Cultivation technique of Swarnamukhi or Sonamukhi or Sunamukhi or Senna

सनाय या सोनामुखी की खेतीसोनामुखी या सनाय बहुवर्षीय कांटे रहित झाड़ीनुमा, औषधीय पौधा है जो लैग्यूमीनेसी (दलहनी) कुल के अन्तर्गत आता है। पूर्णतया बंजर भूमि में उगाये जा सकने वाले इस पौधे के लिए ज्यादा पानी एवं खाद की आवश्यकता नहीं होती है। इस प्रकार भारत के बंजर भूमि वाले भागों में सोनामुखी की खेती करके पर्याप्त लाभ कमाया जा सकता है। सोनामुखी एक औषधीय पौधा है जो एक बार लगा देने के उपरान्त 4-5 वर्ष तक उपज देता है। इसका पौधा 4 डिग्री से 50 डिग्री सेल्सियस तक तापमान सहन करने की क्षमता रखता है।

एक बार लगा देने के बाद इस फसल के पौधों को न तो कोई जानवर एवं पशु पक्षियों से नुकसान होता है और ना ही कीटों का प्रकोप  बहुत होता है। दलहनी पौधा होने के कारण भूमि की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है। इसकी पत्तिायों, फलियों को विदेशों को निर्यात करके विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है। सोनामुखी की खेती भारत में मुख्य रूप से होती है। देश में सोनामुखी का उत्‍पादन राजस्थान, तमिलनाडु, गुजरात में विशेष रूप से होता है।

जलवायु एवं मृदा : सोनामुखी शुष्क जलवायु एवं कम वर्षा वाले क्षेत्रों (30-40 सेमी) के लिए उपयुक्त है। रेतीली दोमट मिट्टी जिसका पी.एच.मान 7.0-8.5 के मध्य हो उपयुक्त रहती है।

खेत की तैयारी:

सोनामुखी की बुवाई से पूर्व खेत की कोई विशेष तैयारी करने की जरूरत नहीं होती है। फिर भी प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से बाद में 1-2 बार हैरो या कल्टीवेटर से जुताई, फिर पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए।

बुवाई का समय, बीज दर व विधि:

सोनामुखी की बुवाई के लिए 15 जुलाई से 15 सितम्बर तक का समय उपयुक्त होता है। एक हैक्टेयर में बुवाई हेतु लगभग 10-12 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। इसकी बुवाई हल या ट्रेक्टर द्वारा सीडड्रील से 2-3 सेमी की गहराई पर करे परन्तु छिटकाव पध्दति से भी बुवाई सफलतापूर्वक की जा सकती है। बुवाई करते समय कतार से कतार की दूरी 50 सेमी से अधिक न हो। और पौधे से पौधे की दूरी 30 सेमी रखनी चाहिए।

खाद एवं उर्वरक:

मृदा जांच के उपरान्त खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करना उत्ताम रहता है। यदि किसी कारणवश मृदा जांच न हो सके, तो उस स्थिति में निम्न मात्रा एवं उर्वरक प्रति हैक्टेयर डालना उपयुक्त होगा। गोबर की खाद 10-15 टन, नाइट्रोजन 50 किलोग्राम, फास्फोरस 10 किलोग्राम एवं पोटाश 40 किलोग्राम।

उन्नत किस्मे :

ए.एच.एफ.टी: इस किस्म को गुजरात में बड़े पैमाने पर उगाया जा रहा है। इसको विशेष रूप से पत्तिायों के लिए उगाया जाता है।

सोना: इस किस्म को उत्तार भारत के मैदानी क्षैत्रों में उगाने हेतु संस्तुत किया गया है। इसकी पत्तिायों में सोनासाइड 3.51 प्रतिशत तक पाया जाता है।

सिंचाई प्रबन्ध:

वर्षा ऋतु में यदि काफी लम्बे समय तक वर्षा न हो तो आवश्यकता अनुसार उपलब्ध होने पर सर्दियो में 30 दिन और गर्मियों में 15 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए यदि वर्षा ऋतु में सोनामुखी की फसल में पानी एकत्रित हो जाये, तो उसे निकालने की तुरन्त व्यवस्था करनी चाहिए अन्यथा फसल को नुकसान की आशंका रहती है।

खरपतवार नियन्त्रण:

