फूल आदिकाल से ही अपने रंग-रूप और बनावट के कारण मनुष्य को अकर्षित करते रहे हैं । वर्तमान समय में फूलों की खेती एक उद्योग का रूप ले चुकी है

जो विश्व के अनेक देशों की आय का मुख्य स्रोत है । हिमालय की गोद में बसा हिमाचल प्रदेश प्रकृति द्वारा वर-प्रदत्त उन पर्वतीय राज्यों में से एक है जहाँ की जलवायु फूलों की व्यावसायिक खेती व इसके प्रवर्धन के लिए सर्वथा उत्तम है । इसी कारण प्रदेश के किसान व बागवान फूलों की खेती में अधिक रुचि लेने लगे हैं जिसके परिणाम स्वरूप पुष्प व्यवसाय के अंतर्गत क्षेत्रफल निरंतर बढ़ता जा रहा है । वर्ष 1990 में फूलों के अंतर्गत केवल 5.0 हेक्टर क्षेत्र था जो वर्ष 2013-14 में बढ़कर 910.0 हेक्टर हो गया है । 

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कंदीय फूलों में ट्यूलिप के बाद लिलियम एक महत्वपूर्ण फूल है जिसकी काफी माँग है । इसका लुभावना आकार, विभिन्न प्रकार के रंग, अधिक समय तक तरो-ताजा रहने व आकर्षक बनावट के गुणों के कारण कर्तित फूल के लिए संसार के प्रमुख निर्यातक देशों में उगाया जाता है । हिमाचल प्रदेश में लिलियम की खेती लगभग 20 हेक्टर भूमि पर की जाती है । इसकी खेती के लिए बल्ब मुख्यत: हॉलैंड से निर्यात किये जाते हैं । भारत सालाना हॉलैंड से लगभग 15-20 लाख बल्बों का आयात करता है और लगभग इतने ही बल्बों की अतिरिक्त माँग हा । यह अनुमान लगाया गया है कि दुनियाँ के कुल वार्षिक व्यापार में कंदीय फूलों का लगभग 12000 करोड़ का व्यापार है । पुष्प उत्पादन के लिए कंदीयफूलों की खेती विभिन्न जलवायु वाली परिस्थितियों में की जा सकती है, परंतु इनके बल्ब उत्पादन व प्रवर्धन के लिए निश्चित सर्दियों की अवधि के साथ ठण्डी जलवायु की आवश्यकता होती है जो केवल कुछ क्षेत्रो में उपलब्ध है । इस तरह की जलवायु केवल हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्र जैसे लहौल एवं स्पिति, किन्नौर, चम्बा, जम्मू-कश्मीर व उत्तराखण्ड में पायी जाती है जो बल्ब उत्पादन के लिए बहुत ही उपयुक्त है । लिलियम का प्रवर्धन शल्क कंदिक, एरियल कंदों,शल्क को अलग करके, कंदों के विभाजन और ऊतक प्रवर्धन द्वारा की जाती है ।

स्केल प्रवर्धन

स्केलिंग द्वारा प्रवर्धन करके तीव्र और कम लागत वाली प्रभावी विधि से कंदों को बढ़ाया जा सकता है । अधिकांश लिलियम की किस्मों को बल्ब स्केलिंग द्वारा आसानी से प्रचारित किया जा सकता है । प्रवर्धन के लिए स्वस्थ, बड़े, रोगमुक्त तथा प्रसुप्तवस्था से मुक्त कंदोंको ही चुनें । अच्छी शल्क कंदिकाओं के निर्माण हेतु बल्ब के बाहरी 2-3 व मध्य वाली पर्तों के स्केल्स को अच्छी तरह से आधार पट्टिका के साथ तोड़कर अलग कर दें । स्केलों को कवकनाशी जैसे बाविस्टिन 1.0 ग्राम तथा डाइथेन एम-45 1.0 ग्राम को एक लीटर पानी में घोल बनाकर लगभग 15-20 मिनट तक उपचारित करें । इसके बाद स्केलों के निचले भाग को जड़ उगाने वाले हॉर्मोन जैसे एन.ए.ए. (500 पी.पी.एम.) में 10-15 मिनट तक उपचारित करें । स्केलों के माध्यम में लगाने से पहले छाया में सुखा लें । कोकोपीट और वर्मीकुलाइट जैसे उपयुक्त माध्यम में स्केलों को आर्द्र बारीक ट्रे या बक्सों में इस तरह रोपित करें कि स्केल का ऊपरी हिस्सा माध्यम से बाहर रहे । स्केलों को अच्छे हवादार कमरे में 24 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर रखें जिससे शल्क कंदकों और जड़ों का पूरी तरह विकास हो सके । स्प्रे पम्प से वातावरण में नमी बनाये रखें । बल्बलेट्स बनने की अवधि किस्म और प्रकार पर निर्भर करती है । लोंजीफ्लोरम संकर किस्मों में 10-12 सप्ताह, एशियाटिक प्रजातियों में 12-14 सप्ताह और ओरिएंटल संकर लिलियम में 16-18 सप्ताह में छोटे बल्बलेट्स बनना शुरू हो जाते हैं । इस तरह एक स्केल में लगभग 3-4 बल्बलेट्स बन जाते हैं । इसके बाद इन बल्बलेट्स को स्केल से अलग करके 3 से 4 सप्ताह के लिए एक मध्यवर्ती तापमान (4-10 डिग्री सेंटीग्रेड) पर रखें, उसके बाद बसंतीकरण के लिए इन्हें शीतग्रह में 2 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर 6-8 सप्ताह तक रखें । तापमान और मिट्टी की अनुकूल स्थिति होने पर स्केलों को बाहरी पंक्तियों में लगा दें । शल्क कंदकों को अंकुरित होने के लिए तैयार किया गया है इसलिए इन्हें उप्युक्त समय पर रोपें ताकि वे कोहरेकी मार से बच सकें । रोपित किए गये स्केलों को अमूमन दो ऋतुओं तक जमीन में रखा जाता है । कई एशियाटिक व लोंजीफ्लोरम किस्में उसी मौसम में फूल देना शुरू कर देती हैं जिस मौसम में इन्हें रोपा जाता है जो क्लोन में उत्कृष्ट ताकत का संकेत है ।

