Onion Seed Production Technology

प्याज का हमारे देश में उगाई जाने वाली सब्जियों में एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक महत्वपूर्ण शल्ककंद सब्जी फसल है। यह पोटाशियम, फास्फोरस, कैल्शियम तथा विटामीन सी का एक अच्छा स्त्रोत है। इसका बीजोत्पादन उष्ण्ा कटिबन्धीय, शीतोष्ण तथा सम शीतोष्ण आदि विभिन्न जलवायु वाले क्षेत्रों में संभव हैं।

पौधे की आरंभिक बढवार की अवस्था में व कंद बनना शुरु होने से पहले 13-210 सेंटिग्रेड तापमान तथा कंद बनना शुरु होने की अवस्था में 15-250 सेंटिग्रेड तापमान अनुकूल रहता है। बीज के पकने के समय अपेक्षाकत सुखे व गर्म मौसम की आवश्यकता होती है।

उन्नत किस्में:

रबी फसल के लिए उन्नत प्रजातिया:

लाल किस्में- पूसा लाल, पूसा माद्यवी, पूसा रिध्दि, पूसा रतनार, पजांब रैड राउंड, अरका निकेतन, एग्रीफाउण्ड लाईट रैड, एन.एच.आर.डी.एफ. रैड

सफेद किस्में- पूसा व्हाईट फलैट, पूसा व्हाईट राउंड, एग्रीफाउण्ड व्हाईट, एस-48, पजांब व्हाईट

पीले रंग की किस्में- अर्ली ग्रेनो

खरीफ फसल के लिए उन्नत प्रजातिया:

एन-53, ,एग्रीफाउण्ड डार्क रैड 

खेत का चयन:

प्याज  बीज उत्पादन के लिए ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिए जिसमें पिछले मौसम में प्याज या लहसुन की शल्ककंद या बीज फसल ना उगाई गई हो। खेत की मिट्टी दोमट, बलुई दोमट या चिकनी दोमट तथा पी.एच. मान 6 से 7.5 होना चाहिए।  खेत की मिटटी में जीवांश पदार्थ प्रचुर मात्रा में हो तथा पानी के निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। 

पृथक्करण दूरी:

शल्ककंद उत्पादन के दौरान दो किस्मों के बीच में न्यूनतम 5 मीटर का फासला होना चाहिए। प्रमाणित बीज फसल उत्पादन के लिए न्यूनतम 400 मीटर की पृथक्करण दूरी तथा आधार बीज फसल के लिए यह पृथक्करण दूरी 1000 मीटर होनी चाहिए। प्याज एक पर-परागित फसल है जिसमें मधुमक्खिया तथा अन्य कीट परागण में मदद करते है अत: आनुवंशिक रुप से शुद्भ बीज उत्पादन के लिए निर्धारित न्युनतम पृथक्करण दूरी का होना आवश्यक है।

बीजोत्पादन विधि :

उत्तर भारत के मैदानी भागों में बीजोत्पादन की दो विभिन्न विधियां है।

  1. बीज से बीज तैयार करना : इस विधि में सीधा बीज से बीज तैयार किया जाता है। इसके अंर्तगत पौधशाला में बीज की बुवाई अगस्त माह में तथा पौध की रोपाई अक्टुबर में की जाती है। अप्रैल-मई में बीज तैयार होता है। इस विधि में अपेक्षाकत अधिक बीज की उपज होती है एवं बीज हेतु कन्दों/गॉठों के भंडारण तथा पुन: रोपण आदि का खर्चा भी बचता है। इस विधि में प्याज के बीज की जातीय शुद्भता बनाए रखना सम्भव नहीं है। क्योंकि इसमें कन्दों के रंग, आकार आदि गुणों की परख नहीं की जा सकती।
  2. शल्ककंदों से बीज बनाना: प्याज के अच्छी गुणवत्ता वाले बीज उत्पादन हेतु अधिकतर इस विधि का उपयोग किया जाता है। इसके अंर्तगत दो विधियॉ आती है।

क- एक वर्षीय विधि:    

इस विधि में खरीफ में उगाई जाने वाली प्रजातियां जैसे एन-53, एग्रीफाउड डार्क रैड आदि का बीज तैयार किया जाता है। इसमें जून माह में पौध तैयार करते है तथा पौध की रोपाई अगस्त में की जाती है। कंद नवंबर-दिसंबर माह में तैयार हो जाते है। कंदों की खुदाई के 15-20 दिन उपरांत चुने हुए स्वस्थ कंदों को बीज खेत में लगाते है। पुष्प दंड जनवरी-फरवरी में निकलते है तथा बीज अप्रैल-मई में निकाला जाता है। यह विधि लगभग एक वर्ष का समय लेती है।

ख- दिवर्षीय विधि: 

इस विधि से रबी प्याज की प्रजातियां जैसे पूसा रैड, पूसा माधवी, पूसा रिध्दि, पूसा व्हाइट फलैट, पूसा व्हाइट राउंड, एस-48, एग्रीफाउंड लाइट रैड, एन.एच.आर.डी.एफ. रैड आदि का बीज तैयार करते है। इसमें बीज अक्टुबर-नवंबर में बोया जाता है तथा पौध की रोपाई दिसंबर से जनवरी के प्रथम पखवाडे तक करते है। शल्ककंद अप्रैल-मई में तैयार हो जाते है। खुदाई के उपरांत चुने हुए स्वस्थ शल्ककंदों को अक्टुबर तक भंडारण में रखते है। जिन्हे अक्टुबर-नवंबर में बीज उत्पादन हेतु खेत में लगाते है। बीज अप्रैल-मई में निकाला जाता है। इस विधि से बीज तैयार करने में  लगभग डेढ वर्ष का समय लगता है। उत्तर भारत में बीज की अच्छी उपज एवं उच्च गुणवत्ता हेतु प्याज के बीज उत्पादन के  लिए यह विधि अपनाई जाती है जिसका विवरण निम्न प्रकार है :-

1.बीज से शल्ककंद तैयार करना:     

शल्ककंद उत्पादन हेतु पौध तैयार करने के लिए बीज को 15-20 से.मी. उंची उठी हुई क्यारियों में लगाया जाता है। एक हैक्टेयर क्षेत्र में रोपाई के लिए 3 मीटर लंबी तथा 60 सें.मी. चौड़े आकार की लगभग 80-100 क्यारियॉ पौध उत्पादन हेतु पर्याप्त होती है। दो तीन जुताईयां करके खेत को समतल बनाकर क्यारियों व नालियों में बांट देते है। 8-10 किलोग्राम बीज एक हैक्टेयर के लिए पर्याप्त रहता है। बीज को 5-6 सें.मी. की दुरी पर कतारों में बोना चाहिए। बीजाई के बाद बीज को आधा सें.मी. तक अच्छी तरह सड़ी तथा छनी हुई गोबर की खाद से ढक देते है। 6 से 8 सप्ताह में पौध रोपाई हेतु तैयार हो जाती है। खरीफ फसल के लिए बीज मई-जून में बोया जाता है तथा पौध रोपण जुलाई-अगस्त में करते है। रबी फसल हेतु बीज अक्टुबर-नवंबर में बोया जाता है तथा पौध की रोपाई दिसंबर से जनवरी के प्रथम पखवाडे तक करते है। पौध रोपण 15×10 से.मी. के अंतराल पर करते है। रोपाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करते है। पौध रोपण के लिए खेत तैयार करते समय 50 टन गोबर की सड़ी खाद्,  240 किलोग्राम कैल्शियम अमोनियम नाईटेट या 60 किलोग्राम युरिया, 200 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट तथा 80 किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश तथा 10-12 किलोग्राम पी. एस. बी. कल्चर प्रति हैक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाते हेै। इसके अतिरिक्त 35 कि.ग्राम युरिया पौध रोपण के 30 दिन बाद तथा 35 कि.ग्रा. युरिया पौध रोपण के 45-50 दिन बाद छिड़काव ट्ठारा डालते है। प्याज की जड़ें अपेक्षाकृत कम गहराई तक जाती है अत: 2-3 बार उथली निराई-गुड़ाई करते है और खरपतवार निकालते है। समय समय पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते है। साधरणत्या जाड़े के मौसम में 10-15 दिन के अंतराल पर तथा गर्मियों में सिंचाई 7-8 दिन के अंतराल पर करते है। जिस समय शल्ककंद बन रहें हों मिट्टी में नमी की कमी नहीं होनी चाहिए।

शल्ककंदों की खुदाई व भंडारण:

पौध रोपण के लगभग 110-125 दिन बाद शल्ककंद खुदाई के लिए तैयार हो जाते है। पौधों की 50 प्रतिशत पत्तियॉ सुखने के 8-10 दिन पश्चात शल्ककंदों की खुदाई करने से भंडारण में होने वाली हानि कम हो जाती है। पत्तों सहित खुदाई करके शल्ककंदों को कतारों में रखकर 5-7 दिन छाया में सुखाते है। पत्तों को गर्दन से 2-2.25 से.मी. छोड़कर काट देते है। भंडारण में होने वाली हानि से बचने के लिए शल्ककंदो को सीधा धूप में नहीं सुखाना चाहिए तथा भीगने से बचाना चाहिए। मई में शल्ककंदों को निकालने के बाद साफ करके अक्टुबर तक अच्छे हवादार भंडार गृह में रखते है। बोई गई किस्म से मेल खाती अच्छी, एक रंग की, पतली गर्दन वाली, दोफाड़े रहित शल्ककंदों का भंडारण करते है। भंडारित किये गए कंदों की 15-20 दिन के अंतराल पर 2-3 बार छंटाई करते है तथा सड़े-गले  तथा रोग ग्रस्त कंदों को निकालते है।

 

 

शल्ककंदों से बीज उत्पादन :

बीजोत्पादन हेतु रबी प्रजातियां के शल्ककंदों को नवंबर के प्रथम पखवाडे में तथा खरीफ प्रजातियां के  शल्ककंदों को मध्य दिसंबर तक लगाया जाना चाहिए। बोने के लिए चुनी गई किस्म के गुणों से मेल खाते शल्ककंदों को उनके रंग, आकार व रुप के आधार पर छांटते है। पुर्णत: पक्व, स्वस्थ, एक रंग की, पतली गर्दन वाली, दोफाड़े रहित एवं 4.5-6.5 से.मी. व्यास तथा 60-70 ग्राम भार के शल्ककंदों को बीज उत्पादन हेतु रोपण के लिए चुनते है। चुने हुए कंदों के उपर का एक चौथाई या एक तिहाई हिस्सा काटकर हटा देतें है तथा काटे गए कंद के निचले हिस्से को को 0.2 प्रतिशत कार्बेडंाजिम अथवा मैंकाजेब के धोल में 5-10 मिनट तक भिगोकर खेत में रोपाई करते है। कंदों को बगैर काटे या साबुत भी लगाया जाता है। उपचारित शल्ककंदों को अच्छी तरह तैयार किए गए खेत में समतल क्यारियों में 60×30 से.मी. की दुरी पर 6-7.5 से.मी. की गहराई पर लगाया जाता है। पंक्ति से पंक्ति की दुरी 60 से.मी. से कम होने पर फसल में मिट्टी चढाने के कार्य में बाधा आती है। शल्ककंदों की रोपाई हेतु 60 से.मी. के अंतर पर हल्की नालियां ट्रैक्टर चालित ड्रील ट्ठारा बनाई जा सकती है जिससे रोपाई में श्रमिक खर्च की लागत कम आती है। एक हैक्टेयर क्षेत्र में लगाने के लिए लगभग 25-30 किंवटल शल्ककंदों की आवश्यकता होती है। खरीफ प्रजातियों के प्याज को लगाने से पहले पौटाशियम नाइट्रेट 1 प्रतिशत के धोल में 5 मिनट डुबोकर लगाने से अंकुरण में लाभ होता है।

सिंचाई प्रबंधन:

शल्ककंदों को बीजने के बाद सिंचाई करते है। बीज खेत में समय समय पर सिंचाई करने की आवश्यकता होती है विशेषकर पुष्पन तथा बीज विकास के समय खेत में उचित नमी बनाए रखना आवश्यक होता है। दिन के समय अथवा तेज हवा चलने की अवस्था में सिंचाई नहीं करनी चाहिए। टपक सिंचाई का उपयोग करने पर भी अच्छी बीज फसल प्राप्त होती है।

मिट्टी चढाना:

पौधों को गिरने से बचाने के लिए बीज फसल में स्फुटन के आरंभ होने की अवस्था पर मिट्टी चढ़ाते है।

खाद् एंव उर्वरक:

शल्ककंद रोपण के लिए खेत तैयार करते समय 50 टन गोबर की सड़ी खाद, 240 किलोग्राम कैल्शियम अमोनियम नाईटेट या 60 किलोग्राम युरिया, 150 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट तथा 80 किलोग्राम म्यूरेट् आफ पोटाश तथा 10-12 किलोग्राम पी. एस. बी. कल्चर प्रति हैक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाते हेै। इसके अतिरिक्त 35 कि.ग्रा. युरिया शल्ककंद लगाने के 30 दिन बाद तथा 35 कि.ग्राम युरिया शल्ककंद लगाने के 45-50 दिन बाद छिड़काव ट्ठारा डालते है।