फसल की बढ़वार अवस्था में यदि खेत में खरपतवार ज्यादा उग जाए तो आवश्यकतानुसार निराई-गुडाई करनी चाहिए वैसे इसकी फसल के 30 दिन की हो जाने के बाद निराई-गुड़ाई की आमतौर पर बहुत कम आवश्यकता होती है।

कीट एवं रोग नियन्त्रण:

सनाय के पौधो पर कोई विशेष कीट एवं बीमारी का प्रकोप नहीं होता है परन्तु कभी-कभी पत्ताी खाने वाली सूंडी, सफेद मक्खी, फजी बेधक आदि कीट तथा आद्र विगलन (डैम्पिंग ऑफ) नामक रोग का प्रकोप हो जाता है अत: इनका नियन्त्रण के लिए किसी उपयुक्त कीटनाशी एवं फुूंदनाशी रसायन का प्रयोग करना चाहिए।

फसल कटाई:

सोनामुखी की बिजाई के लगभग 100-120 दिनों के उपरान्त इसकी पत्तियां काटने लायक हो जाती है। पौधों की कटाई तेजधार वाले हंसिए द्वारा जमीन से तीन इंच उपर से करनी चाहिए ताकि उसमे आसानी से दोबारा पत्तो आ जाए प्रथम कटाई से 60 से 75 दिन के अन्तराल पर इस फसल की अगली कटाइयां करनी चाहिए।

उपज:

बारानी क्षैत्रों में इस फसल से लगभग 400 से 600 किग्रा सूखी पत्तिायों का उत्पादन होता है। बीज का उत्पादन बारानी व सिंचित दशा में क्रमश: 4 क्विंटल व 8 क्विंटल प्रति हैक्टेयर मिल जाता है।

कटाई उपरान्त प्रबन्धन व संग्रहण:

सोनामुखी पौधे के पत्तो कटाई के बाद सूखने पर भी इनका रंग हरा रहना चाहिए। इसलिए काटने के उपरान्त उनकी छोटी-छोटी ढेरियां लगा देनी चाहिए। पत्ताों का रंग हरा रहे इसके लिए पत्ताों को छाया में सुखाया जाना उपयुक्त रहता है। सूख जाने पर एक तिरपाल बिछाकर पत्तियों को झाड़ लिया जाना चाहिए जिससे पत्तियां अलग हो जाए तथा डंठल अलग हो जाएं। टहनियों से झाड़े गए पत्तों को बोरों में भर कर बिक्री हेतु भेजा जा सकता है। अत: यह ध्यान रखना चाहिए कि जिन बोरों में पत्ते भरे जाएं वे हल्के बारदान के बने हों। प्राय: इस कार्य हेतु 50'x50'' के बोरों को उपयोग में लाना उपयुक्त रहता है।

बीज उत्पादन:

प्रारम्भ में सोनामुखी फसल के बीज किसी प्रमाणिक संस्थान से खरीदा जाना चाहिए परन्तु भविष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अथवा फसल को और अधिक बढ़ाने की दृष्टि से यह उपयुक्त रहता है कि कृषक बीजों का उत्पादन भी स्वयं ही करे। बीज प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि किसान अपने खेत के सबसे अच्छे एवं स्वस्थ पौधों को काटे नहीं। इससे इन पौधों पर फलियां लगेगी जो कि पकने पर भूरी हो जाएंगी। इन फलियों को तोड़कर धूप में सुखाकर तथा सूखी हुई फलियों को डंडों से कूटकर बीज को पृथक कर लेना चाहिए। ये बीज साफ करके सनाय की अगली फसल की बिजाई हेतु प्रयुक्त किए जा सकते है।

सोनामुखी के फायदे:

  • सोनामुखी की फसल किसी भी प्रकार की भूमि (विशेषतया बंजर भूमि) में पैदा हो सकती है।
  • इसकी खेती से भूमि की उपरी परत (मृदा) सुरक्षित रहती है।
  • भू-संरक्षण एवं जल-संरक्षण में सहायक।
  • पौधों में वर्षभर फूल आते रहते है अ: मधुमक्खी पालन करके अतिरिक्त आय अज्रित कर सकते है।

 


Authors:

रूपेश कुमार मीना1, भागचन्द कांसोंटिया2, विमल3

विद्यावाचस्पति छात्र, सस्‍यवि‍ज्ञान वि‍भाग, 1 व 3 मृदावि‍ज्ञान वि‍भाग

स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर - 334006 (राजस्थान)

सवांदी लेखक : This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.