Scientific cultivation, integrated disease and pest management of cowpea.

लोबिया एक महत्वपूर्ण सब्जी की फसल है लोबिया की खेती मैदानी क्षेत्रों में फरवरी से अक्टूबर तक सफलतापूर्वक की जाती है। दलहनी फसल होने के कारण यह वायुमण्डलीय नत्रजन को भुमि में संचित करती है जिससे जमीन की उर्वरता बढ़ती है एवं आगामी फसल को इस नत्रजन का लाभ मिलता है। लोबिया प्रोटीन के लिहाज से एक उत्तम फसल है तथा इसकी खेती दानें, सब्जी (हरी फली), चारे एवं हरी खाद के  लिये की जाती है।

कुपोषण दूर करने के लिए शाकाहारी भोजन में लोबिया का उपयोग बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अन्य हरी सब्जियों की तुलना में प्रोटीन, फास्फोरस एवं कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है। इसमें पाये जाने वाले विभिन्न तत्वों प्रति 100 ग्राम हरी फली में नमी 84.6 ग्रा., प्रोटीन 4.3 ग्रा., कार्बोहाइड्रेट 8.0 ग्रा., कैल्शियम 80.0 ग्रा. एवं मैगनेशियम  54.0 ग्राम इत्यादी । इसकी खेती मक्का, बाजरा, ज्वार या दलहनी फसलों के साथ सह-फसली खेती के रूप में की जा सकती है।

भूमि एवं जलवायुः

इसकी खेती सभी प्रकार की भूमि में जहाँ पानी नहीं रूकता है, की जा सकती है। परन्तु अच्छी उपज के लिए उचित जल निकास युक्त बलुई दोमट मिट्टी अच्छी रहती है। अधिक ठंड़ की अवधि नबम्बर, दिसम्बर एवं जनवरी महीने छोड़कर साल में बाकी समय का मौसम लोबिया की खेती के लिए उपयुक्त है।

भूमि एवं तैयारी

लोबिया की खेती मुख्यतः बलुई दोमट तथा हल्की काली दोमट मिट्टी में की जाती है खेत समतल तथा हल्का जल निकास वाला होना चाहिये। पूर्व फसल की कटाई के बाद एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करके प्रत्यके जुताई के उपरान्त पाटा अवश्य लगायें जिससें खेत में नमी बनी रहें एवं मिट्टी भुरभुरी हो जाये।

उन्नतशील प्रजातियां

  1. पूसा ऋतुराज: यह किस्म प्रकाश एवं तापक्रम के प्रति अति संवेदनशील व फलियां 20-25 सेमी0 लम्बी होती है एवं हरी फलियों की उपज लगभग 70-75 कु./है. होती है।
  2. पूसा कोमलः इस किस्म के फलियों की लम्बाई 20-25 सेमी0 तथा हरी फलियों की उपज 70-80 कुं/है होती है।
  3. पूसा फाल्गुनीः यह किस्म शीघ्र पकने वाली छोटी अवधि की प्रजाति है। अच्छी खेती की दशा में हरी फलियों में इसकी उपज क्षमता 50-60 कुं/है जबकि दाना एवं हरे चारे के लिए इसकी उपज क्षमता क्रमश 12 कुं/है एवं 250-300 कुं/है अलग-अलग बुआई करके प्राप्त की जा सकती है।
  4. अर्का गरिमा: इसकी फलियाँ 20-25 से. मी. लम्बी, मोटी, गूदेदार एवं हल्के हरे रंग की होती है। फली का औसत वजन 10-12 ग्राम के बीच होता है। फलियाँ बुआई के 50 दिनों बाद तुड़ाई योग्य हो जाता है। फसल की कुल अवधि लगभग 100 दिन है। इसकी खेती गरमी एवं बर्षा दोंनो मौसमों में कर सकते हैं। इस किस्म की उपज क्षमता 100-120 क्विं प्रति हे. तक है।
  5. काशी शयामलः यह इसकी फलियाँ 28-30 से. मी. लम्बी, गोल एवं हरे रंग की होती है। फली का औसत वजन लगभग 10 है। फलियाँ बुआई के 50 दिनों पश्चात तुड़ाई योग्य हो जाती है। फसल की कुल अवधि 70 दिन है। यह किस्म बर्षा ऋतु में अच्छी पैदावार देती है। इसकी उपज क्षमता 35-40 क्विं प्रति हे. होती है।

बुआई का समयः

गर्मी की फसल के लिए फरवरी - मार्च में एवं बरसाती फसल के लिए जून-जुलाई में बुआई की जानी चाहिए। गर्मी में बुआई समतल जमीन मे कर सकते हैं। वर्षा ऋतु की फसल की बुआई मेड़ों पर 15 से. मी. की उँचाई पर पंक्तियों में करना चाहिए।

बीज दरः

एक हेक्टेयर खेत के लिए किस्म के अनुसार 25 -30 कि. ग्रा. बीज की आवश्यकता पड़ती है।

बीज उपचारः 

बुआई के पूर्व 2.5 ग्राम थीरम दवा से प्रति किग्रा0 बीज को शोधित करने के बाद लोबिया को विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से बीज को उपचारित करना चाहिये।

बुआई की विधि :

दाना एवं हरी फलियों के लिये बुआई पंक्तियों में करनी चाहिये। दानें वाली प्रजाति के लिए 45 सेमी0 तथा फलियों के लिये 30 सेमी0 की दूरी पर करें। पौधों से पोधों की दूरी 20-25 सेमी0 रखें।

उर्वरक की मात्रा :