अवांछनीय पोेैद्यों को निकालना :

बीज खेत में कोई भी वह पौद्या जो लगायी गई किस्म के अनुरूप लक्षण नहीं रखता है उसे अवाछंनीय पौद्या माना जाता है। जिन पोद्यौं में बीमारी, खासकर बीज से उत्पन्न होने वाली बीमारी हो तो उन्हे भी खेत से हटाना जरूरी है । अवाछंनीय पौद्यों को खेत से बाहर निकालने वाले व्यक्ति को किस्म के लक्षणों का भली भांति ज्ञान होना चाहिए जिससे की वह अवाछंनीय पौद्यों को पौद्ये की बढ़वार, पत्ताें व फूलो के रंग-रूप,  फूलाें के खिलने का समय आदि के आद्यार पर पहचान सके। प्याज में तीन अवस्थाओं पर अवांछनीय पोेैद्यों को निकालने का कार्य करना चाहिए।

वानस्पतिक अवस्था: शाकिय वृध्दि लक्ष्णों में भिन्नता यूक्त पौधों तथा विषाणु रोग से ग्रस्त पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए।

पुष्पन की अवस्था: विषाणु रोग तथा स्टेमफीलियम रोग से ग्रस्त पौधों को निकालकर नष्ट करना चाहिए।

पुष्पन के बाद तथा कटाई से पूर्व: इस अवस्था पर पौधों को स्टेमफीलियम रोग तथा नीला धब्बा रोग से ग्रस्त पौधों को निकालकर नप्ट करना चाहिए।

हर अवस्था पर जो भी अवाछंनीय पौद्ये मिले उन्हे निकालते रहना चाहिए।

बीजवृंतों की कटाई, गहाई व भंडारण:

कंदों की बुवाई के एक सप्ताह बाद अंकुरण आरंभ हो जाता है तथा लगभग ढाई माह बाद फूल वाले डंठल बनने शुरु हो जाते है। पुष्प गुच्छ बननें के 6 सप्ताह के अंदर ही बीज पक जाता है। बीजवृंतों का रंग जब मटमैला हो जाए एवं उनमें 10-15 प्रतिशत कैप्सुल के बीज बाहर दिखाई देने लगे तो बीजवृंतों को कटाई योग्य समझना चाहिए। सभी बीजवृंत एक साथ नहीं पकते अत: उन्ही बीजवृंतों को काटना चाहिए जिनमें 10-15 प्रतिशत काले बीज बाहर दिखाई देने लगे हों। 10-15 से.मी. लम्बे डंठल के साथ पुष्प गुच्छाें को काटना चाहिए। कटाई के बाद बीजवृंतों को तिरपाल या पक्के फर्श पर फैलाकर खुले व छायादार स्थान पर सुखाना चाहिए। अच्छी तरह सुखाए गए बीजवृंतों को डंडों से पीट कर या ट्रैक्टर द्वारा गहाई करके बीजों को निकालते है। बीजों से बीजवृंत अवशेषों, तिनकों, डंठलों आदि को अलग कर लेते है। यांत्रिक प्रसंस्करण सुविधा ना होने की स्थिती में सफाई के लिए बीज को 2-3 मिनट तक पानी में डुबोना चाहिए तथा नीचे बैठे हुए भारी बीजों को निथार कर सुखाना चाहिए। सुखाने के बाद बीज को फफुंदीनाशक दवा से उपचारित करना चाहिए। साफ बीज को अगर टीन के डिब्बों, अल्युमिनियम फायल या मोटे प्लास्टीक के लिफाफे में भरना हो तो बीज को 5-6 प्रतिशत नमी तक सुखाना चाहिए। सुरक्षित भंडारण हेतु बीज को 18-200 सै. तापक्रम तथा 30-40 प्रतिशत आपेक्षित आद्रर्ता पर रखना चाहिए।

 बीज उपज एवं मानक: अच्छी बीज फसल से प्रति हैक्टेयर लगभग 500-800 कि.ग्रा. बीज प्राप्त किया जा सकता है।

बीज मानक

 

मानक स्तर

 

आधा्र बीज

 

प्रमाणित बीज

 

शुध्द बीज (न्यूनतम )

 

