Watermelon and Muskrmelon cultivation for more income in less time    

तरबूज (वैज्ञानिक नाम - सिटीलुस लैनाटस ) और खरबूजा (वैज्ञानिक नाम - कुकुमिस मेलो ), जायद मौसम की प्रमुख फसल हैं। इसकी खेती मैदानों से लेकर नदियों के पेटे में सफलतापूर्वक की जा सकती हैं। ये कम समय, कम खाद और कम पानी में उगाई जा सकने वाली फसलें हैं। उगने में सरल, बाजार तक ले जाने में आसानी और अच्छे बाजार भाव से इसकी लोकप्रियता बढती जा रही हैं

Watermelon and Muskmelon cultivationइसके कच्चे फलो का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता हैं।  इनके पके हुऐ फल अत्यंंत लोकप्रि‍य,  मीठे, शीतल, मृदुल वि‍‍‍‍‍‍रेचक एवं प्यास को शांत करने वाले होते हैं। 

तरबूज एक महत्वपूर्ण ककड़ी सब्जी है। यह भारत के विभिन्न भागों में तरमुज कलिंदा और कालिन्दी के रूप में जाना जाता है । हालांकि तरबूज व खरबूजा उद्यान भूमि में विकसित किया जाता है परन्‍तू छत्तीसगढ़ में  विभिन्न नदियों में जब गर्मियों के दि‍नों में जल नही रहता है तब वंहा पर आसानी से  इसकी खेती की जा सकती है।

यह उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश की एक प्रमुख नदी बिस्तरों (रि‍वरबैैैड) की फसल है। एक उत्कृष्ट मिठा फल है। इसके फल में  92 % पानी,  0.2 प्रोटीन, 0.3 % खनिज एक 100 ग्राम  खाद्य शरीर में 70 % कार्बोहाइड्रेट होते हैं।

चित्र - तरबूज की खेती 

तरबूज व खरबूजे की खेती किसानो की आय बढाने में कैसे सहायक है 

  • रेतिली भूमि में जिनका उपयोग अन्‍य फसल लगाने हेतु नहीं किया जा सकता ऐसी भूमि में तरबूज एवं खरबुज आसानी से उगाये जा सकते है जिससे अनउपजाऊ भूमि से भी किसान आय प्राप्त कर सकते है
  • इसमें नब्बे प्रतिशत जल होने के कारण गर्मी के दिनों में अत्यधिक मांग रहती है। ऐसे मांग के समय में यह कम दिनों में तैयार हो जाता है जिससे किसान बाजार में अधिक उत्पादन कर कम समय में अधिक लाभ कमा सकता है।
  • इसमें कम खाद की आवाश्क्यता होती है जिससे अन्य फसल की तुलना में लगने वाले खाद का खर्चा भी इसमें कम लगता है
  • इसको सामान्य बाजार में भी बेचा जा सकता है
  • फसल पद्धति में उगाये जाने के कारण साल भर किसान की आय स्थिर रहती है

भूमि का चुनाव व तैयारी

तरबूज और खरबूजे के लिए उचित जल निकासी वाली बलुई दोमट मिटटी सर्वोतम हैं। मृदा का पी. एच. मान 6 से 7 तक होना चाहिए। अधिकतर नदियों के कछार में इन फसलों की खेती की जा सकती हैं। और जल का भराव नही होना चाहिए

सामान्यतः तरबूज और खरबूज को गड्डो में लगाया जाता हैं। गड्ढे बनाने पूर्व खेत में दो बार हल एवं दो बार बखर या डिस्क हेरो चलाकर भूमि को अच्छी तरह भुरभुरी बना लेना चाहिए।जिससे की बीज का अंकुरण अच्छे से हो सके।

