Disease management in blackgram for quality seed production.

उड़द का स्वस्थ बीजHealthy crop of Urad 

Healthy crop and seed of blackgram

भारत में उड़द दलहन की एक महत्वपूर्ण फसल है। यह शाकाहारी जनसंख्या के लिये प्रोटीन, खनिजो एवं विटामिनों का एक प्रमुख श्रोत है। इसमें फॉस्फोरिक अम्ल प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। गुणवत्ता वालें बीज के उत्पादन के लिये स्वस्थ फसल का महत्व निर्विवादित है। इस फसल में कवक, जीवाणु एवं विषाणु इत्यादि कारकजीवों द्वारा अनेक रोग उत्पन्न होते है।  उड़द के अच्छे उत्पादन के लिये फसल में निम्नांकित रोगों का उचित प्रबन्धन करना चाहिये-

Anthracnose Disease in uard beanउड़द दलहन में एन्थ्रेक्नोज रोग (Anthracnose Disease) 

यह रोग कोलेटोट्राइकम लिण्ड़ेमुथियानम (Colletotrichum lindemuthianum) कवक की वजह से होता है। इस रोग में कवक पौधें के सभी भूमि के ऊपर वाले भागों पर आक्रमण करता है। यह रोग पौधे की बढवार के किसी भी समय हो सकता है। इस रोग में गहरे रंग के केन्द्र व चमकीलें लाल व नारंगी रंग के किनारों वाले काले, गोलाकार, धसें हुये धब्बें पत्तियों तथा फलियों पर बनते है। गम्भीर संक्रमण में प्रभावित पौधें के भाग फट जाते है। बीज अंकुरण के तुरन्त बाद होने वाले संक्रमण में प्रभावित नव अंकुरित पौधें झुलस जाते है। रोगकारक बीज एवं पादप अवशेष पर उत्तरजीवी होता है। यह रोग वायु जनित बीजाणुओं द्वारा फैलता है। ठण्ड़े एवं आर्द्र मौसम में यह रोग अधिक भयंकर होता है।

प्रबन्धनः

  • बीज को कार्बेन्ड़ाजिम @ 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिये।
  • पादप अवशेषों को एकत्र करके उन्हें नष्ट कर देना चाहिये।
  • मैन्कोजैब @ 2 ग्राम प्रति लीटर अथवा कार्बेन्ड़ाजिम @ 1-2 ग्राम प्रति लीटर का छिड़काव करना चाहिये।

उड़द दलहन का जीवाणुज पत्ती झुलसा रोग (Bacterial Leaf Blight Disease).

यह रोग जैन्थोमोनास फैजियोलाई (Xanthomonas phaseoli) नामक जीवाणु द्वारा होता है। इस रोग में पत्तियों की सतह पर भूरे, सूखे एवं उभरे हुये धब्बें बन जाते है। रोग की गंभीर अवस्था में ऐसे अनेक धब्बें मिल जाते और पत्तियां पीली पड़कर परिपक्व होने से पूर्व ही झड़ जाती है। इन उभरे हुये धब्बों के बनने के कारण पत्तियों की निचली सतह लाल रंग की दिखाई पड़ती है। तने और फलियां भी संक्रमित हो जाती है। यह जीवाणु बीज जनित है। वर्षा की छींटे इस रोग के विकास एवं फैलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रबन्धनः

  • रोग रहित बीज का प्रयोग करना चाहिये।
  • पादप अवशेषों को एकत्र करके उन्हें नष्ट कर देना चाहिये।
  • बीज को बुवाई के पूर्व 500 पी पी एम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के घोल में 30 मिनट के लिये डूबोना चाहिये। उसके उपरान्त खेत मे स्ट्रेप्टोसाइक्लिन व कॉपर आक्सीक्लोराइड़ @ 3 ग्राम प्रति लीटर की दर से 10 - 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करना चाहिये।

सर्कोस्पोरा पत्ती धब्बा रोग.

उड़द दलहन का सरकोस्पोरा पत्ती धब्बा रोग (Cercospora Leaf Spot Disease)

यह रोग सरकोस्पोरा कैनेसैन्स (Cercospora canescens) कवक की वजह से होता है। इस रोग में पत्तियों पर छोटे, संख्या में बहुत अधिक, पीले भूरे रंग के केन्द्र व लाल भूरे रंग के किनारो वाले धब्बें बनते है। इसी प्रकार के धब्बें शाखाओं व फलियों पर भी बनते है। रोग के अनुकूल वातावरण के होने पर फूल आने व फली बनने के समय पत्तियों पर अत्यधिक धब्बें बनते है व पत्तियां झड़ जाती है। यह फंफूद बीज जनित है एवं पादप अवशेष पर भूमि में उत्तरजीवी होता है। उच्च आर्द्रता रोग के पनपने के लिये अनुकूल होती है।

प्रबन्धनः

  • उच्च बढवार वाली धान्य एवं मिलेट्स (मोटे अनाज की फसल) के साथ अन्तः फसल लेते है।
  • सफाई वाली खेती का अनुसरण करना चाहिये।
  • रोग मुक्त बीज का प्रयोग करना चाहिये।
  • कम फसल जनसंख्या घनत्व को अपनाना चाहिये व लाइन से लाइन की उचित दूरी बनाए रखना चाहिये।
  • मल्चिंग रोग विस्तार को कम करके उपज को बढाने में सहायक होती है।
  • कार्बेन्ड़ाजिम @ 1-2 ग्राम प्रति लीटर अथवा मैन्कोजैब @ 2-2.5 ग्राम प्रति लीटर का बुवाई के 30 दिनों बाद छिड़काव करना चाहिये।

चूर्णिल आसिता रोग (Powdery Mildew Disease)

यह रोग ऐरिसाइफी पॉलीगोनी (Erysiphe polygoni) नामक फंफूद के द्वारा होता है। चूर्णिल आसिता रोग होने पर पत्तियों की ऊपरी सतह व अन्य हरे भागों पर सफेद चूर्ण के समान वृद्धि के धब्बे दिखाई देते है। प्रभावित भाग धूंधले रंग के हो जाते है। यें धब्बें (चकते) बढकर पूरी पत्तियों को ढक देते है। गम्भीर रूप से प्रभावित भाग झुर्री पड़कर विकृत हो जाते है। पत्तियों की ड़ण्ठल एवं शाखायें भी इस सफेद फूंफद की वृद्धि से ढक जाती है। गम्भीर संक्रमण होने पर रोग ग्रसित पत्तियां पीली पड़कर मुडने लगती है और परिपक्व होने से पहले ही झड़ जाती है। यह रोग पौधों में बाध्य परिपक्वता उत्पन्न करता है जिससे उपज में भारी नुकसान होता है। रोग कारक अनेक पोषक पौधों को ग्रसित कर सकता है एवं गैर अनुकूल मौसम में यह इन पोषक पर ओडिया के रूप में उत्तरजीवी होता है। रोग का दूसरा विस्तार वायु जनित बीजाणुओं के द्वारा होता है।   

उड़द दलहन का चूर्णिल आसिता रोगउड़द दलहन का चूर्णिल आसिता रोग

Powdery Mildew Disease of Black gram (Urad bean)

प्रबन्धनः

  • बीज की अगेती बुवाई जून में कर देनी चाहिये ताकि फसल पर रोग के अगेते विस्तार से बचा जा सके।
  • चूर्णिल आसिता रोग के नियन्त्रण हेतू कार्बेन्ड़ाजिम @1.0 ग्राम प्रति लीटर, घुलनशील (वेटेबल) सल्फर 2.5 से 3.0 ग्राम प्रति लीटर अथवा ट्राईड़ेमॉर्फ 1.0 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से 20 दिन के अन्तराल पर तीन बार छिड़काव करना चाहिये। इससे रोग की उत्तम रोकथाम होती है।
  • प्रभावित पौधें के भाग को तोड़कर सावधानी से नष्ट कर देना चाहिये।

जड़ गलन एवं पत्ती झुलसा रोग (Root Rot and Leaf Blight)

यह रोग राइजोक्टोनिया सोलैनी (Rhizoctonia solani) नामक कवक द्वारा होता है।यह रोग कारक मूंग में बीज गलन, जड़ गलन, आर्द्र गलन, बीजांकुर झुलसा, तने का कैन्सर और पत्ती झुलसा रोग उत्पन्न करता है। यह रोग सामान्यतः फली बनने की अवस्था मे आता है। प्रारम्भिक अवस्था में फफूंद बीज गलन, बीजांकुर झुलसा व जड़ गलन के लक्षण उत्पन्न करता है। प्रभावित पत्तियां पीली पड़ जाती है व उन पर भूरे अनियमित चकते उभर आते है। इन चकतो के मिलने पर बडे चकते बनते है और प्रभावित पत्तियां परिपक्व होने से पूर्व ही सूखने लगती है। जड़ एवं तने का भूमि के समीप वाला भाग काले रंग का हो जाता है। और उनकी छाल आसानी से उतर जाती है। प्रभावित पौधें धीरे-धीरे सूखने लगते है। जब प्रभावित पौधों की जकड़ा जड़ को चीरकर देखते है तो अन्दर के ऊत्तको में लालिमा दिखाई देती है। यह रोगकारक मृदा- जनित है।

