भूमि की उर्वरता किसी भी राष्ट्र के लिए बहुत महत्व रखती है किसी भी देश की सभ्यता का अंदाजा वहां के भूमि के सदुपयोग या दुरूपयोग से लगाया जा सकता है। हमारी जनसंख्या दिन पर दिन बढती है। जबकि हमारी कृषि योग्य भूमि सिकुडती जा रही है। हमारे पास ऐसा कोर्इ साधन नहीं है। जिससे कि हम भूमि का क्षैतिज विस्तार कर सके अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है। कि हम इनका उपयोग किस प्रकार करे क्योंकि ये हम सभी जानते है। कि सभी वनस्पतियों तथा प्राणियों का जीवन इसी पर टिका हुआ है। आज के युग में जब कृषि भी एक व्यापार बन गया है, मृदा उर्वरता का महत्व और अधिक बढ जाता है। मूल्यवान उर्वरकों एवं जैविक खादों के संरक्षित तथा उचित उपयोग का मार्ग भी मृदा परीक्षण के ज्ञान से ही संभव है। 

मृदा परीक्षण के उददेश्य एवं आवश्यकता

मृदा परीक्षण के निम्नलिखित उददेश्य है।

1.   मृदा में आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा ज्ञात करना

2.   मृदा परीक्षण के आधार पर फसलों के लिए संस्तति देना।

3.   मृदा परीक्षण के आधार पर क्षेत्रों का मूल्यांकन करना तथा उनका उर्वरता के आधार पर मानचित्र  तैयार करना।

4.   समस्या ग्रस्त भूमियों के लिये मृदा सुधारकों की सही-सही मात्रा का निर्धारण करना।

पौषक तत्वों की मात्रा का निर्धारण आदि सामान्यता निम्नलिखित तथ्यों को ज्ञात करने के लिए किया जाता है।

(1)     जैविक कार्बन

(2)     उपलब्ध नार्इट्रोजन

(3)     उपलब्ध फास्फोरस

(4)     उपलब्ध पोटाश

(5)     मृदा पी0एच0

(6)     घुलनशील

(7)     विधुत चालकता

(8)     मृदा गठन

(9)     फ्री0 कार्बोनेट की मात्रा एवं मृदा सुधारको की मात्रा।

मृदा परीक्षण में मिटटी के नमूने के सही होने का विशेष महत्व होता है। इसलिए मृदा का नमूना इस ढंग से लेना चाहिए कि वे जिन खेतों से लिए जाये वे उनकी मिटटियों का वास्तविक प्रतिनिधित्व कर सकें। यह इसलिए आवश्यक है क्योंकि इन्हीं जांच के परिणामों के आधार पर उर्वरक संस्तुतियां तैयार करनी होती है। किसी क्षेत्र में भली भांति वितरित भागों से यादृचिछक ढंग से मृदा का जो नमूना लिया जाता है, उसे प्राथमिक नमूना कहते है। जब प्राथमिक नमूनों को आपस में भली भांति मिला लिया जाता है। तो उसे प्रतिनिधि या संयुक्त नमूना कहते है।

नमूना लेते समय खेत के ढाल तथा मिटटी के रंग व गठन, फसल प्रबंध, फसल चक्र आदि पर सावधानी पूर्वक ध्यान देना चाहिए। यदि इनके कारण खेत में असमानता हो तो जितने क्षेत्रफल में समानता हो, संयुक्त नमूना वहीं से लेना चाहिए।

ऐसी जगह से कभी मृदा नमूना नहीं लेना चाहिए जैसे रोड के पास, कीचड के गढडे, सिंचार्इ की नाली और खेत की बाउंड्री के पास वाली जगह या कहीं पर सख्त परत है तो उसका नमूना अलग से लेना चाहिए और मोटार्इ, गहरार्इ आदि नोट कर लेनी चाहिए।

