मध्यप्रदेश के असिंचित क्षेत्रों में चने की फसल के बाद रबी में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में, मसूर मुख्य फसल है। मसूर (lentil) की संरचना ही कुछ ऐसी है कि ये पानी का उपयोग इसके जीवनकाल में कम से कम करती है। इसकी पूरी ब्राहयाकृति छोटी सी झाड़ी जैसी है, तने पर सूक्ष्म रोयें पाये जाते है एवं पत्तियां भी बारीक व लंबी होती है, यही कारण है कि अन्य दलहनी फसलों की अपेक्षा मसूर की खेती को प्रति इकाई उत्पादन में पानी की कम मात्रा की आवश्‍यकता होती है।

मसूर की फसल पाले तथा ठंड के लिये अति संवेदनशील है, फिर भी अन्य रबी दलहन फसल मटर, चना की अपेक्षा अधिक ठण्ड को सहन कर सकती है। कम सर्दी वाले इलाको में इसकी उपज कम मिलती है। इस फसल को प्रारंभिक अवस्था में ठंड तथा पकते समय कम तापक्रम की आवश्‍यकता होती है। इसके दानों में 2421 प्रतिशत प्रोटीन, 260 ग़्रा प्रति 100 ग्राम कैल्‍शि‍यम, लोहा 754 ग़्रा प्रति 100 ग्राम में होता है, राइबोफ्लेबिन, नियासिन आदि प्रचुर मात्रा में पाया जाता है देश में मसूर की खेती अधिकांश्त: उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश एवं बिहार में होती है, मध्यप्रदेश में बड़े दाने की बहुत अच्छी मसूर पैदा होती है यहां इसकी औसत उपज 4-5 क्विं प्रति हेक्टेयर है जो कि दूसरे प्रदेशो से कम है क्योंकि मध्यप्रदेश में वर्षा आधारित क्षेत्रों में ही इसकी फसल ली जाती है एवं उक्टा प्रतिरोधी किस्मों के विषय में कृषकों को ज्ञान न होना है।

भूमि का चयन

मसूर वर्षा आधारित फसल होने के कारण ऐसी मिटटी वाले खेतों का चयन करना चाहिए जिसमें नमी का संरक्षण हो, दोमट से भारी भूमि इसके लिऐ अधिक उपयुक्त है हल्की एवं क्षारीय भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है हल्की भुमि में कई बार सिचाई करनी पड़ती हैं मिटटी का पीएच मान 65 से 70 क़े बीच होना चाहिए तथा जल निकास की व्यवस्था होनी चाहिए अन्यथा पौधों के बढवार एवं उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है

जलवायू

यह रवी मौसम की फसल है अत: ठंडी जलवायू इसके लिये उपयुक्त है इसे समुद्र तल से तीन हजार मीटर ऊचांई वाले क्षेत्रों में भी सफलता पूर्वक उगांया जा सकता है परन्तु अत्यन्त ठंड एवं पाला पडने वाले स्थानों पर मसूर की उपज पर प्रतिकूल असर पड़ता है बीज के विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ने से बाजार में उचित मूल्य नहीं मिलता है।

बुआई का समय

हमारे देश में अंसिचित अवस्था में खरीफ की फसल की कटाई के बाद नमी उपलब्ध रहने पर अक्टूबर के प्रथम सप्ताह से नबम्बर के प्रथम सप्ताह तक मसूर की बोनी करना चाहिए। सिंचित अवस्था में बोनी मघ्य अक्टूबर से मध्य नबम्बर तक की जा सकती है। मध्य नबम्बर के पश्चात बोनी करने से उपज कम मिलती है क्योकि 15  फरवरी से ही तापक्रम की वृद्धि होने लगती है जिसके दुष्प्रभाव के कारण समय से पूर्व फसल पकने लगती है जिससे बीज छोटा हो जाता है एवं साथ में कई बिमारियां भी आती है अत: समय पर बोनी अति आवश्‍यक है।

