Management of Crop residues in rice-wheat crop system by adopting conservation agriculture

फसल अवशेष बहुत ही महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन हैं। ये न केवल मृदा कार्बनिक पदार्थ का महत्वपूर्ण स्रोत हैं, अपितु मृदा के जैविक, भौतिक एवं रासायनिक गुणों में वृद्धि भी करते हैं।  पादप द्वारा मृदा से अवशोषित 25 प्रतिशत नत्रजन व फास्फोरस, 50 प्रतिशत गन्धक एवं 75 प्रतिशत पोटाश जड़, तना व पत्ती में संग्रहित रहते है। अतः फसल अवशेष पादप पोषक तत्वों का भण्डार है। यदि इन फसल अवशेषो को पुनः उसी खेत में डाल दिया जाये तो मृदा की उर्वरकता में वृद्धि होगी और फसल उत्पादन लागत में भी कमी आयेगी। 

भारत में प्रतिवर्ष 600 से 700 मिलियन टन फसल अवशेष उत्पादित होता है जिसका एक-चौथाई भाग इन्हीं दोनों फसलों से प्राप्त होता है, परन्तु किसानों को इन फसल अवशेषों का महत्व ज्ञात न होने के कारण वे इनका उचित तरीके से उपयोग नहीं करते। 

सारणी 1. धान एवमं गेहूं के फसल अवशेषो की भारत में उपलब्धता एवमं उनमें पोषक तत्वों का स्तर (मिलियन टन) 

राज्य  

फसल अवशेष उपलब्धता

पुनर्चक्रण के लिए फसल अवशेष उपलब्धता

पोषक तत्व (नाइट्रोजन+फॉस्फोरस +पोटाश) सामर्थ्य

धान   

 गेहूं  

कुल

कुल

सापेक्ष  पुनर्चक्रण के लिए उपलब्ध

रसायनिक उर्वरक  प्रतिस्थापन मान

 पंजाब

10.0

18.2

28.2

9.40

0.462

0.154

0.077

हरियाणा

2.5

9.7

12.2

4.07

0.194

0.065

0.032

उत्तरप्रदेश    

14.0

27.5

41.5

13.83

0.677

0.226

0.113

बिहार 

9.6

5.3

14.9

4.97

0.257

0.086

0.043

पश्चिम बंगाल      

16.7

0.1

16.8

5.60

0.308

0.103

0.051

कुल

52.8

60.8

113.6

37.87

1.898

0.634

0.316

(सारकर,1999)

फसल अवशेष प्रबंधन विधियाँ 

कम्पोस्ट

मृदा से निष्कासन

अवशेष दहन

मृदा में समावेश

अवशेष मल्च

1. जैव वर्धक

2. फॉस्फोरस  घुलनकारी सूक्ष्म जीव

3. नाइट्रोजन स्तरीकरण जीवाणु

4 .वर्मी कम्पोस्टिंग 

1. अत्यधिक महंगा 

2. अत्यधिक श्रमिक आवश्यकता

3. पादप पोषक तत्वों की हानि

 

1. नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, सल्फर, केल्सियम, एवमं मैग्नीसियम का ह्रास

2. पर्यावरणीय समस्याएं

 

1. पादप पोषक तत्व उपलब्धता को घटाना

2.प्रारम्भिक अवस्था में फसल वृद्धि रोकना

2.अतिरिक्त रासायनिक उर्वरकों   की आवश्यकता

1.  मृदा  अपरदन को कम करना

2.  मृदा की भौतिक अवस्था को सुधारना 

 

(ऐ. के. सिंह, 2013)

मृदा से पोषक तत्व अवशोषण एवं रासायनिक उर्वरकों द्वारा पोषक तत्व आपूर्ति में काफी असन्तुलन होने के कारण मृदा की उर्वरा शक्ति दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही हैं। धान- गेहूँ फसल प्रणाली 10 टन/हैक्टेयर जैवभार उत्पादन हेतु लगभग 500 किलोग्राम पोषक तत्वों को मृदा से अवशोषित करती हैं। अतः फसल अवशेषो का मल्च के रूप में प्रबन्धन की अति आवश्यकता हैं।