98 प्रतिशत

 

98 प्रतिशत

 

निष्क्रिय पदार्थ (अधिकतम )

 

2 प्रतिशत

 

2 प्रतिशत

 

अन्य फसलों के बीज (अधिकतम )

 

5 प्रति किलो

 

10 प्रति किलो

 

खरपतवार के बीज (अधिकतम )

 

5 प्रति किलो

 

10 प्रति किलो

 

अंकुरण क्षमता (न्यूनतम )

 

70 प्रतिशत

 

70 प्रतिशत

 

नमी (अधिकतम )

 

सामान्य पैकिंग

 

8 प्रतिशत

 

8 प्रतिशत

 

नमी अवरोधी पैकिंग

 

6 प्रतिशत

 

6 प्रतिशत

 

प्रमुख कीट एवं रोग:

प्याज का थ्रिप: ये कीडे छोटे और पीले रंग के होते हैं, जो पत्तियों का रस चूसते हैं। पत्तियों पर हल्के हरे रंग के लंबे-लंबे दाग दिखाई देते हैं जो बाद मे सफेद हो जाते हैं। इनके नियंत्रण हेतु डाइमेथोएट 1.0 मि.ली. या साइपरमेथ्रिन 0.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर 10-15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें। घोल में 0.1 प्रतिशत ट्राइट्रोन या सैन्डोविट या टीपोल नामक चिपचिपा पदार्थ अवश्य मिलायें।

शीर्ष छेदक (हेलिओथिस आर्मिजेरा): इस कीट का लार्वा पत्तियों को काटकर फसल को हानि पहुँचाता है। यह कीट प्याज की बीज वाली फसल में ज्यादा क्षति पहुँचाता है। इनके नियंत्रण हेतु मिथाइल डेमेटोन या साइपरमेथ्रिन 0.5-1.0 मि.ली. दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। घोल में 0.1 प्रतिषत ट्राइट्रोन या सैन्डोविट नामक चिपचिपा पदार्थ अवश्य मिलायें। 

बैंगनी धब्बा (परपल ब्लाच): यह रोग अल्टरनेरिया पोरी नामक फफूँद से होता है। प्रभावित पत्तियों और तनों पर छोटे-छोटे गुलाबी रंग के सिकुड़े हुए धब्बे पड़ जाते हैं जो बाद में बैंगनी रंग के हो जाते है।  प्याज की गांठे भण्डार गृह में सड़ने लगती हैं। पौधों की पत्तियां एक तरफ पीली तथा दूसरी तरफ हरी रहती हैं। इस रोग से बचाव के लिए क्लोरोथेलोनील या मैन्कोजेब (0.2 प्रतिशत) 2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर 10 दिन के अन्तर पर छिड़काव करें। घोल में 0.1 प्रतिशत ट्राइट्रोन या सैन्डोविट नामक चिपचिपा पदार्थ अवश्य मिलायें।

मृदुरोमिल फफँदी (डाउनी मिल्डयू): इस रोग में पत्तियों तथा पुष्प दंडों की सतह पर बैंगनी रोयेंदार वृध्दि होती है जो बाद में हरा रंग लिए पीली हो जाती हैं तथा अन्त में पत्तियां एवं पुष्पदंड सूखकर गिर जाते हैं। इसकी रोकथाम हेतु मैंकोजेब या कॉपर आक्सीक्लोराईड का 0.15 से 2.0 प्रतिशत घोल (1.5-2.0 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी) बनाकर फसल पर छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर 10-15 दिन के अन्तराल पर पुन: छिड़काव करें। घोल में 0.1 प्रतिषत ट्राइट्रोन या सैन्डोविट चिपचिपा पदार्थ अवश्य मिलायें।

स्टेमफिलियम ब्लाइट: इस रोग में पत्तों के मध्य में छोटी पीली-नारंगी धारियां उत्पन्न होती है जो बाद में अंडाकार होती हुई फेल जाती है। अन्त में पत्तियां सूख जाती हैं। इस रोग से बचाव के लिए क्लोरोथेलोनील या मैन्कोजेब (0.2 प्रतिशत) 2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोलकर 10 दिन के अन्तर पर छिड़काव करें। 

 


Authors

सुरेश चंद राणा, विनोद कुमार पंडिता, संजय सिरोही, धिरेन्द्र चौधरी एवं पी.बी. सिंह

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान क्षेत्रीय स्टेशन, करनाल-132001

Email: This email address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it.