तुलसी (Basil) एक द्विबीजपत्री तथा शाकीय, औषधीय पौधा हैं। यह झाड़ी के रूप में उगताहैं  और १ से ३ फुट ऊँचा होता हैं। इसकी पत्तियाँ बैंगनी आभा वाली हल्के रोएँ से ढकी होती हैं। पत्तियाँ १ से २ इंच लम्बी सुगंधित और अंडाकार या आयताकार होती हैं। पुष्प मंजरी अति कोमल एवं ८ इंच लम्बी और बहुरंगी छटाओं वाली होती हैं, जिस पर बैंगनी और गुलाबी आभा वाले बहुत छोटे हृदयाकार पुष्प चक्रों में लगते हैं। तुलसी के बीज चपटे पीतवर्ण के छोटे काले चिह्नों से युक्त अंडाकार होते हैं।

नए पौधे मुख्य रूप से वर्षा ऋतु में उगते हैं और शीतकाल में फूलते हैं। पौधा सामान्य रूप से दो-तीन वर्षों तक हरा बना रहता हैं। इसके बाद इसकी वृद्धावस्था आ जाती हैं। पत्ते कम और छोटे हो जाते हैं और शाखाएँ सूखी दिखाई देती हैं। इस समय उसे हटाकर नया पौधा लगाने की आवश्यकता प्रतीत होती हैं। यह लमियेसी परिवार से सम्बन्ध रखता हैं। तुलसी के अनेक ग़ुनो के कारण इसकी खेती भारत में सदियों से चली आ रही हैं।

तुलसी के पौधे के तेल में 72 % युगेनॉल की मात्रा होती हैं जो की लॉन्ग के तेल की मात्रा के बराबर होती हैं। युगेनॉल मुख्य रूप से सौंदर्य प्रसाधन, इत्र, दवाइयों में प्रयोग किया जाता हैं। इस पौधे के पत्ते भी " तुलसी चाय" बनाने के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं सामान्यतः तुलसी के पत्तो, बीज और सुखी जड़ो को आयुर्वेदिक दवाये बनाने में उपयोग किया जाता हैं। भारत में तुलसी की खेती को बड़े पैमाने पर प्रतोसाहन मिल रहा हैं।

तुलसी के पौधे में अनेको लाभकारी गुण मौजूद हैं। तुलसी को बुखार, सर्दी, खांसी में उपयोग किया जाता हैं। तुलसी को तनाव में भी उपयोग किया जा सकता हैं। तुलसी गुर्दे की पथरी को भंग कर सकती हैं, दिल को सवस्थ रखती, कैंसर भी में उपयोग की जाती हैं। इसके उपयोग से धूम्रपान छोड़ने में मदद मिलती हैं। तुलसी रक्त शर्करा के स्तर को कम कर सकती हैं। तुलसी त्वचा एवं बालों को स्वस्थ रखने में लाभकारी हैं। तुलसी से सांस की बीमारियों में मदद मिलती हैं तथा सिरदर्द के इलाज में भी कारगर हैं।

प्राचीन काल से ही यह परंपरा चली आ रही हैं  कि घर में तुलसी का पौधा होना चाहिए। शास्त्रों में तुलसी को पूजनीय, पवित्र और देवी स्वरूप माना गया हैं। हिन्दू धर्म में तुलसी को बहुत ही पवित्र माना जाता हैं और हिन्दू लोग इसकी पूजा भी करते हैं।

तुलसी जैसे औसधीय पौधे में भी कई प्रकार के रोग लगते हैं। जो इसकी गुणवता को कम करते हैं। इससे मिलने वाले तेल की मात्रा भी कम हो जाती हैं एवं उपज पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता हैं। तुलसी में लगने वाले प्रमुख रोग फूजेरियम विल्ट और मुकुट सड़ांध, जीवाणु पत्ता झुलसा, मृदुरोमिल आसिता व पत्ता झुलसा हैं। 

तुलसी के रोग उनकी रोकथाम

फूजेरियम विल्ट और मुकुट सड़ांध

लक्षण

यह रोग मीठी तुलसी किस्मों के साथ ही अन्य अतिसंवेदनशील किस्मों को प्रभावित करता हैं। यह एक बहुत ही आम और गंभीर बीमारी हैं। पौधों की वृद्धि रुकना, पत्तो का छड़ना, पत्तो का पिला पड़ना और मुरझाना मुख्य लक्षण हैं। तने पर भूरे रंग के धब्बे या धारियाँ प्रमुख हैं। गंभीर रूप से मुड़े हुए तने भी कवक द्वारा प्रेरित लक्षणों का एक हिस्सा हैं। इस रोग की प्रारम्भिक अवस्था में पौधों की पत्तियाँ नीचे से ऊपर की ओर पीली पड़ने लगती हैं और पौधा सूख जाता हैं|

कारण जीव: फूजेरियम ऑक्सीस्पोरम

नियंत्रण 

एकान्तिरित खेती, मृदा सौरीकरण और कार्बेन्डाजिम (0.1%) या कैप्टान (0.2%) का घोल जड़ो के आस पास मिलाने से बीमारी को कम करने में मदद मिलती हैं।

जीवाणु पत्ता झुलसा

आमतौर पर काले या भूरे रंग के धब्बे पत्तों के ऊपर दिखाई देते हैं और लकीरे तनो पर प्रमुख रूप से दिखाई देती हैं।

कारण जीव: स्यूडोमोनास सिकोरी

नियंत्रण 

रोग को पौधों के बीच अच्छी हवा के परिसंचरण द्वारा कम किया जा सकता हैं। साथ ही कॉपर फफूंदनाशको का प्रयोग अधिक रोग अवस्थ में लाभप्रद होता हैं।

मृदुरोमिल आसिता

लक्षण

पत्तों का ऊपरी सतह से पिला होना तथा निचली सतह से सफेद या ग्रे रंग की फंगस की परत होती हैं। कवक गीली परिस्थितियों से तेजी से बढ़ता हैं और जलनुमा धब्बो का निर्माण करता हैं। 

कारण जीव: पेरोनोस्पोरा प्रजाति    

नियंत्रण 

पौध क्षेत्र में अच्छी जल निकासी और हवा परिसंचरण प्रदान करें। पौधों में ऊपरी  सिंचाई से परहेज किया जाना चाहिए। क्यूकि फफूँद बीजाणु आसानी से छिड़क कर सवस्थ पत्तियों पर आक्रमण करते हैं। रिडोमिल या मैटाएक्सील .२५% का छिड़काव १२-१४ दिन के अंतराल पर करें।

पत्ता झुलसा

लक्षण 

यह रोग बरसात के मौसम में आम हैं। पत्तियों पर हल्के भूरे रंग के गोल धब्बे बन जाते हैं जिनके चारों तरफ निचली सतह पर पीले घेरे होते हैं। उग्र प्रकोप से तने तथा पुष्प शाखाओं पर भी धब्बे बन जाते हैं। इस रोग से पत्तो का ३०-४० फीसदी क्षेत्र धब्बों के द्वारा संक्रमित होता हैं यह रोग पतियों के मुड़ने और झड़ने का कारण भी बनता हैं बाद में ये पत्ते सुख के पौधे से गिर जाते हैं।

कारण जीव: अलटरनेरिआ अलटरनाटा

नियंत्रण

शुरू में संक्रमित पत्तियों को नष्ट करें। स्ट्रोबिलुरिन (0.05%) या इप्रिओडिओन् (0.2%) और कैप्टॉन (0.2%) के फफुंदनाशको का प्रयोग के रूप में करने से रोग काफी हद तक कम होता हैं।


Authors:

सुनीता चन्देल और विजय कुमार

पादप रोगविज्ञान विभाग, डॉ वाई ऐस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन, हिमाचल प्रदेश 173230

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