जैव जल निकासी तकनीक - जलाक्रांत क्षेत्रों के लिए पर्यावरण अनुकूल समाधान - Krishisewa

Bio-drainage is an eco-friendly solution for waterlogged areas

भारत में कुल जलाक्रांत भूमि लगभग 7 मिलियन हेक्टेयर है।  परंपरागत जल निकासी प्रणाली या ड्रेनेज को सतहजल तथा धरातल जल निकासी पद्धति के नाम से भी जाना जाता है। इसका तात्पर्य है की आवश्यकता से ज्यादा या अतिरिक्त पानी को मिट्टी की सतह और मिट्टी की प्रोफाइल से हटाना है।

जल निकास प्रणाली को शुरुआत में बनाने के लिए अधिक पूंजी निवेश, संचालन और रखरखाव की आवश्यकता होती है। इस समस्या को सुलझाने के लिए जैविक जल निकासी या जैव जल निकासी तकनीक को एक संभावित विकल्प केरूप मे प्रयोग कि‍या जा सकता है।

दुनिया का लगभग एक तिहाई सिंचित क्षेत्र में जलाक्रांत या जलभराव की समस्या है। जलाक्रांत क्षेत्र में बढ़ौतरी के मुख्य कारण नहरों से रिसाव, खारे भूजल के निकास में कमी, नहर के पानी से सतही सिंचाई और प्राकृतिक जल निकासी की अनुपस्थिति हैं। जलभराव, पर्यावरण प्रदुषण जैसे पानी और मृदा में नमक बढ़ाने जैसी समस्या भी उत्पन करती है।

जैव जल निकासी तकनीक के अन्तर्गत पौधों के माध्यम से मिट्टी के पानी की ऊर्ध्वाधर जल निकासी करते है। इस तकनीक के तहत जलाक्रांत क्षेत्र से पानी को पौधों के वाष्पन-उत्सर्जन प्रतिक्रिया के द्वारा जल निकासी करते है। यह तकनीक अन्य जल निकास तकनीक की तुलना में कम पूंजी निवेशी है साथ ही साथ यह बड़े क्षेत्र की जल निकाशी के लिए भी उपर्युक्त है।

इसका तकनीक का उपयोग तब किया जाता है जब पानी की सतह जमीन की सतह से 2-3 मीटर नीचे होती है और यह फसल उपज को प्रभावित कर रही होती है।

युकलिप्टुस, ओक (कैशुरिना ग्लाउका), अर्जुन (अर्जुना टर्मिनलिअ), करंज (पोंगामिया पिनाटा), पॉपुलर, बबुल और जामुन के पौधे की प्रजातियाँ जैव जल निकासी तकनीक के लिए उपर्युक्त है।

परंपरागत जल निकासी की तुलना में जैव जल निकासी की उपयोगिता

  • जैव जल निकासी बागानों को बढ़ाने के लिए अपेक्षाकृत कम महंगा है।
  • जैव जल निकासी तकनीक का परिचालन लागत नहीं है, क्योंकि पौधे अतिरिक्त भूजल को वायुमंडल में निकालने में अपनी जैव-ऊर्जा का उपयोग करते हैं।
  • पौधों के मूल्य में कमी के बजाय पौधों के उम्र के साथ मूल्य में वृद्धि करता है।
  • जल निकासी प्रदूषण को कम करने के लिए अलग से किसी भी जल निकासी उपकरण की आवश्यकता नहीं होती है।
  • यह तकनीक कोई पर्यावरणीय समस्या उत्पन नहीं करती है, क्योंकि पौधे वायुमंडल में फ़िल्टर किए गए ताजे पानी को निकाल देते हैं।
  • यह तकनीक जलाक्रांत और लवणता वाले क्षेत्र की समस्या के समाधान में भी बहुत प्रभावी है।
  • यह लंबे जीवन की निवारक के साथ ही उपचारात्मक प्रणाली भी है।
  • ठंड और गर्मी के लहर प्रभाव को नियंत्रित करने का एक अच्छा साधन है।
  • यह तकनीक कार्बन अनुक्रमण और कार्बन क्रेडिट में मदद करता है।
  • जलवायु परिवर्तन की समस्या को कम करता है, और वनक्षेत्र की बढ़ोतरी में भी सहभागिता प्रदान करता  है।
  • इस तकनीक की शुरूआत के बाद, पानी की ठहराव, खारे पानी की गंध, मच्छर समस्या और हानिकारक खरपतवार का विकास जैसी समस्या समाप्त हो जाती है।
  • कृषि-वानिकी प्रणाली में हवा के प्रभाव को काम करने और आश्रय बेल्ट के रूप में कार्य करता है।
  • यह तकनीक खाद्य, चारा, ईंधन-लकड़ी और छोटे लकड़ी के उत्पादन के माध्यम से किसान को उच्च आय प्रदान करता है।

इस तकनीक के माध्यम से लोगों की भागीदारी भी बढ़ी है। यह पद्धति किशानों के बीच एकजुटता को भी बढ़ावा देती है।

जैव जल निकासी तकनीक पौधे की प्रजातियाँ का विवरण

युकलिप्टुसयुकलिप्टुस:
 
एक अध्ययन से यह भी पता चला है की रोपण के 4 साल बाद, यह पौधा जलस्तर को प्रभावित करता है, जबकी 5 साल का पौधा भूजल निष्कर्षण के साथ साथ जलस्तर को गहराई तक ले चला जाता जाता है।

एक शोध से पता चला है की युकलिप्टुस पौधे की प्रजाति का जैव जल निकासी तकनीक के तहत उपयोग करके जलस्तर को कम और संबंधित मिट्टी के सुधार करके गेहूं के अनाज की पैदावार में 3.4 गुना वृद्धि कर सकते है। यह बायोमास उत्पादन के रूप में राजस्व देता है, और इससे किसान अपने फसल का ज्यादा से ज्यादा बी:सी अनुपात प्राप्त करता है।

पापलरपॉपलर:
 
पॉपलर पौधे की प्रजाति सीधा तथा तेज बढ़ने वाला व फसलों को बहुत कम नुकसान करने वाला ऐसा वृक्ष है जो जमीन की उत्पादकता बनाए रखते हुए 6-8 साल में प्रति एकड़ 2.5 से 3.0 लाख रूपये किसानों को दे सकता है।

कृषि विविधिकरण परियोजना के जरिए किसानों को पॉपुलर पौधारोपण की सलाह दी जा रही है और इसके लिए दस हजार रुपये प्रति हेक्टेयर अनुदान देने की घोषणा की है।


 
Arjunअर्जुन (अर्जुना टर्मिनलिअ)

यह पौधा सामान्य रूप से नदी के किनारों में पाया जाता है।  इस पौधे की सबसे अच्छी विशेस्ता है की यह जलक्रांत तथा लवणीय क्षेत्र को खेती के ऊपरयुक्त बनाने में सक्षम होता है।इस वृक्ष की एक बिशेस्ता यह भी है की यह बतावरण के तापमान को सामान्य बनाने में भी सक्षम है।

ओक का पेडओक (कैशुरिना ग्लाउका)

एक शोध में पाया गया है की ओक, युकलिप्टुस की तुलना में ज्यादा तेजी से भूजल को निकासी कर जलाक्रांत क्षेत्रों को खेती के अनुकूल बनाने सक्षम होता है।

 


Author:
पवन जीत1, प्रेम कुमार सुंदरम1, अनूप कुमार2 और प्रतीक कुमार मिश्रा3
1वैज्ञानिक, 2वरिष्ठ शोधकर्ता और 3परियोजना सहायक
आई. सी. ए. आर. पूर्वी क्षेत्र के लिए अनुशंधान परिसर, पटना-800,014
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