पौधों के पोषक तत्‍व उन तत्वों को कहते हैं जिनकी कमी से पौधे अपना जीवन चक्र पूरा न कर सकें तथा पौधों के स्वास्थ्य में जिनका सीधा योगदान हो। इन तत्वों  की कमी को केवल इन्हीं तत्वों के प्रयोग से ही पूरा किया जा सकता है। पौधों के मुख्य पोषक तत्व 17 हैं इनमे 9 मैक्रो या बहुल पोषक तत्व कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाशियम, गंधक, कैल्शियम तथा मैग्नीशियम है तथा 8 माईक्रो  या सूक्ष्म पोषक तत्व लोहा, जस्ता, तांबा, बोरोन, मोलिबडीनम, क्लोरीन व निक्कल है। 

 मृदा में पोषक तत्वों की कमी व उनके उपयोग की दृष्टि से नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटेशियम अधिक महत्वपूर्ण है।

नाइट्रोजन

नाइट्रोजन तत्‍व फसलों मेें हरापन बनाता है तथा वानस्पतिक वृध्दि को बढ़ावा देती है। यह फसलों में प्रोटीन व कार्बोहाइड्रेट के उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देती है। नाइट्रोजन में प्रमुख उर्वरक निम्नलिखित हैं:-

उर्वरक

नाइट्रोजन (प्रतिशत)

यूरिया

46

कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट

25 तथा 26

अमोनियम सल्फेट

20

अमोनियम सल्फेट नाइट्रेट

26

कैल्शियम नाइट्रेट

15.5

सोडियम नाइट्रेट

16

अमोनिया घोल

20-25

अमोनिया अनहाइड्रस

82

अमोनियम फास्फेट

20

मृदा व फसलों के प्रति अनुकूलता

नाइट्रोजन उर्वरकों की कार्यकुशलता बढ़ाने के लिये मिट्टी की किस्म तथा विभिन्न फसलों के स्वभाव के अनुसार ही उर्वरकों का चुनाव किया जाना चाहिये। रेतीली जमीन में सिंचाई तथा वर्षा से पहले नाइट्रेट तथा अमाईड उर्वरकों के प्रयोग की अपेक्षा अमोनियम उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिये। खुश्क जमीनों में नाइट्रेट उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिये। धान वाली जमीन व अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अमोनियम व अमाइड उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिये। अम्लीय मृदाओं में अमोनियम व अमाइड उर्वरकों की अपेक्षा नाइट्रेट उर्वरक जैसे सोडियम नाइट्रेट व कैल्शियम नाइट्रेट प्रयोग करने चाहिये। क्षारीय (नमकीन) व गंधक की कमी वाली मृदाओं में अमोनियम सल्फेट उर्वरक अच्छा रहता है। अगर खड़ी फसल में नाइट्रेट का छिड़काव करना हो तो अमाइड उर्वरकों का प्रयोग सबसे अच्छा रहता है।

धान, गन्ना तथा आलू के लिये अमोनियम उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिये जबकि तम्बाकू, आलू व अंगूर में अमोनियम क्लोराइड का प्रयोग न करें। तिलहन व दलहनों में अमोनियम सल्फेट अन्य उर्वरकों की अपेक्षा अच्छा रहता है जो नाइट्रोजन के साथ-साथ गंधक की पूर्ति भी करता है।

उर्वरकों के डालने का सही समय व विधि

नाइट्रोजन उर्वरकों के सही उपयोग का समय पौधे की तेज वृध्दिकाल अवस्था होती है। प्राय: बिजाई के समय तथा वृध्दि के पहले 25-50 दिनों में प्रयोग करने से अधिक लाभ मिलता है। बिजाई के समय अन्य तत्वों के उर्वरकों के साथ मिलकर बीज से नीचे या बगल में 2 से.मी. की दूरी पर पोरें। रेतीनी जमीनों में सिंचाई के बाद तथा भारी जमीनों में सिंचाई से पहले प्रयोग करें। रेतीली जमीनों में खोदी/गुडाई करके उर्वरकों को मिट्टी में मिला देना चाहिये। सर्दियों में ओंस उतरने के बाद तथा गर्मियों में व बरसात में दोपहर बाद उर्वरकों को छिड़कना चाहिये।

फास्फोरस :-

फास्फोरस पौधों में श्वसन क्रिया, प्रकाश संश्लेषण तथा अन्य जैव रासायनिक क्रियाओं के लिये आवश्यक है। जड़ों के विकास, कोशिकाओं के निर्माण, पौधों के फलने व फूलने, बीज के निर्माण तथा गुणों में वृध्दि करता है। फास्फोरस कें मुख्य उर्वरक निम्नलिखित हैं-

उर्वरक

पी25 (प्रतिशत)

नाइट्रोजन (प्रतिशत)

सिंगल सुपर फास्फेट (एस.एस.पी.)

16

-

ट्रिपल सुपर फास्फेट

46

-

डाईअमोनियम फास्फेट (डी.ए.पी.)