प्रबन्धनः

  • इस रोग के नियन्त्रण के लिये ट्राइकोडर्मा विरिडी @ 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिये।

गेरूई अथवा रतुआ रोग (Rust Disease)

यह रोग यूरोमाइसिस फैजियोलि (Uromyces phaseoli) नामक कवक द्वारा होता है।यह रोग गोल लाल भूरे रंग के छालों के रूप में प्रकट होता है। ये छालें पत्तियों की निचली सतह पर, फलियों पर कम व थोड़े बहुत तनों पर बनते है। जब पत्तियों पर गंभीर संक्रमण होता है तो उनकी दोनों सतह पूरी तरह गेरूई के छालों (पस्चूल्स) से आच्छादित हो जाती है। पत्तियों के झुर्री पड़ने के बाद झड़ जाने के कारण उपज में भारी कमी हो जाती है

प्रबन्धनः

  • मैन्कोजैब @ 2.5 ग्राम प्रति लीटर का छिड़काव इस रोग को नियन्त्रित करता है।

उड़द दलहन में तने का कैन्कर रोगः

 तने का कैन्कर रोग (Stem canker)

यह रोग मैक्रोफोमिना फैजियोलिना  (Macrophomina phaseolina) नामक कवक द्वारा होता है।इस रोग के लक्षण तनों के आधार पर उभरे हुये सफेद कैन्कर के धब्बों के रूप में उड़द की 4 सप्ताह की फसल में दिखाई देते है। ये धब्बें धीरे – धीरे बढकर उपर की और फैलती हुई उभरी हुई बादामी धारियों में बदल जाते है। प्रभावित पौधें बौने रह जाते हैं, पत्तियां गहरे हरे रंग की, चित्तीदार व छोटे आकार की हो जाती है। प्रभावित पौधों की सामान्य पत्तियां अचानक सूखकर गिर जाती हैं। पौधों में फूल आने व फली बनने में भारी कमी आ जाती हैं।

प्रबन्धनः

  • गर्मी में गहरी जुताई करनी चाहिये।
  • फसल चक्र का पालन करना चाहिये।
  • मृदा में एफ वाई एम @ 12.5 टन प्रति हैक्टेअर की दर से मिलाने पर रोग में कमी होती है।
  • रोगी पौधों के अवशेषों को जलाकर अथवा भूमि मे दबाकर नष्ट कर देना चाहिये।
  • इस रोग के नियन्त्रण के लिये ट्राइकोडर्मा विरिडी @ 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज, स्यूडोमोनास फ्लोरेसेन्स 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज अथवा कार्बेन्ड़ाजिम या थाइराम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज  की दर से बीजोपचार करना चाहिये।
  • रोगी पौधे के पास कार्बेन्ड़ाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर, ट्राइकोडर्मा विरिडी /स्यूडोमोनास फ्लोरेसेन्स 2.5 किलोग्राम प्रति हैक्टेअर 50 किलोग्राम गोबर की खाद के साथ मिलाकर ड्रेन्चिंग करना चाहिये।

 

Yellow Mosaic Viralपीला मोजैक रोग (Yellow Mosaic Viral Disease)

यह एक विषाणु जनित रोग है। यह रोग मूंगबीन येलो मोजैक (Mungbean Yellow Mosaic Virus) विषाणु द्वारा होता है। यह रोग मूंग की अपेक्षा उड़द में काफी आता है। शुरूआत में नई पत्तियों पर बिखरे हुये हल्के पीले रंग के छोटे धब्बें दिखाई देते है। शीर्ष से निकले त्रिपत्रक पर एक के बाद एक हरे एवं पीलें धब्बें दिखाई देते है। धब्बें धीरे – धीरे आकार में बढते है और अन्त में कुछ पत्तियां पूरी तरह पीली हो जाती है। ग्रसित पत्तियां ऊत्तकक्षय लक्षण (नेक्रोटिक) भी प्रदर्शित करती है। रोगी पौधें बौने रह जाते है, वे देरी से पकते है और उन पर बहुत कम फूल व फलियां लगती है। रोग ग्रसित पौधों की फलियों का आकार कम रह जाता है और वें पीले रंग की हो जाती है।

प्रबन्धनः

  • क्षेत्र विशेष के लिये अनुमोदित रोग प्रतिरोधी/ रोग सहिष्णु प्रजातियों को उगाना चाहिये।
  • ज्वार की 7 पक्तियों को बोर्डर फसल के रूप में उगाना चाहिये। 

 

 

Leaf Crinkle Virusपत्ती मरोड़ रोग (Leaf Crinkle Virus Disease)

यह रोग लीफ क्रिन्कल विषाणु द्वारा होता है। रोग के शुरूआती लक्षण नई पत्तियों पर पाश्र्व शिराओं व पत्ती के किनारे के पास उसकी सहायक शिराओं के पास हरिमाहीनता के रूप दिखाई देते है। पत्तियों के किनारे नीचे की ओर मुड़ने लगते है। कुछ पत्तियां ऐंठने लगती है। शिराओं की निचली सतह पर लाल – भूरे रंग के धब्बें दिखाई देते है जो वृन्त (पेटियोल) तक फैल जाते है। बुवाई के 5 सप्ताह के अन्दर लक्षण प्रदर्शित करने वाले पौधे असमान रूप से बौने रह जाते है और इनमें अधिकांशतः शीर्ष ऊत्तकक्षय (टॉप नेक्रोसिस) के कारण एक या दो सप्ताह में मर जाते है। देरी से आने वाले संक्रमण मे पौधें की पत्तियों मे गम्भीर मरोड़ या ऐंठन के लक्षण नही दिखते ब्लकि पत्तियों की सतह पर कहीं भी सुस्पष्ट शिरा हरिमाहीनता दिखाई देती है। खेत में रोग मुख्यतः बीज अथवा रोगी पत्तियों की स्वस्थ पत्तियों पर आपस में रगड़ से फैलता है।

प्रबन्धनः

  • रोग ग्रसित पौधों का 45 दिनों तक सामायिक उन्मूलन।
  • रोग वाहक का नियन्त्रण करने हेतू एसेफेट 1 ग्राम प्रति लीटर अथवा डायमेथोयेट 2 मिली लीटर प्रति लीटर का छिड़काव करना चाहिये।  

जालयुक्त झुलसा (वेब ब्लाइट) रोग (Web Blight Disease)

यह रोग राइजोक्टोनिया सोलैनी (Rhizoctonia solani) नामक कवक द्वारा होता है। इस रोग के लक्षण पौधों के सभी भागों जैसे जड़, तना, वृन्त (पेटियोल) और फलियों पर बनते है किन्तु यह रोग पर्ण समूह पर विनाशकारी होता है। यह रोगजनक बीजजनित, मृदा जनित एवं वायुजनित होता है। पादप वृद्धि के दूसरे से तीसरे सप्ताह में यह रोग बीजांकुर की मृत्यु कर देता है। अंकुरण पूर्व व अंकुरण पश्चात बीजांकुरो की मृत्यु हो जाती है एवं बीज सड़ जाता है। रोग के प्रथम लक्षण छोटे गोल भूरे धब्बों के रूप में पहली पत्तियों पर दिखाई पड़ते है। ये धब्बें बढ जाते है जो प्रायः सकेन्द्री पट्टियों और असमान जलासिक्त क्षेत्र से घिरा दिखाई देते है। ये क्षत धब्बें विस्तार करके मिल जाते है और सफेद कवकजाल की वृद्धि को पत्तियों की निचली सतह व नई कोमल शाखाओं पर देखा जा सकता है। रोग ग्रसित पत्तियों पर कवकजाल मकड़ी के जाले की भांति दिखाई देता है इसलिये इस रोग का नाम जालयुक्त झुलसा (वेब ब्लाइट) रोग रखा गया है।

प्रबन्धनः

  • बाविस्टीन अथवा बेनलेट @ 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज का प्रयोग इस रोग के बीज जनित संक्रमण को नष्ट करने में प्रभावशाली है।
  • ट्राइकोडर्मा विरिडी इस रोगजनक के जैविक नियन्त्रण में प्रभावकारी है।



Authors:

 डा. रविन्द्र कुमार*, अनुजा गुप्ता एवं वी के माहेश्वरी
Scientist (Plant Pathology) 
IARI RS Karnal , Haryana

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