तरबूज और खरबूजे की उन्नत प्रजातियां

तरबूज और खरबूज फसल की अधिक पैदावार लेने के लिए उनत जातियों को ही उगाना चाहिए।

तरबूज  की उन्नत प्रजातियां विशेषता
सुगर बेबी इसके फल 2-3 किलो वजन के मिठे तथा बीज छोटे व कत्थई रंग के होते हैं।
अर्का ज्योति फल गोल, हरी धरी युक्त, मिठे व् 4-6  किलो वजन के होते हैं।
दुर्गापुर मीठा फल 6-8 किलो वजनी, हराधारी युक्त होता हैं। इसका गुदा रवेदार स्वादिष्ट होता हैं।
अर्का मानिक यह किस्म एन्थ्रेक्नोज, बुकनी रोग तथा पौध गलन रोग की निरोधक हैं।
खरबूज  
पूसा शरबती यह शीघ्र पकने वाली किस्म हैं। फल गोल व मिठास मध्यम होती हैं।
पूसा मधुरस फल गहरी हरी धारीदार एवं पीला हरा, छिलका युक्त होता हैं।
हरा मधु फल बड़े, मिठे, हरी धारीदार पिले रंग के होते हैं।
दुर्गापुर मधु इसका फल बहुत मीठा एवं हल्का पीला रंग का होता हैं।
पूसा रसराज इस किस्म का फल चिकना, धारीदार रहित होता हैं। इसका गुदा मीठा व रसदार होता हैं। इसकी उपज 200-250 क्विंटल/हेक्टेयर होता हैं।

तरबूज व खरबूजा आधारि‍त फसल चक्र

भिंडी- मटर- तरबूज  जे.बी. 64 बेंगन - तरबूज
बेंगन- मटर- तरबूज  मिर्च- तरबूज
टमाटर-फ्रेंचबीन- तरबूज सोयाबीन- हरी प्याज- तरबूज


तरबूज व खरबूजे का बुआई पूर्व बीजोपचार

बीजो को बोने से पहले थायरम 2.3 ग्राम/किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।  जिससे की फफूंद से होने वाले रोगों से बचाव किया जा सके। बीज को 24-36 घंटे तक पानी में भिगोकर रखने के बाद बुवाई करने से अच्छा अंकुरण होता हैं एवं फसल 7-10 दिन पहले आ जाती हैं।

तरबूज व खरबूजे का बोने का समय व बीज दर

तरबूज और खरबूज को दिसंबर से मार्च तक बोया जा सकता हैं किन्तु मध्य फरवरी का समय सर्वोत्तम रहता हैं। उत्तरी पश्चिमी क्षेत्रो में वर्षा ऋतू में मतीरा किस्म की फसल ली जा सकती हैं। बीजदर तरबूज के लिए 6-8 किग्रा तथा खरबूज के लिए 4-6 किग्रा बीज की मात्रा एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए  आवश्यक होती हैं।

तरबूज व खरबूजे बोने की विधि

निम्न लिखित विधिया हैं तरबूज और खरबूज को लगाने की -

उथला गड्डा विधि-

इस विधि में 60 सेमी. व्यास के 45 सेमी. गहरे एक दूसरे से 1.5-2.5  मीटर की दुरी पर गड्डे खोदते हैं। इन्हे एक सप्ताह तक खुला रखने के बाद खाद एवं उर्वरक मिलाकर भर देते हैं। इसके बाद वृहताकार थाला बनाकर 2-2.4  सेमी. गहरे 3-4  बीज प्रती थाला बोकर महीन मृदा या गोबर की खाद से ढक देते हैं। अंकुरण के बाद प्रति थाल 2 पौधे छोड़कर शेष उखाड़ देते हैं।

गहरा गड्ढा विधि-

यह विधि नदी के किनारो पर अपनाई जाती हैं। इसमें 60.75 सेमी. व्यास के 1.15 मीटर की दुरी पर गड्डे बनाये जाते हैं। इसमें सतह से 30-40 सेमी. की गहराई तक मृदा, खाद एवं उरवर्क का मिश्रण भर दिया जाता हैं। शेष क्रिया उथला गड्ढा विधि अनुसार ही करते हैं। इस विधि में 2 मीटर चैड़ी एवं जमीन से उठी हुई पट्टियां बनाकर उसके किनारे पर 1.15 मीटर की दुरी पर बीज बोते हैं।