भूमि की तैयारी

जब खरीफ मे पर्याप्त वर्षा न हो तो खेत में बुआई के पहले सिचांई कर,ें जब  खेत में वतर आ जाये  तब दो-तीन बार हल्की जुताई करके बखरनी करें तथा पाटा चलाकर खेत को समतल करें। जिससे नमी संरक्षित रहें। मसूर के लिये अधिक भुरभुरी व बारीक मिटटी की आवश्‍यकता होती है जिससे अकुंरण अच्छा होता है। 

Varieties of Lentil

किस्म

 

पकने की अवघि दिनों में

 

औसत उपज

क्विंहे

विशेषताएं

 

जवाहर मसूर-1

 

120-125

 

16-19

 

मध्यम, बड़ दाना शीध्र पकने वाली

 

जवाहर मसूर-3

 

115-120

 

1श्‍-20

 

बड़ा बीज एवं उगरा प्रतिरोधी

 

एल-4076

 

130-135

 

1श्‍-22

 

मध्यम बड़ा उक्टा एवं गेरूआं के लिए शहनश्‍ाील

 

के-75

 

130-135

 

1श्‍-22

 

बड़ा दाना गेरूआं एवं उक्टा रोग के लिए शहनश्‍ाील

 

आईपीएल-श्‍1

 

110-120

 

1श्‍-20

 

बड़ा दाना गेरूआं एवं उक्टा के लिए शहनश्‍ाील

 

शेरी डीपीएल-62

 

130-135

 

1श्‍-20

 

बड़ा दाना गेरूआ प्रतिरोधी एवं उक्टा रोग के लिए शहनश्‍ाील

 

बीज की मात्रा

मसूर का विपुल उत्पादन पाने के लिए पौधों की संख्या का पर्याप्त होना आवश्‍यक है इसके लिए बड़े दानों वाली जाति का 50-60 किग़्राम एवं छोटे दाने वाली जाति का 35-40 किग़्रा बीज प्रति हेक्टेयर बोना चाहिए। बोआई कतार में करना चाहिए, कतार से कतार की दूरी 30 सेमी रखना चाहिए। देरी से बुआई करने पर 20-25 सेमी क़तारों की दूरी रखना चाहिए बुआई नारी या सीड ड्रिल से 5-6 सेमी क़ी गहराई पर उपयुक्त होती है।

मृदा उपचार

गर्मी में गहरी जुताई करें। मृदा जनित रोगों से बचने के लिए यह अति आवश्‍यक तकनीक है इसके लिए दो किग़्राम ट्राइकोडरमा विरडी या ट्राइकोडरमा हारजीयानम को 100 किग़्रा ग़ोबर की सड़ी खाद या बायो गैस स्लरी में मिलाकर नम करके एक सप्ताह तक ढ़ककर अधेंरे स्थान में रखें तत््पश्चात बुआई से पूर्व खेत में फैलायें जिससे मृदा जनित रोगाें की रोकथाम हो जाये।

बीजोपचार

मसूर में मुख्य रूप से उक्टा रोग का प्रकोप होता है जिससे कभी कभी सतप्रतिश्‍ात हानि हो जाती है अत: इस लिये बुआई के लिए बीजोपचार अति आवश्‍यक है दो ग्राम थायरम एवं 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम से के अनुपात में मिलाकर प्रतिकिलों बीज की दर से उपचारित करें तत्पश्‍चात 5 ग्राम राईजोवियम एवं 5 ग्राम पीएसवी कल्चर प्रतिकिलों ग्राम बीज की दर से मिलाकर थोडा पानी छिडकर अच्छी तरह से मिलायें जिससे कल्चर बीज से चिपक जायें इस तरह बीजोपचार के बाद बीज को छाया में सुखा कर फिर बोनी करें।

खाद एवं उर्वरक

मृदा उपचार के बाद मिटटी परीक्षण के आधार पर की गई अनुसंश्‍ाा के अनुसार ही खाद उर्वरक देना चाहिए । 100-125 क्वि प्रति हेक्टेयर के हिसाब से गोवर की खाद या कम्पोस्ट खाद अवश्‍य देना चाहिए। गोबर खाद देने पर उर्वरकों की मात्रा आधी करना उचित होगा सिंचित फसल के लिये 20-25 किग़्रा नत्रजन एवं 30-40 किग़्रा स्फ़ुर का उपयोग प्रति हेक्टेयर करना चाहिये। गंधक की कमी वाले क्षेत्रों में 20 किग़्राम ग़ंधक सिंगल सुपर फास्फेट देना चाहिए।

