प्‍याज की खेती  भारत के सभी भागों मे सफलता पूर्वक की जाती है। प्याज एक नकदी फसल है जिसमें विटामिन सी, फास्फोरस आदि पौष्टिक तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। इसका प्याज का उपयोग सलाद, सब्जी, अचार एवं मसाले के रूप में किया जाता है। गर्मी में लू लग जाने तथा गुर्दे की बीमारी में भी प्याज लाभदायक रहता है। भारत में रबी तथा खरीफ दोनो ऋतूओं मे प्‍याज उगाया जा सकता है।

 जलवायु एवं भूमि:

प्याज की फसल के लिए ऐसी जलवायु की अवश्यकता होती है जो ना बहुत गर्म हो और ना ही ठण्डी। अच्छे कन्द बनने के लिए बड़े दिन तथा कुछ अधिक तापमान होना अच्छा रहता है। आमतौर पर सभी किस्म की भूमि में इसकी खेती की जाती है, लेकिन उपजाऊ दोमट मिट्टी, जिसमे जीवांश खाद प्रचुर मात्रा में हो व जल निकास की उत्तम व्यवस्था हो, सर्वोत्तम रहती है। भूमि अधिक क्षारीय व अधिक अम्लीय नहीं होनी चाहिए अन्यथा कन्दों की वृद्धि अच्छी नहीं हो पाती है। अगर भूमि में गंधक की कमी हो तो 400 किलो जिप्सम प्रति हेक्टर की दर से खेत की अन्तिम तैयारी के समय कम से कम 15 दिन पूर्व मिलायें।

उन्नत किस्में:

खरीफ में बुवाई हेतु

रबी में बुवाई हेतु

एन-53, एग्रीफाउंड डार्क रेड

पूसा रेड, पूसा रतनार, एग्रीफाउंड लाइट रेड, एग्रीफाउंड रोज, पूसा व्हाइट राउंड, पूसा व्हाइट फ्लैट

खाद एवं उवर्रक:

प्याज के लिए अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद 400 क्विंटल प्रति हेक्टर खेत की तैयारी के समय भूमि में मिलावें। इसके अलावा 100 किलो नत्रजन, 50 किलो फास्फोरस एवं 100 किलो पोटाश प्रति हेक्टर की दर से आवश्यकता होती है। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई से पूर्व खेत की तैयारी के समय देवें। नत्रजन की शेष मात्रा रोपाई के एक से डेढ़ माह बाद खड़ी फसल में देवें।

बुवाई:

प्याज की बुवाई खरीफ मौसम में, यदि बीज द्वारा पौधा बनाकर फसल लेनी हो तो, मई के अन्तिम सप्ताह से लेकर जून के मध्य तक करते हैं और यदि छोटे कन्दों द्वारा खरीफ में अगेती या हरी प्याज लेनी हो तो कन्दों को अगस्त माह में बोयें। प्याज की खेती के लिए छोटे कन्द बनाने के लिए बीज को जनवरी के अन्तिम सप्ताह में या फरवरी के प्रथम सप्ताह में बोयें। रबी फसल हेतु नर्सरी में बीज की बुवाई नवम्बर-दिसम्बर में करनी चाहिए।

एक हेक्टर में फसल लगाने के लिए 8-10 किग्रा बीज पर्याप्त होता है। पौधे एवं कन्द तैयार करने के लिए बीज को क्यारियों में बोयें, जो 3x1 मीटर आकर की हो। वर्षाकाल में उचित जल निकास हेतु क्यारियों की ऊँचाई 10-15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। नर्सरी में अच्छी तरह खरपतवार निकालने तथा दवा डालने के लिए बीजों को 5-7 सेंटीमीटर की दूरी पर कतारों में 2-3 सेंटीमीटर गहराई पर बोना अच्छा रहता है। क्यारियों की मिट्टी को बुवाई से पहले अच्छी तरह भुरभुरी कर लेनी चाहिए।

पौधों के आद्र गलन बीमारी से बचाने के लिए बीज को ट्राइकोडर्मा विरिडी (4 ग्राम प्रति किग्रा बीज) या थिरम (2 ग्राम प्रति किग्रा बीज) से उपचारित करके बोना चाहिए। बोने के बाद बीजों को बारीक खाद एवं भुरभुरी मिट्टी व घास से ढक देवें। उसके बाद झारे से पानी देवें, फिर अंकुरण के बाद घास फूस को हटा देवें।

पौधों की रोपाई:

पौध लगभग 7-8 सप्ताह में रोपाई योग्य हो जाती है। खरीफ फसल के लिए रोपाई का उपयुक्त समय जुलाई के अन्तिम सप्ताह से लेकर अगस्त तक है। रोपाई करते समय कतारों के बीच की दूरी 15 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखते हैं।

कन्दों से बुवाई:

कन्दों की बुवाई 45 सेंटीमीटर की दूरी पर बनी मेड़ों पर 10 सेंटीमीटर की दूरी पर दोनों तरफ करते हैं। 5 सेंटीमीटर से 2 सेंटीमीटर व्यास वाले आकर के कन्द ही चुनना चाहिए। एक हेक्टर के लिए 10 क्विंटल कन्द पर्याप्त होते हैं।

सिंचाई:

बुवाई या रोपाई के साथ एवं उसके तीन-चार दिन बाद हल्की सिंचाई अवश्य करें ताकि मिट्टी नम रहें। बाद में भी हर 8-12 दिन में सिंचाई अवश्य करतें रहें। फसल तैयार होने पर पौधे के शीर्ष पीले पड़कर गिरने लगते हैं तो सिंचाई बन्द कर देनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण:

अंकुरण से पूर्व प्रति हेक्टर 1.5-2 किग्रा एलाक्लोर छिडकें अथवा बुवाई से पूर्व 1.5-2.0 किग्रा फ्लूक्लोरेलिन  छिड़ककर भूमि में मिलायें, तत्पश्चात एक गुड़ाई 45 दिन की फसल में करें।

प्रमुख कीट एवं व्याधियां

पर्ण जीवी (थ्रिप्स): ये कीट छोटे आकार के होते हैं तथा इनका आक्रमण तापमान में वृद्धि के साथ तीव्रता से बढ़ता है और मार्च में अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। इन कीटों द्वारा रस चूसने से पत्तियां कमजोर हो जाती हैं तथा आक्रमण के स्थान पर सफेद चकते पड़ जाते हैं। इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल (0.3-0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें। आवश्यक हो तो 15 दिन बाद दोहरावें।                                 

तुलासिता: पत्तियों की निचली सतह पर सफेद रूई जैसी फफूंद की वृद्धि दिखाई देती है। मेन्कोजेब या जाईनेब का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए।

अंगमारी: पत्तियों की सतह पर सफेद धब्बे बन जाते हैं जो बाद मे बीच से बैंगनी रंग के हो जाते हैं। मेन्कोजेब या जाईनेब का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। इसके साथ तरल (स्प्रेडर) साबुन का घोल अवश्य मिलाना चाहिए। 

गुलाबी जड़ सडन: इस रोग में जड़े हल्की गुलाबी होकर गलने लगती हैं। कार्बेण्डाजिम का 1 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करके बुवाई करें। पौध रोपण के समय पौधों को कार्बेण्डाजिम के 1 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल में डुबोकर रोपाई करें।

खुदाई:

कन्दों से लगाई प्याज की फसल 60 से 100 दिन में तथा बीजों से तैयार की गई फसल 140 से 150 दिन में तैयार होती है। रबी फसल की खुदाई पत्तियों के पीली होकर जमीन पर गिरने पर शुरू करनी चाहिए। खरीफ मौसम में पत्तियां नहीं गिरती है अत: दिसम्बर-जनवरी में जब गाठों का आकर 6 से 8 सेन्टीमीटर व्यास वाला हो जाये तो पत्तियों को पैरों से जमीन पर गिरा देना चाहिए, जिससे पौधों की वृद्धी रूक जाये एवं गाठें ठोस हो जायें। इसके लगभग 15 दिन बाद गांठों की खुदाई करनी चाहिए।

सुखाना:

खुदी हुई गांठों को पत्तियों के साथ एक सप्ताह तक सुखायें। यदि धूप तेज हो तो छाया में लाकर रख देवें तथा एक सप्ताह बाद पत्तों को गांठ के 2.0 से 2.5 सेंटीमीटर ऊपर से काट देवें तथा एक सप्ताह तक सुखायें।

उपज:

इस प्रकार उन्नत तकनीकें अपनाकर प्याज से प्रति हेक्टर लगभग 200 से 350 क्विंटल तक पैदावार ली जा सकती है।


Authors:

देश राज चौधरी एवं डॉ. सतीश कुमार

सब्जी  विज्ञान एवं पुष्पोत्पादन विभाग

शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं तकनीकी  विश्वविद्यालय, जम्मू-180 009    

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