अधिकतर सब्जी फसलें जैसे की टमाटर वर्गीय, गोभी वर्गीय व प्याज वर्गीय जिनके बीज छोटे व पतले होते है, उनकी स्वस्थ व उन्नत पौध तैयार कर लेना ही आधी फसल उगाने के बराबर हिता है । स्वस्थ पौध तैयार करने के लिए पौधशाला के स्थान का चयन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है । इससे जुडी हुई अन्य बातें निम्नलिखित हैं :

  • स्थान ऊँचाई पर होना चाहिए जहां से पानी का निकास उचित हो
  • भूमि दुमट बलुई होनी चाहिए जिसका पीएच मान लगभग 6.5 हो
  • स्थान पानी के स्रोत के समीप होना चाहिए
  • स्थान खुले में होना चाहिए जहां सूर्य की पहली किरण पहुचे
  • स्थान, देखरेख की दृष्टि से भी निकट होना में होना चाहिए
  • स्थान, खेत के किनारे पर होना चाहिए ताकि कृषि कार्यो में रुकावट न आए
  • यदि भूमि का पहली बार उपयोग किया जा रहा है तो इसे फफूँद रहित करने के लिये फारमैलिडहाइड नामक रसायन से उपचार करना अति आवश्यक है । इसका 25 मि.लि. का एक लिटर पानी में घोल बनाएं तथा पौधशाला के लिए चुने गए स्थान को अच्छी तरह छिड‌काव कर भिगोए । तत्पश्चात इस स्थान को पोलीथिन की चादर से अच्छी तरह ढक दे । लगभग एक सप्ताह पश्चात पोलीथिन चादर को हटाकर इस जगह की अच्छी तरह से 3 – 4 बार जुताई व खुदाई कर खुला छोड़ दे जिससे रसायन का असर समाप्त हो जाए । इसके पश्चात भूमि को अच्छी तरह भुरभुरा बनाए तथा लगभग उपचार के 15 दिन पश्चात बुवाई के लिए तैयार करें । यह उपचार कमरतोड़ तथा क्लेदगलन (डैपिंग आफ) नामक बीमारी की रोकथाम में सहायता करेगा । क्यारी बनाते समय यह ध्यान रहे कि प्रति 10 वर्ग मीटर के लिए लगभग 20 से 25 कि.ग्रा. सड़ी गोबर की खाद ट्राईकोडर्मा के साथ 1:50 के अनुपात में मिलाकर 200 ग्राम सिंगल सुपर फास्पेट तथा 15-20 ग्राम इंडोफिल एम 45 नामक फफूंदनाशक और कोई भी उपलब्ध धूल कीटनाशक मिलाएं ।
  • क्यारिया 15-20 सें.मी. ऊँची उठी होनी चाहिए । इनकी चोडाई लगभग 1 मीटर तथा लम्बाई 3 मीटर होनी चाहिए जो की सुविधा अनुसार घटाई – बढाई जा सकती है ।
  • बीज का उपचार बुवाई से पहले 2-3 ग्राम/कि.ग्राम बीज की दर से कैप्टान, थीरम, बाविस्टीन इत्यादि फफूंदनाशको या ट्राईकोडर्मा हर्जिएनम से करे जिससे डैपिंग आफ नामक बीमारी का प्रकोप कम होगा ।
  • बुवाई 5 सें.मी. दूर पंक्तियो में 1 सें.मी गहराई पर तथा पतली मिट्टी की परत से ढक दे । क्यारियो को सूखी घास से ढक दे तथा फव्वारे से हल्की सिंचाई करे ।
  • अंकुरण होने पर घास हटा दें तथा नियमित हल्की सिंचाई से नमी बनाए रखें ।
  • कीटो व कमरतोड़ रोग से बचाव के लिए 0.25 प्रतिशत इंडोफिल एम 45 या 2 ग्राम ट्राईकोडर्मा हर्जिएनम प्रति लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करे तथा 2 मि.लि. प्रति लीटर पानी के हिसाब से मेलाथीयोंन या एन्डोसल्फान का छिडकाव समय समय पर करते रहें ।
  • जब पौध 8-10 सें.मी. ऊँची हो जाए तो 0.3 प्रतिशत यूरिया का छिडकाव करे ताकि बढवार अच्छी हो ।
  • खरपतवार का नियंत्रण हल्की निराई गुडाई से प्रति सप्ताह करे तथा आवांछ्नीय पौधे भी निकाल दे ।
  • रोपाई से 3-4 दिन पहले सिंचाई रोक दे तथा उखाड़ने से एक घंटा पहले हल्की सिंचाई करे ऐसा करने से जड़े नही टूटेगी ।
  • स्वस्थ पौध का रोपण सायकाल में ही करे तथा हल्की सिंचाई करे ।

एक हैक्टर क्षेत्र के लिए पौध तैयार करने के लिए विभिन फसलों की बीज मात्रा व क्यारियों का आकार (वर्ग मी.) निम्न होगा :

फसल

क्यारियों की संख्या

बीज की मात्रा प्रति क्यारी (ग्रा.)