लोबिया की अच्छी उपज के लिये 30 किग्रा0 नत्रजन, 50 किग्रा फास्फोरस एवं 40 किग्रा0 पोटाश प्रति  हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें। उर्वरक की पूरी मात्रा को बुआई के समय बीज से 3-4 सेमी0 नीचे डालें। भूमि एवं पौधों की आवश्यकतानुसार जिंक सल्फेट का प्रयोग भी किया जा सकता है।

सिंचाई :

बुआई के बाद आवश्यकतानुसार एक हल्की सिंचाई करना अंकुरण के लिए अच्छा रहता है। जायद के मौसम में तापक्रम बढने से प्रति सप्ताह या 10-12 दिन के अंतराल में सिंचाई करनी चाहिये।

निराई-गुड़ाई :

बीज बुआई से फूल आने की अवस्था तक (35-40 दिन) खेतों को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिये। इसके लिये बुआई के लगभग 20 दिन बाद खेत की निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिये। निराई से भूमि में वायुसंचार की वृद्धि एवं पोधों के विकास में सहायक होता है।

रोग प्रबन्धन :

  1. एन्थ्रेकनाजः इस बीमारी से ग्रसित पौधें की फलियों एवं पत्त्यिों के ऊपर काले - पीले रंग से धब्बे पड़ जाते हैं। प्रभवित पत्त्यिाँ सिकुड़ कर मर जाती हैं। वर्षा में इस रोग का अधिक प्रकोप होता है। इस रोग से बचने के लिए स्वस्थ पौधें से बीज संग्रह करना चाहिए एवं बुआई से पहले कार्बेण्डाजिम दवा 2.0 ग्रा. प्रति कि. ग्रा. बीज में मिलाकर बीजों को शोधन कर लेना चाहिए। खड़ी फसल में मैंकोजेब दवा 2.0 ग्रा. प्रति लीटर पानी में मिलाकर 15 दिन के अंतराल पर 2-3 बार छिड़काव करना चाहिए।
  2. तना लांछनः इस रोग से ग्रसित पौधें के तनों में मिट्टी के निकट वाले स्थान से बचाव हेतु स्वस्थ पौधें से बीज संग्रह करना चाहिए एवं बीज को कार्बेण्डाजिम दवा (2.0 ग्राम प्रति कि.ग्रा.) से उपचारित कर लेना चाहिए।
  3. पत्र लांछनः इन रोग से ग्रसित पौधें की पत्तियों पर गोल या कोणाकार धब्बे पड़ जाते हैं जो बाद में पूरी पत्ती की सतह को ढँक लेते हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिए मैंकोजेब दवा (2.0 ग्रा. प्रति लीटर) के घोल का छिड़काव करना चाहिए।
  4. जीवाणु झुलसा: इस रोग से ग्रसित पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे दिखाई पड़ते हैं एवं धब्बों का घेरा हुआ हल्का पीला हो जाता है। रोग की उग्रता में फलियों पर काले धब्बे देखे जा सकते हैं। इसके नियंत्रण के लिए स्ट्रेप्टोसाइक्लीन दवा का 5.0 ग्रा. प्रति दस लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए । बुआई के लिए रोगरहित पौधे से बीज संग्रह करना एक कारगर उपाय है।

कीट नियंत्रणः

  1. माहूँ : यह बहुत छोटे रंग के कीट होते हैं जो मुलायम पत्तियों, शाखाओं, फलों एवं फलों से रस चूसते हैं। जिसके फलस्वरूप पौधे-कमजोर हो जाते हैं तथा उनकी बढ़वार रूक जाती है व प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में कमी आती है । जिससे फलियों की उपज एवं गुणवत्ता दोनों में कमी हो जाती है। इसके नियंत्रण हेतु मिथाइल ओ डिमेटान 25 ई0 सी0 या डाईमेथोएट 30 ई0 सी0 की 1.25 ली0 मात्रा 600-800 ली0 पानी में घोल कर प्रति है0 की दर से छिड़काव करें। इसके अतिरिक्त बाजार में नीम आधारित कीटनाशकों  का प्रयोग  भी किसान कर सकते है।
  2. फली छेदकः इस कीट के हरे रंग के पिल्लू फलियों में घुसकर कच्चे बीजों को खा जाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 0.5 मि.ली. फ्लुबेण्डमाइड (फेम) या रिनोक्सीपायर (कोराजेन) प्रति लीटर पानी में धोलकर छिड़काव करें। यदि क्षति की मात्रा एक फली प्रति पुष्प वृन्त से ज्यादा हो तो पहला छिड़काव फूलों की कली आने के समय एवं दूसरा छिड़काव फली बढ़ने से समय करना चाहिए। छिड़काव के बाद 7-8 दिन तक फली खाने के लिए नहीं तोड़ती चाहिए ।

पर्यावरण एवं स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कीट नियंत्रण हेतु खेत में नीम की खली (10 क्विं प्रति हे.) का प्रयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त नीम के बीजो का सत्त या 40 ग्राम नीम के बीज का चूर्ण रात भर पानी में भिगोकर छान लें एवं 1 ली. पानी में मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है।

कटाई:

प्रजातियों के अनुसार बुआई के 45-50 दिन बाद फलियां आ जाती हैं । लोबिया की सभी फलियाँ  एक साथ नही पकती है, पकी हुई फलियों की समय-समय पर तुड़ाई कर लेनी चाहिये। फली को अच्छी तरह सुखा लेने के बाद पीटकर अलग कर लेते है। सब्जी हेतु मुलायम हरी फली की तुड़ाई समय-समय पर करते रहते है।

 


 Authors:

आशीष कुमार गुप्ता,  ऋषिराज, बिनोद कुमार एवं परमानन्द परमहंस

भा0 कृ0 अनु0 प0- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान,

 क्षेत्रिय केन्द्र पूसा समस्तीपुर बिहार-848 125

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