्वयं परागण विविधता

हर्ष

हर्ब उपज 300 क्विंटल/हेक्टेयर, तेल उपज 243.34 किलोग्राम/हेक्टेयर, जिरेनियाल 89.5%

सिंचाई प्रबन्ध :

सिंचाई की आवश्यकता मौसमपर निर्भर करती है | पहली सिचाई रोपण के तुरंत बाद करनी चाहिए । वर्षा ऋतू में सिचाई की आवश्यकता नहीं होती है ।गर्मी के मौसम में 3-4 सिचाई तथा शरद ऋतू में दो सिचाईपर्याप्तरहती है हालांकि, कटाई से पहले, सिंचाई बंद कर देना चाहिए। प्रत्येक कटाई के बाद सिचाई अवस्य करनी चाहिए |

खरपतवार नियन्त्रण:

प्रारंभिक अवस्था के समय खरपतवार नियंत्रण की जरुरत पड़ती है  जो की अच्छी फसल पाने के लिए आवश्यक है।पहले वर्ष3-4 निराई, और बाद के वर्षों में दो निराईकी आवश्यक्ता पड़ती है| मल्च का उपयोग करने से यह न केवल मिट्टी में नमी  बनाये रखता  है, बल्कि यह खरपतवार की वृद्धि को भी रोकता है।

कीट एवं रोग नियन्त्रण:

पामारोजा  के पौधो पर कोई विशेष कीट एवं बीमारी का प्रकोप नहीं होता है । कभी-कभी एफिड, थ्रिप्स, व्हाइट ग्रब का प्रकोप हो जाता है, जिसकी रोकथाम के लिएरोगर(0.1%) या मोनोक्रोटोफॉस(०.1%) कीटनाशी का छिड़काव करना चाहिये एवं पत्ता तुषार नामक रोग का प्रकोप हो जाने परबेंलेट(0.1%) फफूदीनाशी रसायन का छिड़काव करना चाहिये।

फसल कटाई :

तेल पामारोजा के सभी भाग में पाया जाता है, जैसे-फूल, पत्ती, तना इनमे से फूल वाला सिरा मुख्या भाग होता है जिसमे आवश्यक तेल की मात्रा ज्याद पायी जाती है | फसल की कटाई जमीन से 15 - 20 सेमी. भाग छोड़कर 50 प्रतिशत पुष्प आने पर दराँती द्वारा की जाती है। वर्षाा ऋतु मे फूल आने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिये । पामारोजा घास काटने के बाद आसुत या तो ताजा या 12-24 घंटे के लिए सुखाने से तेल को निकलते समय बढ़ाया जा सकता है |

उपज (किलो प्रति वर्ष):

20-30 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष की ताजा घास की उपज प्राप्त होती है। तेल की पैदावार पहले साल में कम होती है तथा यह रोपण की उम्र के साथ वृद्धि करती है। वर्षा आधारित फसल के लिए 4 साल के लिए उपज नीचे दी गई है;

वर्ष   उपज
प्रथम वर्ष  20 कि.ग्रा./हे.
दूसरा वर्ष                      60 कि.ग्रा./हे.
तीसरावर्ष                    70 कि.ग्रा./हे.
चौथावर्ष                     70 कि.ग्रा./हे.
सिंचित अवस्था में तेल का 220-250 कि.ग्रा./हे. प्रति‍ वर्ष तथा असिंचित अवस्था में 125-150 कि.ग्रा./हे./वर्ष उत्‍पादन होता है।


भंडारण

आसवन के पश्चात् सामान्य तापक्रम पर पामारोजा के तेल को एलुमिनियम की बोतल में भंडारित किया जा सकता है | कंटेनर स्वच्छ और जंग से मुक्त होना चाहिए 


 

Authors:

आशीष कुमार*

सीएसआईआर-केंद्रीय औषधीय तथा सुगंधित पौधा संस्थान, अनुसंधान केंद्र,

बोदुप्पल, हैदराबाद, तेलंगाना राज्य, भारत-500092,

सम्पर्क ईमेल: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.