टमाटर

10

40-50

बैगन

15

35-40

शिमला मिर्च

10

70-80

मिर्च

10

100-150

फूलगोभी  अगेती         

मध्यम   व      

पछेती

10

10

10

60-70

40-50

35-40

ब्रोकली

10

50-60

बंदगोभी

10

70-75

चाइनीज बंदगोभी

10

60-75

गाँठ गोभी

20

50-60

सलाद (लैटटयूस)

10

40-50

प्याज

50

175-200

पोलीहाउस के अन्दर बेमौसमी सब्जियों की पौध तैयार करना

उत्तर भारत के क्षेत्रों में सर्दी के मौसम में पौध बनाने में प्राय: परेशानी होती है । पोलीहाउस के अन्दर तापमान को बढ़ाकर और पाले से बचाकर पौध को जल्दी व अच्छी तरह बना सकते है । पौध को छोटी छोटी प्लास्टिक की थैलियो में मिटटी, पत्थर एवं प्लास्टिक की ट्रे तथा नर्सरी बेड में तैयार किया जा सकता है । कददू वर्ग की फसलों की अगेती फसल लेने के लिए पौध को पोलीहाउस के अन्दर तैयार करके लगभग एक से डेढ़ माह जल्दी फसल ली जा सकती है ।  कददू वर्ग की फसलों के लिए अधिकतम तापमान 32 -35 डिग्री सेलिसयस उपयुक्त रहता है क्योंकि ये गर्म जलवायु वाली फासलें है । ये फसलें या पौध डिग्री सेलिसयस से नीचे तापमान को सहन नही कर पाती है । उत्तरी भारत में अगेती कददू वर्ग की फसलों को बोने का समय फरवरी का अंतिम सप्ताह या मार्च का प्रथम सप्ताह है जब रात का तापमान 13-15 डिग्री सेलिसयस के बीच होता है । लेकिन पोलीहाउस में जल्दी तैयार की गई नर्सरी से पौध को फरवरी के प्रथम सप्ताह में सीधे रोपा जा सकता है जब पाला पड़ने का खतरा समाप्त हो चुका हो । इस विधि से फसल सामान्य विधि की तुलना में एक से डेड माह जल्दी प्राप्त की जा सकती है । इसका लाभ दो तरह से होता है – एक तो बेमौसमी सब्जी मिलती है जो बाजार में अच्छा भाव देती है, दूसरा फसल की उपज अवधि भी एक – डेढ़ माह अधिक हो जाने से कुल पैदावार में बढोत्तरी होती है । अत: कददू वर्ग की फसलो के बीजो को पोलीथिन की छोटी छोटी थैलियो, जिसमें मृदा, बालू व खाद बराबर मात्रा में मिली होती है, दिसम्बर – जनवरी में बुवाई की जाती है । थैलियो में तीन चार छोटे छोटे छेद बना देने चाहिए जिससे कि अधिक पानी बाहर निकाल सके । प्रत्येक थैली में 2-3 बीज बोने चाहिए ।

इसी तरह कददू वर्ग की सब्जियों के अलावा कुछ अन्य फसलों जैसे की टमाटर, बैगन, मिर्च आदि की पौध भी पोलीहाउस में तैयार करके बसंत ऋतु (फरवरी-मार्च) की रोपाई के लिए तैयार की जा सकती है । इन फसलों के लिए सीधे क्यारी में बुवाई की जा सकती है । खुले में पौध तैयार होने में लगभग दो माह का समय लग जाता है क्योंकि दिसम्बर – जनवरी में तापमान बहुत कम होता है । प्रयोगों में पाया गया है कि पोलीहाउस में ये पौध तीन साप्ताह में ही तैयार हो जाती है । पोलीहाउस में अंकुरण अच्छा होने के कारण पौध की संख्या भी अधिक बनती है । किन्तु पौध अधिक कोमल नही होनी चाहिए इसके लिए कठोरीकरण करना अच्छा रहता है 


Authors:

राम सिंह सुमन

भा.कृ.अ.सं. क्षेत्रीय स्टेशन, कटराईं (कुल्लू घाटी) हि.प्र.

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