46

18

मोनो अमोनियम फास्फेट

20

16

मोनो अमोनिया फास्फेट (II)

20

20

यूरिया अमोनियम फास्फेट

28

28

नाइट्रो फास्फेट (सुफला)

32

-

 मृदा व फसलों के प्रति अनुकूलता

क्षारीय (पी.एच.> 8.2) वाली भूमि में केवल 80 प्रतिशत से ज्यादा पानी में घुलनशील फास्फोरस के उर्वरक ही डालने चाहिये। अम्लीय भूमि में पानी के अघुलनशील फास्फोरस के उर्वरकों को बिखेरकर प्रयोग करना लाभकारी रहता है। इन मृदाओं में सिटरिक एसिड में घुलनशील फास्फोरस के उर्वरक प्रयोग करने चाहिये। अत्यधिक अम्लीय मृदाओं में तेजाब घुलनशील फास्फोरस स्रोत जैसे रोक फास्फोरस स्रोत, बोन मील आदि का प्रयोग करें। चूने वाली भूमि में दानेदार व जल में 80 प्रतिशत घुलनशील फास्फोरस के उर्वरक श्रेष्ठ रहते हैं क्योंकि चूने वाले उर्वरकों का स्थिरीकरण शीघ्र और अधिक हो जाता है। पाऊडर वाले उर्वरकों को अम्लीय भूमि में बिखेरकर मिलाने से अधिक लाभ हो जाता है। कार्बनिक खादों को फास्फोरस के उर्वरकों के साथ प्रयोग करने से उर्वरकों की क्षमता में वृध्दि होती है।

कम अवधि वाली फसलें जिनमें जल्दी शुरूआत करने की जरूरत होती है जैसे गेहूँ, धान, मक्की, सोयाबीन व सब्जियों में पानी में घुलनशील फास्फोरस के उर्वरक डालने चाहिये। लम्बी अवधि की फसलों में सिटरिक एसिड में घुलनशील फास्फोरस के उर्वरक डालने चाहिये। तिलहन में सिंगल सुपर फास्फेट अच्छा रहता है क्योंकि यह गंधक भी पौधों को देता है। गेहूँ में डी.ए.पी. खाद का प्रयोग अच्छा रहता है।

उर्वरक डालने का सही समय व विधि

फास्फोरस उर्वरक बिजाई के समय बीज से 2-3 से.मी. गहरा पोरना चाहिये। यदि पोर नहीं कर सकते हैं तो एक-सार बिखेर कर मिट्टी में मिला दें।

पोटाशियम

पोटाशियम पत्तिायों में शकीरा और स्टार्च के निर्माण की कुशलता में वृध्दि करता है। यह कार्बोहाइड्रेट, पोषक तत्व व पानी के स्थानान्तरण में सहायता करता है तथा पौधों में रोगों के प्रति प्रतिरोधिता बढ़ाता है। पोटाशियम में मुख्य उर्वरक निम्नलिखित है:-

उर्वरक

के2ओ (प्रतिशत)

म्यूरेट आफ पोटाश

 

60

 

पोटाशियम सल्फेट

 

50

 

मृदा व फसलों के प्रति अनुकूलता

म्यूरेट आफ पोटाश सस्ता तथा आसानी से उपलब्ध होने वाला उर्वरक है। क्षारीय मृदाओं में म्यूरेट आफ पोटाश न डालें इनमें पोटाशियम सल्फेट का प्रयोग करना चाहिये। शर्करा तथा स्टार्च वाली फसलों जैसे गन्ना, आलू, केला आदि के लिये अधिक मात्रा में पोटाशियम की आवश्यकता होती है। अधिक उपज देने वाली धान तथा गेहूँ की फसल को भी पोटाशियम की अधिक आवश्यकता पड़ती है। म्यूरेट ऑफ पोटाश, तम्बाकू, आलू, टमाटर तथा अंगूर आदि फसलों के लिये हानिकारक हो सकता है। इसलिये इन फसलों में पोटाशियम सल्फेट का प्रयोग करना चाहिये। परंतु धान जैसी पानी में खड़ी रहने वाली फसलों में पोटाशियम सल्फेट की बजाय म्यूरेट ऑफ पोटाश अच्छा रहता है।

उर्वरक डालने का समय व विधि

पोटाशियम के उर्वरकों को फसलों में बिजाई के समय बीज डालना चाहिये। म्यूरेट आफॅ पोटाश को यूरिया की तरह खड़ी फसल में छिड़क कर भी दिया जा सकता है लेकिन उचित रहेगा कि इसका प्रयोग बिजाई के समय ही किया जाये। हल्की जमीनों में अगर पोटाशियम की अधिक मात्रा डालनी है तो इसको आधा-आधा करके दो बार में डालना चाहिये।

 


Authors:

देवराज1, प्रवेन्द्र श्योराण2 ,अश्वनी कुमार2*, निर्मलेंदु बसक2, बाबू लाल मीना2, अनीता मान2 ,पूजा3 एवं आर.एस. अंटिल1

1चौ. च. स. हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार

2भा.कृ.अनु.प.-केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल

3क्षेत्रीय केन्द्र, गन्ना प्रजनन संस्थान, करनाल

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