कंद विभाजन

कुछ किस्मों में कंद आधार पट्टिका के घेरे में उत्पन्न होते हैं जो बाद में प्रतिस्थापन कंदों के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं । प्रत्येक प्रजाति या संकर अपनी ही दर पर बल्ब का उत्पादन करते हैं जैसे बहुत छोटे बल्ब, कमजोर प्रजातियाँ या अल्प विकसित बल्ब सिर्फ नए बल्ब का ही उत्पादन कर सकाते हैं । गर्मियों में बल्ब निकालते समय हम नए बल्बों को आधार पट्टिका से जुड़ा हुआ पाएंगे जो आसानी से निकाले जा सकते हैं । यदि बल्बों को दो ऋतुओं तक नहीं निकाला जाए तो मूल बल्बोंके नष्ट होने का खतरा रहता है और कई बार बल्ब का आकार छोटा रह जाता है । एशियाटिक औए एल.ए. संकर किस्मों को ऑरिएंटल लिली की तुलना में कंद विभाजन द्वारा प्रबंधित किया जा सकता है । इन्हें गर्मियों के अंत में निकाल कर नए स्थान या पुरानी जगह पर दुबारा रोपित किया जा सकता है ।

स्टेम बल्बलेट्स

कुछ किस्मों में तनों के भूमिगत या ऊपरी हिस्से पर बनते हैं । इनकी संख्या और आकार, प्रजातियों, किस्मों या बल्ब गुणवत्ता पर निर्भर करता है । विकसित तने दर्जन से भी बल्बलेट्स उत्पन्न कर सकते हैं । पूर्णत: बने छोटे बल्ब, शल्कों और जड़ों के साथ रोपित करने के लिए तैयार होते हैं । इनकी संख्या में बढ़ोतरी उसके आकार एवं भार में सार्थक वृद्धि के लिए स्टेम रूटिंग को बढ़ावा देने की जरूरत होती है । यह शुरू में एक खुले, किरकिरे और ह्यूमस युक्त मिट्टी में कम से कम 10-15 से.मी. आकार के बल्बोंको रोपित करके प्राप्त किया जा सकता है । बसंत के आखिर में भी रूटिंग को ह्यूमस मल्चिंग द्वारा बढ़ाया जा सकता है ।

कक्षास्थ बल्बिल्स

छोटे गहरे बल्बिल्स पत्तियों के किनारों पर लगते हैं और बाद में बैंगनी–काले रंग में बदल जाते हैं, कभी-कभी ये बल्बिल्स पूर्णत: पकने से पहले ही पत्ते और जड़ें देना शुरू कर देते हैं और जमीन पर गिरने लगते हैं । बल्बिल्स के निर्माण के लिए पुष्प कलियों क्प तोड़कर या फिर वृद्धि कारकों जैसे बी.ए., पैक्लोवयूट्राजोल के छिड़्काव से बढ़ाया जा सकता है । अगर बल्बिल्स को गर्मियों के अंत से पहले निकालकर पुन: लगाया जाए तो उचित अनुपात वाली कुछ एक या दो फूल वाली टहनियां प्राप्त की जा सकती हैं जो अगले साल गर्मियों में दो से अधिक फूल दे देती हैं ।

ऊतक प्रवर्धन

ऊतक प्रवर्धन तकनीक द्वारा सीमित मातृ पौधों से कम समय में असंख्य रोग रहित पौधे तैयार किये जा सकते हैं । इस विधि में अत्यंत सूक्ष्म ऊतकों का इस्तेमाल किया जाता है । इन ऊतकों को सतही निर्जीवीकरण के बाद कृत्रिम माध्यम जैसे ठोस या तरल माध्यम में स्थापित किया जाता है । पोषण माध्यमको परखनली बोतल या जार में भरने से पहले निर्जीवीकरण किया जाता है । इसके बाद पोषण माध्यम को उपरोक्त वर्णित बर्तन में डालकर लेमिनार फ्लो के अंदर सूक्षम ऊतक जैसे स्केल, पार्श्व कलिका, तना, पत्ती या पौधे के किसीअन्य भाग का संवर्धन किया जाता है । इसके उपरांत प्रकाश व तापमान नियंत्रित जीव रहित कक्ष में ऊतक विधि के लिए रखा जाता है । समयानुसार दुबारा संवर्धन किया जाता है । इसके बाद प्ररोहों को जड़ें विकसित करने वाले माध्यम में स्थानांतरित किया जाता है । जड़ें विकसित होने के बाद पौधों को बाहरी वातावरण के अनुकूल बनाने के लिए कठोरीकरण कक्ष में लगाया जाता है तथा पूर्ण कठोरीकरण के बाद बाहर लगाया जाता है ।


 

लेखक

1डा. मस्त राम धीमान एवं 2डा. राम सिंह सुमन

1वरिष्ठ वैज्ञानिक (पुष्प विज्ञान),  2वरिष्ठ वैज्ञानिक (कृषि प्रसार)

भा.कृ.अ.सं. क्षेत्रीय स्टेशन, कटराईं (कुल्लू घाटी) हि.प्र. – 175129

9818070583, 9882034583

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