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उच्च उत्पादकता एवं व्यवसायीक खेती की तकनीकें
Round the year radish production in North Indian Plains उत्तर भारत मे सारे साल मूली उगाऐं
भारत में मूली का प्रयोग सलाद व सब्जी के रूप में पूरे साल होता है परन्तू इसकी कोई भी एक किस्म सारे साल नही उगाई जा सकती। पूसा संस्थान दिल्ली द्वारा विकस्ति पॉच किस्मो को उगाकर, उत्तरी भारत के मैदानों में पूरे साल मूली का उत्पादन किया जा सकता है।
1. पूसा देशी (Pusa Desi) -बुआई समय अगस्त से सितम्बर
2. पूसा रश्मि (Pusa Rashmi) -बुआई समय सितम्बर से अक्टूबर
3. जापानीज वहाईट (Japanes White) -बुआई समय अक्टूबर से दिसम्बर
4. पूसा हिमानी (Pusa Himani) -बुआई समय दिसम्बर से मार्च
5. पूसा चेतकी (Pusa Chetki) -बुआई समय अप्रैल से जुलाई
श्रोत: पूसा कृषि विज्ञान मेला शाकिय फसले संभाग, भाकृअसं, नई दिल्ली
Kharif Onion in Northern plains उत्तर भारत में खरीफ मौसम में प्याज की खेती
उत्तरी भारत में प्याज रबी की फसल है यहां प्याज का भंडारण अक्टूबर माह के बाद तक करना सम्भव नही है क्योकि कंद अंकुरित हो जाते हैं। इस अवधि(अक्टूबर से अप्रैल) में उत्तर भारत में प्याज की उपलब्ध्ता कम होने तथा परिवहन खर्चे के कारण दाम बढ जाते हैं। इसके समाधान के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने उत्तर भारत के मैदानो में खरीफ में भी प्याज की खेती के लिए एन-53(N-53) तथा एग्रीफाउंड डार्क रैड नामक प्याज की किस्मों का विकास किया है।
प्याज की किस्म : एन-53(आई.ए.आर.आई.); एग्रीफाउंड डार्क रैड (एन.एच.आर.डी.एफ.)
बीज बुआई समय: मई अंत से जून
रोपाई का समय : मध्य अगस्त
कटाई : दिसम्बर से जनवरी
पैदावार : 150 से 200 क्विंटल/हैक्टेयर
श्रोत: पूसा कृषि विज्ञान मेला शाकिय फसले संभाग, भाकृअसं, नई दिल्ली
बेमौसमी सब्जियों के उत्पादन की लो टनल तकनीक
यह तकनीक उत्तर भारत के उन मैदानो में सब्जियो की बेमौसमी खेती के लिए बहूत उपयोगी है जहॉं सर्दी के मौसम में रात का तापमान लगभग 40 से 60 दिनो तक 8 डीग्री सें.ग्रे.से नीचे रहता है। इस तकनीक में पहले बेमौसमी सब्जि की पौध को संरक्षित क्षेत्र में प्लास्टिक प्लग ट्रे तकनीक से दिसम्बर व जनवरी माह में तैयार किया जाता है। इसके बाद ड्रिप सिंचाई युक्त खेत में जमीन से उठी हुई क्यारियॉ उत्तर से दक्षिण दिशा में बनाई जाती हैं। इसके बाद क्यारियों के मध्य में एक ड्रिप लाइन डालकर क्यारी के उपर 2 मी.मी. मोटे जंगरोधी लोहे के तार इसप्रकार स्थापित किये जाते हैं कि इसके दो सिरों की दूरी 45 से 60 सेमी तथा उचॉई भी 45 से 60 सेमी रहे। तैयार पौध को क्यारियों में रोपाई के बाद दोपहर बाद 20-30 माईक्रोन मोटाई तथा लगभग 2 मीटर चौडाई की, पारदर्शी प्लास्टिक की चादर से ढका जाता है। ढकने के बाद प्लास्टिक के लम्बाई वाले दोनो सिरों को मिट्टी से दबा दिया जाता है। इस प्रकार रोपित फसल पर प्लास्टिक की एक लघु सुरंग बन जाती है। आवश्यकता अनुसार मौसम ठीक होने पर टनल की प्लास्टिक को फरवरी के प्रथम से तीसरे सप्ताह में हटा दिया जाता है। इस तकनीक से बेल वाली समस्त सब्जियों को मौसम से पहले या पूर्णत: बेमौसम में उगाना संभव है। विभिन्न बेल वाली सब्जियों में संभावित फसल अगेतापन इस प्रकार है
चप्पन कद्दू- 40 से 60 दिन
लौकी- 30 से 40 दिन
करेला- 30 से 40 दिन
खीरा- 30 से 40 दिन
खरबूजा- 30 से 40 दिन
इस प्रकार किसान प्लास्टिक लो टनल तकनीक से अगेती या बेमौसमी फसल उगाकर अधिक लाभ कमा सकते हैं क्योकि अगेती व बेमौसमी फसलो
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का बाजार भाव अधिक रहता है।
श्रोत: पूसा कृषि विज्ञान मेला, द्वारा संरक्षित कृषि प्रौघोगिकी केन्द्र, भाकृअसं, नई दिल्ली
सीप से मोती संवर्धन की तकनीक
जब कोई बाहरी वस्तू,परजीवी या रेत कण आदि सीपी की आंतरिक झिल्ली एवं खोल के बीच या जननांग में किसी कारणवश फस जाता है तो सीपी रक्षा स्वरूप प्रथम उसको जडित करती है फिर उस पर स्त्राव करके मोती बना देती है। इस प्रणाली का उपयोग मत्स्य वैज्ञानिको ने कृत्रिम मोती संवर्धन हेतु किया। संवर्धन हेतु 1.5 से 2 मीटर गहरी डबरी, तालाब या सीमेंट की टंकी का प्रयोग किया जाता है। मोती संवर्धित से लगभग 2 लाख रूपये प्रति हैक्टेयर तक आमदनी होती है। किसान इस तकनीक के प्रशिक्षण हेतु डी.पी.एस.चौहान एवं डॉ.आर.के.शुक्ला,इंदिरा गांधी कृषि विश्वविघालय,कृषि विज्ञान केंद्र,बिलासपुर,छतीसगढ से सम्पर्क कर सकते हैं।
श्रोत: पूसा कृषि विज्ञान मेला,कृषि विज्ञान केंद्र, बिलासपुर, छतीसगढ
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