खाद एवं उर्वरक

तरबूज और खरबूज के लिए 250-300 गोबर की खाद, कम्पोस्ट, 60-80 किलो नत्रजन, 50 किलो एवं फॉस्फोरस एवं 50  किलो पोटाश  1 हेक्टेयर के लिए आवशयकता होती हैं। गोबर की खाद, कम्पोस्ट, पोटाश स्फुर की सम्पूर्ण एवं नत्रजन की 13 किलो मात्रा बोने के पहले देते हैं।

तरबूज व खरबूजे की सिंचाई

ग्रीष्म ऋतू की फसल होने के कारण एवं बलुई दोमट मृदा में उगाई जाने के लिए सिचाई की कम अंतराल एवं आवश्यकता होती हैं। नदी के किनारे उगाई गई फसल को पोधो के स्थापित होने तक ही सिचाई की आवशयकता होती हैं। अन्य स्थानों पर 3-4 दिन में सिचाई करनी चाहिए।

निंदा खरपतवार नियंत्रण

जब पौधे छोटे रहे उस समय तक दो बार अच्छी तरह गुड़ाई कर खेत के पुरे खरपतवार निकाल देने चाहिए। बेले बढ़ने पर खरपतवारो की वृद्धि रुक जाती हैं। निंदा नियंत्रण के लिए एलाक्लोर 50 इसी 2 लीटर सक्रिय तत्व 1 हेक्टेयर या ब्यूटाक्लोर 50 इसी 2 सक्रीय तत्व प्रति हेक्टेयर दर से बोनी के बाद एवं अंकुरण पूर्व छिड़काव कर मृदा में मिला दे छिड़काव हेतु 500 लीटर पानी एवं फ्लेट नोजल का उपयोग करे।

खरबूजे व तरबूज मे रोग नि‍यंत्रण

किट नुकसान रोकथाम
कद्दू का लाल कीड़ा इसकी इल्लिया जड़ो को नुकसान पहुँचती है। बीटलध्श्रंग पत्तियों को खाकर छेद बना देते है।

कर्बरील 50 डस्ट 20 किलो 1 हेक्टेयर की दर से भुरकाव करे।

कर्बरील 50 घुलनशील चूर्ण का 1200 – 1500 मी. ली. प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करे

फल की मक्खी इसकी इल्ली फलो छिद्र बनाकर खाती हैं। जिससे फल खाने योग्य नहीं रह जाते हैं।

मेलाथियान 50 ईसी या एण्डोसल्फान 35 इसी 1000 मि. ली. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करे।

जहरीला प्रपंच जि‍समे 10 लीटर पानी 1 किलो गुड़, 50 सी. सी. सिरका तथा तथा 20 मि. ली. मेलाथियान 50 ईसी मिला होता हैं, को चैड़े मुँह वाले पात्रों में रखे।

इसमें आकर्षित होकर मक्‍खी गिरेगी व् मरी हुई मक्खियों को निकाल कर मिटटी में दबा दे। फल मक्खी से ग्रसित फलो को नष्ट कर देना चाहिए।