मृदा से पोषक तत्वों का ह्रास (मिलियन टन)        

मृदा में अनुमानित पोषक तत्व सन्तुलन

वर्ष

2000

2020

रासायनिक उर्वरकों  का उपयोग

18

29

फसल द्वारा पोषक तत्व अवशोषण

28

37

शेष

˗10

˗8

कार्बनिक पदार्थों  से पोषक तत्वों की अनुमानित उपलब्धता

 5

 7

(टंडन, 2004)

फसल अवशेष दहनः

विगत कुछ वर्षों में कृषि क्षेत्र में कई उन्नत तकनीकियां विकसित  की गयी हैं, उन्ही में से एक हैं- मशीनीकरण, जिसका उद्देश्य श्रमिक अभाव की समस्या को दूर करना व समय की बचत करना था। वर्तमान में पंजाब तथा हरियाणा राज्यो में कम्बाईन मशीन द्वारा धान की कटाई 75 प्रतिशत धान के खेतों में की जाती है जिससे धान के फसल अवशेष खेत में बिखर जाते है ओर और किसान उन्हें खेत में ही जला देते हैं। प्रतिवर्ष अक्टूबर व नवम्बर मास में लगभग 3 सप्ताह तक फसल अवषेषों का व्यापक स्तर पर दहन किया जाता है।

फसल अवशेष दहन के दुष्परिणाम:-

  1. मृदा संघटन का महत्वपूर्ण घटक मृदा कार्बनिक पदार्थ है। फसल अवशेष दहन से ये अमूल्य पदार्थ नष्ट होता जा रहा है, जिसके कारण मृदा स्वास्थ्य व मृदा उत्पादकता खतरे में है।
  2. फसल दहन के परिणामस्वरूप बढे़ हुये तापमान से मृदा के लाभदायक सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं जो की मृदा जैव विविधता के लिये एक गम्भीर चुनौती है।
  3. एक टन धान अवशेष के दहन से 5.5 किलोग्राम नत्रजन, 2.3 किलोग्राम फॉस्फोरस, 25 किलोग्राम पोटाश, 1.2 किलोग्राम गन्धक एवं 400 किलोग्राम कार्बनिक पदार्थ का हृास होता है। फलस्वरूप मृदा की उर्वरता कम हो जाती हैं
  4. फसल अवशेष जलने पर भारी मात्रा में मीथेन, कार्बन डाई ऑक्साईड, सल्फर डाई ऑक्साईड इत्यादि विषैली गैसों के उत्सर्जन से वायु की गुणवत्ता खराब होती है तथा पर्यावरण दूषित हो जाता है। परिणामस्वरूप वैष्विक तापमान में वृद्धि एवं मौसम परिवर्तन होता है।
  5. विषैली वायु में श्वसन से अस्थमा व फैफडों मे कैंसर जैसी बिमारियां फैलती है।

अतः इस उभरती फसल दहन समस्या से मुक्ति पाने हेतु फसल अवशेषों के उपयुक्त प्रबंधन की महती आवश्यकता है। अतः इस हेतु संरक्षित खेती का महत्व समझना होगा।

संरक्षित खेती:-

संरक्षित खेती के अन्तर्गत खेत तैयार करने हेतु जुताई नहीं करनी पडती है तथा फसल अवशेषों को उसी खेत में मल्च के रूप में फैला देते हैं। और अवशेषों में टर्बो हैप्पीसीडर चलाकर आगामी फसल की बुवाई की जाती है। अतः फसल अवशेषों के दहन की आवश्यकता नहीं रहती तथा किसानों के समय व धन दोनों की बचत होती ह

आजकल पूरे विश्व में संरक्षण खेती पर बड़ा जोर दिया जा रहा है।  संरक्षण खेती करने वाले दशों में अमेरिका, आस्द्रेलिया, कनाडा, ब्राजील और अर्जेन्टीना प्रमुख हैं।  इस विधि का मुख्य उद्देश्य यह है कि खेत की मिट्टी को न्यूनतम हिलाया जाए, उसकी जुताई न के बराबर की जाए, भारी मशीनों का कम से कम प्रयोग किया जाए व मृदा सतह को हर समय फसल अवषेशों या दूसरे किसी वनस्पति आवरणों से ढ़ककर रखा जाए। इससे फसलों की पैदावार बढ़ने के साथ-साथ संसाधनों जैसे मिट्टी, पानी, पोषक तत्व, फसल उत्पाद और वातावरण की गुणवत्ता भी बढ़ी है जो कि कृषि की लगातार अच्छी हालत के लिए बहुत जरूरी है।