मृदा नमूने की गहराई

मृदा नमूने की गहरार्इ फसल के प्रकार, मृदा परीक्षण प्रयोगशाला की सलाह एवं कृषि पद्धतियों (ट्रेक्टर या हल से जुतार्इ) पर निर्भर करती है। सामान्यत: सही गहरार्इ वह होती है जहां तक पौधों की जडों को अधिकांशत: पोषण प्राप्त होता है। जो कि फसलों के अनुसार अलग-अलग होती है। मृदा परीक्षण के लिए 0-15 सेमी0 तक गहरार्इ से नमूने एकत्र किये जाते है। परंतु ट्रैक्टर आदि से जुतार्इ गहरी होती है तो 0-20 सेमी तक की गहरार्इ से नमूने लिये जाते है। अनाज, सब्जी व फूलों की खेती के लिये नमूना 15 सेमी. की गहरार्इ से लेना चाहिए। गहरी जड वाली फसलों के लिये नमूने की गहरार्इ एक फिट तक होती है। चारागाह घास के मैदान हेतू नमूना 10 सेमी. की गहरार्इ पर लेना चाहिए। समस्याप्रद मृदाओं जैसे अम्लीय क्षारीय लवणीय मृदाओं में नमूना 0-15 सेमी. के अन्तर पर 1 मीटर तक लेना चाहिए।  बागों में मृदा नमूने 15-15 सेमी गहरी पर्तो से अलग-अलग लेना ठीक रहता है। समस्याग्रस्त मिटटियों में ऐसे स्थानों से अलग नमूना लेना चाहिए जहां फसल की वृद्धि अन्य स्थानों से कम हो अथवा पोषक तत्वो की कमी के लक्षण विधमान है। साथ ही उस स्थान से भी अलग नमूना लेना चाहिए, जो इस समस्याग्रस्त स्थान से लगा हुआ है ऐसे सभी नमूने अलग-अलग एकत्र करने चाहिए। ऊसर भूमियों में भौतिक रूप से अलग दिखार्इ देने वाले सभी स्थानों से प्राथमिक नमूने लेने चाहिए और प्रत्येक प्रकार का प्रतिशत क्षेत्रफल मालूम करना चाहिए। कंकड या कडी परत के नमूने भी अलग से एकत्र करने चाहिए, ताकि मिटटी के भिन्न-भिन्न अवयवों को भली भांति जांच करके सिफारिश दी जा सके।

उपकरण एवं सामग्री:

(1) बाल्टी (2) बरमा, (टयूब) (3) खुरपी (4) फावडा (5) पटरी (6) टैग टीन या मोटे कागज का टुकडा (7) कपडे या पालीथीन की थैली 13 सेमी0 × 25 सेमी0 लेबल के सामने  (8) बेलन (9) छलनी (2 मिमी0)

नमूना एकत्र करने की विधि:

(1)  यदि खेत समतल हो, पूरे खेत में एक ही फसल उगार्इ गयी हो तथा उर्वरकों की समान मात्रा डाली गयी हो तो पूरे खेत से एक ही संयुक्त नमूना लेना चाहिए।

(2)  नमूना लेने से पहले यह आवश्यक है कि किन स्थानों से नमूना लेना है वहां की ऊपरी सतह से घास पात साफ कर देने चाहिए। नमूना एकत्र करने के लिए 15-20 याद्रचिछक स्थानों का चयन करते है।

(3)  सबसे पहले 15 सेमी0 गहरा गढडा बनाते है। फिर खुरपी या फावडे को सहायता से इसकी दीवार के साथ साथ पूरी गहरार्इ तक की मिटटी की एक समान परत काटकर किसी साफ बाल्टी में एकत्र करते जाते है।

(4)  मृदा नमूनों को छाया में (धूप में नहीं) सुखाना चाहिए, क्योंकि धूप में सुखाने से नमूने में उपसिथत पोषक तत्वों में अवांछनीय परिवर्तन हो जाता है। छाया में सूख जाने के बाद नमूनों के ढेले फोडकर, कंकड, पत्थर तथा खरपतवार पौधों की जडे आदि को निकालकर फेंक देते है।

(5)  इसके बाद नमूने को खूब अच्छी तरह मिलाकर उसमें से लगभग 500 ग्रा0 मिटटी ले लेते है। नमूने को एक साफ कपडे की थैली में भरकर कागज या टिन के टुकडे पर खेत संख्या, कृषक का नाम व पता लिखकर एक थैली के अंदर तथा दूसरा थैली के मुंह पर बांध देना चाहिए। यदि संभव हो तो स्याही से थैली पर भी लिख देना चाहिए।

सावधानियां:

(1)   खाद के गडढे, मेंढ तथा वृक्षो के नीचे से नमूना एकत्र नहीं करना चाहिए

(2)   तैयार नमूना कभी खुला नहीं छोडना चाहिए

(3)   मृदा नमूना खेत के उस स्थान से नहीं लेना चाहिए जहां पर उर्वरकों का बोरा रखा गया हो क्योंकि वहां पर उर्वरक का कुछ न कुछ भाग जरूर गिर जाता है।

(4)   अगर किसी खेत की मृदा परीक्षण पहले किसी प्रयोग शाखा में हो चुका है तो उसका विवरण भी देना आवश्यक है।

(5)   मृदा नमूनों को उर्वरकों के बोरो के पास नहीं रखना चाहिए।

(6)   मृदा नमूनों को उर्वरकों के बोरो के ऊपर नहीं सुखाना चाहिए।

(7)   नमूना जिस गहरार्इ से लिया जाय, वह नमूने के पैकेट पर अंकित होना चाहिए।

मृदा उर्वरता में कमी के कारण- 

•   मृदा में लगातार खेती होने एवं पर्याप्त खाद उर्वरको का प्रयोग न किया जाना।

•   मृदा में जैवांश जैविक कार्बन का लगातार घटता स्तर ।

•   प्रयोग किये जा रहे उर्वरकों के उपयोग क्षमता का कम होना

•   मृदा क्षरण से पोषक तत्वों का धीरे-धीरे ह्रास।

•   उर्वरकों का असंतुलित प्रयोग।

•   देश के विभिन्न भाग में उर्वरको के प्रयोग में असमानता।

•   सघन खेती का प्रचलन, जिससे एक साथ कर्इ पोषक तत्वों की कमी होना।

•   मृदा मे सूक्ष्म पोषक तत्वों का प्रयोग न होना।

उर्वरता बनाये रखने के लिये सुझाव-

•   उर्वरकों का प्रयोग हमेशा मृदा परीक्षण के आधार पर एवं फसल विशेष की संस्तुति के अनुसार ही करें।

•   उर्वरक प्रबन्धन एक फसल में न करके पूरे फसल चक्र में अपनाएं।

•   फसल चक्र में हरी खाद, फसलो के अवशेष तथा दलहनी फसलो का समावेश अवश्य करें।

•   दलहनी फसलो मे जैविक उर्वरकों का प्रयोग अवश्य करें।

•   फसल चक्र में फसलों का चुनाव इस प्रकार करें कि प्रथम फसल से बचे हुये पोषक तत्वों का सही उपयोग हो सके एवं मृदा से पोषक तत्वों का सही अवशोषण हो सके।

•   उर्वरकों का प्रयोग हमेशा संतुलित रूप में करें जिससे उर्वरक उपयोग क्षमता में वृद्धि हो सकें।

•   सघन खेती मे समनिवत पोषक तत्व प्रबन्धन अपनाएं जिसमें उर्वरकों के साथ गोबर की खाद, हरी खाद, फसल अवशेेषों एवं जैविक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है।

•   नत्रजन उर्वरकों का प्रयोग कर्इ बार में करें। फास्फोरस का प्रयोग रबी वाली फसलों में करें। फसल चक्र के साथ उर्वरक चक्र भी अपनाये जिससे सही उर्वरक उपयोग क्षमता आ सकें।

•   उर्वरकों का प्रयोग सही समय, सही विधि एवं सही साधन से करें।

अत: सक्षिप्त में हम यहां कह सकते है कि मृदा की उर्वरता हमारी सबसे महत्वपूर्ण पूंजी है। अगर स्वस्थ मृदा, होगी तो हम अधिक अन्न उपजा सकेंगे और बढती जनसंख्या तथा घटते हुये खा़ध उत्पादन के बीच सन्तुलन स्थापित कर सकेंगे।


Authors:

रणपाल सिंह 1, राजेश कुमार गोठवाल 2 मोहन लाल दौतानियाँ3 राजेन्द्र कुमार4 एवं चेतन कुमार दौतानियाँ5 

1 सरदार बल्लभ भार्इ पटेल कृषि एवं प्रौधोगिक विष्वविधालय, मेरठ, 250 110

2 स्वामी केषवानन्द राजस्थान कृषि विष्वविधालय, बीकानेर 334 006

3 भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान, भोपाल -462 038

4 राजमाता सिंधीया कृषि विष्वविधालय, ग्वालियर,मध्य प्रदेश

5 बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी