Water conservation and management techniques in fruits cultivation 

खेती में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता धीरे - धीरे कम होती जा रही है, इसलिए यह अत्यावश्यक हो गया है की सिंचाई के लिए जल का उपयोग बहुत ही सोच समझकर एवं बुधिमतापुर्वक किया जाए । अभी भी किसान सिंचाई की पुरानी विधियां ही उपयोग में ला रहे है जिनकी सिंचाई जल प्रयोग की दक्षता बहुत कम होती है । इसलिए हमें सिंचाई की नयी तकनीको को अपनाना चाहिए जिसमें जल प्रयोग की दक्षता ज्यादा हो तथा हम जल संरक्षण की तारफ कदम बढा  सकें। जल संरक्षण के साथ साथ हमें उसके प्रबंधन पर भी ध्यान देना चाहिए क्योंकि जल प्रकाश- संश्लेशन एवं पौधों के विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है । इसकी कमी फलों के उत्पादन  और हमारे मुनाफे को भी कम कर देगी 

फल फसल में सिचाई का उचित समय

सिंचाई की आवश्यकता फलों के रोपण विधि पर निर्भर करती है I खेतो में सीधे बीज को डालकर अथवा नर्सरी में तैयार  पौधों को पुन: खेतो में रोपाई की जाती है Iबीजो के प्रस्फुटन के समय खेतो की मिट्टी में उचित नमी होनी चाहिए अन्यथा बीजों के विकास बाधित हो जाएगा I जब हम पौधों को नर्सरी से लाकर खेतो में लगाते है उससमय खेतों में पानी का जमाव होना चाहिए जिससे पौधे जल्द ही निकटतम वातावरण में ढल जायेंगे और पौधों का विकाश बाधित नही होगा I फलों के विकास के समय पानी की सबसे अधिक आवश्यकता होती है तथा फलों का छोटा होना उसका असमय गिर जाना पानी की कमी को दर्शाता है I

जलसंरक्षण/प्रबंधन

पानी का समोचित उपयोग करने के लिए फव्वारा सिंचाई एवं टपकन सिंचाई पध्धति का इस्तेमाल किया जाना चाहिए I केला ,पपीता तथा आम में टपकन सिंचाई की तकनीक इस्तेम्मल में लाई जा सकती है खासकर केला में इसके इस्तेमाल से उत्पादन में काफी बढ़ोतरी आती है Iवर्त्तमान समय में इसकी उपयोगिता को देखते हुए केंद्र व राज्य सरकार द्वारा नवीनतम पध्धतियों को अपनाने के लिए विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत इनके खरीद पर अनुदान भी दिया जाता है I देश में नवीनतम सिंचाई पध्धति अपनी पहचान बना रही है लेकिन सभी कृषक इस पध्धति का सही उपयोग नही कर प् रहे है जिसका कारण संचालन  व रख रखाव के बारे में आंशिक या आधा –अधूरी जानकारी का होना है Iइन परिस्थितियों में यह बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है की नवीनतम पद्धतियों के संचालन व रख रखाव की सम्पूर्ण जानकारी कृषक समुदाय तक पहुचाई जाए

संचालन के समय ध्यान देने योग्य बातें

  • यदि खेत ऊँचा- निचा है तो बिना समतल किए बिना ही आप खेतों की सिंचाई कर सकते है
  • मोटर व इंजन को चालू करने से पहले वाल्व बंद रखें
  • जोड़ों में पानी का रिसाव नहीं हो रहा है इसकी जाँच कर ले
  • हवा की गति कम हो , टपकन सिंचाई पध्धति पे हवा की गति का असर नही होता है
  • खेत में पाइपों को एक जगह से दूसरी जगह पर लगाने के लिए जाने से पहले मोटे बांध कर दे व पाइपों में से पानी निकालने दे
  • सिंचाई पूर्ण होने के बाद समेटने के लिए अंतिम पाइप की तरफ से सुरु करें न की मोटर की तरफ से

संचालन की समस्याएं एवं समाधान

समस्या

 

समाधान

जोड़ों में पानी का रिसाव

देखें की जोड़ों के अन्दर जहाँ रबड़ की रिंग (सिल) लगती है वहां धुल- मिट्टी तो नहीं लग गए है  यदि है तो साफ करके जोड़ों को वापस फिट करें

यदि कही टी बैंड या रेड्यूसर लगे है तो देखें की इसकी फिटिंग सही हो

 

नोज़ल का बंद हो जाना

फूट वाल्व के आगे कचरा रोकने के लिए छलनी का प्रयोग करे

चालू करते समय अंतिम पाइप पर लगे ढक्कन को खोलकर थोरा पानी बहने दे फिर मोटर बंद करके वापस दक्कन लगाकर सिंचाई चल्लो करे ऐसा करने से पाइप में कोई कचरा है बाहर निकल जाएगा

 

कम दवाब

हो सके तो पंप की गति बढ़ाएं (यदि इंजन लगा हो)

मुख्य व द्वितीयक पाइप की लम्बाई कम का दे

यदि उपरोक्त संभव न हो तो बूस्टर पंप का प्रयोग करे

 

फव्वारे का नहीं घूमना

नोजल कचरे से बंद हो गया हो तो साफ कर दे

फव्वारे के बियरिंग की जाँच करे यह बिलकुल हल्का होना चाहिए

बियरिंग के निचे लगे वॉशर की जाँच करे , घिसा हुआ हो तो बदल दे

इसकी चम्मच जो पानी की धार से चलती है उसे जांचे यदि टेढ़ी है तो सीधी कर दे

तेल या ग्रीस का प्रयोग न करे

सुरक्षित रख रखाव

  • जोड़ने वाले कपलिंग में जहाँ रबड़ की रिंग लगती है उसे समय समय पर साफ करते रहे
  • पाइपो को गीली कंक्रीट पर नही रखे
  • पिपेजब उपयोग में नही आ आरहे हो तो तब उन्हें इस तरह से रखे की एक सिरा दुसरे से ऊँचा रहे (यदि उन्हें खुले में रखा गया है तो) या फिर आप उन्हें ढकें बाड़े में रखे
  • कपलर व फिटिंग में से रबड़ की रिंगो को निकलकर ठन्डे व अंधरे स्थान पर रखें

 

इन पध्ध्तियों से सिंचाई करने से खेतो की मृदा कम बंधती है ,एकरूप सिंचाई होती है , फसल को कम नुकशान पहुँचता है व मृदा की जल धारण क्षमता का बेहतर उपयोग होता है अत: पानी की बचत होती है एवं उत्पादन बढ़ता है I

 


Authors:

विकाश चन्द्र वर्मा

कृषि अभियंत्रण विभाग

वीर कुंवर सिंह कृषि महाविद्यालय, डुमरॉव

बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौ रभागलपुर

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