फसल अवशेष प्रबंधन एवं सरंक्षित खेती के लाभ:-

  1. धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई के लिये भारी मात्रा में जुताई करने से गेहूं की बुवाई में 15 से 20 दिन की देरी हो जाती है जबकि शून्य जुताई द्वारा किसान गेहूं की अगेती जुताई कर सकता है जिससे दाना भरने की अवस्था में उच्च तापमान से होने वाले उत्पादन नुकसान को कम कर सकते है इसके अतिरिक्त बुवाई से पहले पलाव करने की भी जरूरत नहीं होती है।
  2. मल्च मृदा कणों को जल व वायु के सीधे सम्पर्क में आने से रोककर, वर्षा जल के अन्तःशोषण को बढ़ाकर एवं जल बहाव को कम करके मृदा क्षरण को 50 प्रतिशत तक कम कर देती है। जिससे उर्वरक मृदा एवं पोषक तत्वों का खेत से हृास नहीं होता तथा मृदा उर्वरकता बनी रहती है।
  3. मल्च द्वारा तापमान संतुलन (सर्दी में बढाकर व गर्मी में कम करके) से बीज अंकुरण, पादप व जड़ की वृद्धि व दलहनी फसलों में नत्रजन स्थिरीकरण को बढ़ावा मिलता है तथा जायद की फसल को उच्च तापमान के बुरे प्रभाव से बचाती है।
  4. मल्च, मृदा जल अंतःशोषण व जलधारण क्षमता को बढ़ाकर तथा वाष्पोत्सर्जन को कम करके मृदा जल की हानी को कम करती है। फलस्वरूप जल की मांग घटती है व जल उपयोग क्षमता बढ़ती है। सुखाग्रस्त क्षेत्रों में मल्च से नमी रहने के कारण उत्पादन बढ़ जाता है।
  5. इसके साथ ही मल्च के प्रयोग से मृदा की भौतिक व रासायनिक दशा में सुधार होने से मृदा जीवों (जीवाणु, कवक व केचुऐं) की संख्या व गतिविधि में वृद्धि होती है।
  6. इसके अतिरिक्त मल्च द्वारा मृदा की क्षारीयता, लवणता व अम्लता भी समय के साथ कम होती जाती है।

संरक्षण खेती अपनाकर ना केवल फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन किया जा सकता है, बल्कि उनको जलने से जो पर्यावरण को नुकसान होता है उससे भी बचा जा सकता है। नई मशीनों के आने से फसल अवशेषों के आवरण में भी फसलों की बुवाई की जा सकती है। फसल अवशेषो के दहन के बजाय इनका मल्च के रूप में प्रयोग करने से न केवल मृदा का भौतिक, रासायनिक व जैविक स्वास्थ्य अच्छा होगा अपितु इससे फसल उत्पादन व जैव विविधता भी बढ़ेगी तथा मृदा दीर्घकालीन फसल उत्पादन की स्थिति में बनी रहेगी। भविष्य में इसी तरह की खेती को अपनाना होगा जिससे हमारी भावी पीढ़ियां अच्छे से अपना जीवन निर्वाह कर सकें। धान – गेहूं फसल प्रणाली में किसान भाई इस प्रोद्योगिकी को अपनाकर अवशेषों का सही उपयोग कर सकते है साथ ही अपनी आय में भी वृद्धि कर सकते है।


 Authors

शांति देवी बम्बोरिया1, सुमित्रा देवी बम्बोरिया2,  जितेंद्र सिंह बम्बोरिया3 आर एस बाना4

1, 4सस्य विज्ञानं संभाग, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली-110 012

2महाराणा प्रताप राजस्थान कृषि विश्विध्यालय, उदयपुर, राजस्थान-313 001

3श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्विद्यालय, जोबनेर, जयपुर-303 329

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