रोग  नुकसान  रोकथाम
बुकनी रोग (पावडरी  मिल्ड्यू) इसमें पत्तियों पर सफेद पाउडर जमा हो जाता हैं। जिससे प्रकाश संश्लेषण में बाधा आती हैं व पैदावार कम हो जाती हैं। इसकी रोगथाम के लिए डायनोकेप 0.05% घुलनशील गंधक 0.03 %  अथवा कार्बेन्डाजिम 0.1% का 2.3 बार 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें।
डाउनी मिल्ड्यू इसमें पत्तियों की ऊपरी सतह पर पिले या हलके लाल-भूरे धब्बे पड़ जाते हैं तथा निचली सतह पर गुलाबी चूर्ण जम जाता हैं। इसके नियंत्रण के लिए जाइनेब या मैंकोजेब की 0.03% सांद्रण वाली दवा का 7-10 दिन के अंतराल पर आवशयकता अनुसार 3-4 बार  छिड़काव करें।
एन्थ्रेक्नोज इसमें पत्तियों पर कोणीय या गोल भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जिनके एक दूसरे से मिलने पर झुलसने का लक्षण प्रकट होता हैं। फल पर भी भूरे काले धब्बे बनते हैं यह बीमारी अधिक आद्रता वाले वातावरण में अधिक पनपती हैं।

इसके नियंत्रण के लिए बीजो को कार्बेन्डाजिम 2.5 ग्राम दवा प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करके बोये।

बेलो पर 0.02 मैंकोजेब या कार्बेन्डाजिम 0.1% दवा का छिड़काव करे।

फ्यूजेरियम विल्ट यह रोग पोधो को अंकुरण से लेकर किसी भी अवस्था पर प्रभावित कर सकता हैं। पौध अवस्था में आद्रगलन होकर पोध मर जाती हैं। परिपक्व अवस्था में पत्ती पर शीर्ष जलन के लक्षण आते हैं। बाद में पौधे मुरझाने लगते हैं। तथा अंततः उसकी मृत्यु हो जाती हैं।

बीजो को 2.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम दवा से प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोये इस बीमारी से संक्रमित जमीन में 3-4 वर्ष तक  कोई भी फसल न ले।

मृदा में केप्टान 0.3% दवा को छिड़ककर मिला दे।

 

फलों की तुड़ाई

फलों की सही अवस्था पर तुड़ाई करना बहुत महत्वपूर्ण हैं। फलों के पकने की पहचान निम्नलिखित तरीको से करते हैं।

तरबूज की तुड़ाई

फलो को अंगुलियों से धप- धप की आवाज निकले तथा दाल ( डंडरेल ) सुख जावे फल का पेंदा जो भूमि में रहता हैं यदि सफेद से पीला हो जाये तो फल पका हुआ समझना चाहिए। दबाने पर यदि फल दब जाता हैं एवं हाथो से ज्यादा ताकत नहीं लगानी पड़ती हैं तो फल पका हुआ समझना चाहिए।

प्रत्येक किस्म के फल पकने का समय अलग- अलग रहता हैं साधारणतः फल लगने से पकने तक 30-35  दिन लगते हैं। तुड़ाई  के समय फल के करीब 4.5 से. मी. डंठल लगा रहने पर फल में सड़न व्याधि नहीं आती हैं।

खरबूजे की तुड़ाई

परिपक्वता के समय फल के आधार भाग में पुष्प दंड के निकट एक गोलाकार दरार दिखाई देने लगती हैं। पूर्ण पकने पर फल बेल से आसानी से अलग हो जाता हैं।

पुष्प वृंत के आधार  का रंग हरे से मॉम के रंग का होने लगता हैं। फलो से एक विशेष प्रकार की गंध आने लगती हैं। फलो के छिलके का रंग हरा से पीला होने लगता हैं तथा फल पकने पर नरम हो जाता हैं

खरबूजे व तरबूज की उपज

ऊपर दिए गए तरीके अनुसार खेती करने से तरबूज की 400 से 600 क्विंटल एवं खरबूज की 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती हैं। पौधों पर 2 एवं 4 पत्तियों की अवस्था पर इथ्रेल के 250 पीपीएम सांद्रण वाले घोल के छिड़काव से अधिक उपज प्राप्त होती है।


 Autjors:

इन्द्रपाल सिंह पैकरा, राजेंद्र लाकपाले, एवं लव कुमार

इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)

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