सिंचाई

सामान्यत: मसूर की फसल असिंचित क्षेत्रों में ही ली जाती है। इसलिए यदि सिंचाई सुलभ हो तो बुआई पलेवा लगाकर करना चाहिए इससे मिटटी में नमी बनी रहती है एंव अकुरण अच्छा होता है मसूर में इसके बाद सिचांई की आवश्‍यकता नहीं होती है अगर पानी उपलब्ध हो तो एक सिंचाई फूल आने के पहले (बोनी के 40-45 दिन बाद) देने से उपज अच्छी होती है यदि मावट की वरसात हो जाए तो सिंचाई की आवश्‍यकता नहीं होती है अधिक सिंचाई मसूर को हानि पहुचां सकती है।

निंदाई-गुडाई

रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए बुआई से पूर्व फ्लूक्लोरेलिन 075 क़िग़्रा सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर 600 लि पानी में घोलकर छिडकाव करें। इस फसल में बोनी के बाद 50 दिनो तक खरपतवारों को नियंत्रण में रखना चाहिए नही तो इसकी बडवार में दुष्प्रभाव पडेगा। मसूर में खरपतवार की समस्या सिंचित फसल या मावट की वर्षा होने पर हो सकती है ऐसी स्थिति में 'हो यंत्र' एवं 'हो साइकिल यंत्र' चलाकर खरपतवार नियंत्रण करना चाहिए इससे गुडाई भी हो जाऐगी भुमि में वायु संचार वडेगा जो कि स्वास्थ के लिये अति आवश्‍यक है ।

रोग नियंत्रण

मसूर में मुख्य रूप से उक्टा रोग का प्रकोप होता है इसके लिय मृदा उपचार एवं बीजोपचार अति आवश्‍यक है किस्मों के चयन में सिर्फ उक्टा प्रतिरोधी जातियों का ही चयन करें, फसल चक्र वदलने से भी उक्टा  रोग कम हो सकता है। कभी- कभी गेरूआ रोग का भी प्रकोप होता है इसके नियंत्रण के लिए 12-5 ग़्राम डायथिन एम 45   प्रतिलिटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर फसल में छिडकाव करना चाहिए गेरूआ प्रभावित क्षेत्रों में एल-4076 गेरूआं निरोधक जाति बोयें।

कीट नियंत्रण

मसूर में फली छेदक कीट पत्ती छेदक एवं माहों का प्रकोप होता है इसके लिए मोनो क्रोटोफॉस 1 मिली लिटर लिटर पानी में या मैटासिटाक्स 15 मिली  लिटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव करें। फली छेदक कीटों के लिए क्निाल फास 1 मिली पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिडकाव करने से कीट नियंत्रित हो जाते है।

कटाई एवं गहाई

परिपक्व अवस्था में मसूर की फसल हरे से भुरे रंग की होने लगती है। तब फसल की कटाई सुबह जब थोड़ी ठंड एवं नमी रहती है, तब करना चाहिए जिससे बीज कम झडते है। फसल को काटकर खलिहान में अच्छे से सुखाना चाहिए। फिर डंडों से पीटकर एवं बैलों से गहाई करवाकर पंखे से साफ करनाा चाहिए दांतों के बीज को रखकर काटने से यदि कट की आवाज आये तो भण्डारण के लिये उचित मानना चाहिये।

उपज 

कृषि‍ की उन्नत तकनीकों को अपनाकर मसूर फसल से विपुल उत्पादन प्राप्त कर सकतें हैं। किस्म के अनुसार वारानी क्षेत्रों में 8-10 क्ंविटल व सिंचाई करने पर 15-16 क्ंविटल मसूर की उपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है।


Authors

विनोद कुमार एवं डॉ स्मिता पुरी

क्षेत्रिय कृषि अनुसंधान केन्द्र,

जवाहरलाल नेहरू कृषि‍ वि‍श्‍ववि‍द्यालय, सागर म0प्र0

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