Growing trends towards farming in educated youth

एक दौर था जब लोग गाँवों से शहरों की और पलायन करने लगे थे लगता था गावं खाली हो जाएगें, खेती किसानी कौन करेगा, कैसे मिलेगा सबा करोड़ आबादी वाले भारत को अनाज,किंतु प्रकृति का नियम है कि सब समय एक सामान समय नहीं रहता हैI कहते हैं “ कहीं धूप कहीं छाया, भगवान् तेरी माया ’’मनुष्य का स्वभाव है कि वह बदलाव चाहता है, उससे उसे तुष्टि मिलती है इसके विपरीत अवस्था में मन ऊब जाता हैIइसी क्रम में इस लेख में मानवीय सोच में बदलाव देखने को मिलेगेंI

नौकरी अगर अच्छी हो तो खेती-किसानी करने के बारे में भला कौन सोचता है। लेकिन बदलाव के इस दौर में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपनी जिद और जज्बे के चलते नई राह पकड़ रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में आपने ऐसे कई खबरों के बारे में सुना या पढ़ा होगा कि किसी ने इंजीनियर की नौकरी तो किसी ने गूगल की नौकरी छोड़ कर किसानी शुरू कर दी है। आइये हम आपको मिलवाते हैं ऐसे ही 10 किसानों से...

इंजीनियर बना किसान

जयपुर के झालावाड़ जिले की भवानीमंडी तहसील के गुआरी खेड़ा गाँव के कमल पाटीदार को बी. टेक. करने के बाद एक सॉफ्टवेयर कंपनी में जॉब मिल गई थी। इस जॉब में पैसा और सुविधा दोनों थे, लेकिन उसके बावजूद कमल को ये नौकरी रास न आई, क्योंकि कमल अपने माता-पिता के साथ गाँव में ही रहना चाहते थे। इस लिए उन्होंने फैसला किया कि वो गाँव में अपने परिवार के साथ रह कर खेती करेंगे। कमल गाँव तो आ गए लेकिन वो आम किसानों की तरह खेती नहीं करना चाहते थे। उन्होंने अन्य किसानों से अलग हटकर कोकपिट पर सब्जियों की पौध तैयार कर बेचने का काम शुरू कर दिया।

अपने इस काम को बढ़ाने के लिए इन्हें एक-एक ग्रीन हाऊस की जरूरत थी, जिसके लिए उन्होंने राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 4 हजार वर्गमीटर क्षेत्र में पॉली हाऊस लगवा लिया। इसके बाद दूसरे साल इन्होंने 1 लाख पौध तैयार कर और तीसरे साल 5 लाख पौध तैयार कर बेची। इनके द्वारा तैयार पौध किसानों को अच्छा उत्पादन दे रही थी, इसलिए इनकी मांग बढ़ी और अब ये 20 लाख पौध हर साल बेचते हैं। इसके साथ ही ग्रीन हाऊस में शिमला मिर्च, टमाटर, पत्ता गोभी के साथ कई अन्य फसल ले लेते हैं। आज कमल का सालाना करीब दो करोड़ रुपये कमाते हैं।

इंजीनियर की नौकरी छोड़ शुरू की मोती की खेती

हरियाणा राज्य के गुड़गांव के फरूखनगर तहसील के जमालपुर गाँव के रहने वाले विनोद कुमार (27 वर्ष) ने इंजीनियर की नौकरी छोड़कर मोती की खेती शुरू की, जिससे वह 5 लाख रुपए सलाना कमा रहा है। इतना ही नहीं वह दूसरे किसानों को भी इस खेती का प्रशिक्षण दे रहा है।

विनोद ने वर्ष 2013 में मानेसर पॉलिटेक्निक से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। इसके बाद दो साल तक नौकरी की। उनके पिता भी किसान थे। प्राइवेट नौकरी के साथ थोड़ी रूचि खेती में भी थी। इंटरनेट पर खेती की नई-नई तकनीक के बारे में पढ़ते-पढ़ते मोती की खेती के बारे में पढ़ा। कुछ जानकारी इंटरनेट से जुटाई तो पता चला कि कम पैसे और कम जगह में यह काम किया जा सकता है। मोती की खेती का प्रशिक्षण देने वाला देश का एक मात्र संस्थान सेंट्रल इंस्टिट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर एक्वाकल्चर (सीफा) भुवनेश्वर से मई 2016 में एक सप्ताह का प्रशिक्षण लिया और 20 गुणा 10 फुट एरिया में 1 हजार सीप के साथ मोती की खेती शुरू कर दी।

गूगल की नौकरी छोड़ बन गए किसान

नागा कटारू एक ऐसे भारतीय इंजीनियर है जिन्होंने गूगल में नौकरी पाई और फिर कुछ ही समय बाद इसे अपनी मर्जी से छोड़ भी दी, क्योंकि वो खेती करना चाहते थे। नागा कटारू आंध्रप्रदेश के कृष्णा जिले के गंपालागुडम गाँव के रहने वाले हैं और आज उनकी गिनती अमेरिका के बड़े किसानों में होती है। नागा आज खेती से हर साल 18 करोड़ का टर्नओवर करते हैं। नागा अमेरिका में कैलीफोर्निया में बादाम व खुबानी की खेती करते हैं।

जब उनके दिमाग में खेती करने को आया तो उन्होंने कैलिफोर्निया में ही 320 एकड़ का फार्म किराए पर लिया और बादाम और खुबानी की खेती करने लगे, उसके बाद उन्होंने वह जमीन खरीद ली। आज कटारु की फर्म में पहले से ज्यादा सुविधाएं हैं। कटारु खुद एक तकनीकी के अच्छे जानकर है यही कारण है कि उन्होंने अपने फर्म में तकनीकी का ही प्रयोग किया। और वर्तमान समय में फर्म का उत्‍पादन पहले से कहीं ज्‍यादा कर लिया है। साल 2015 और 2016 में उन्‍हें इस फार्म ने 17 व 18 करोड़ रुपए टर्नओवर किया। कटारू का सपना है कि वह भारत में भी इस तरह की एडवांस खेती करें ताकि खेती करने के तरीके में बदलाव हो सके।

नागा कटारू ने गूगल में बतौर इंजीनियर आठ साल तक काम किया। इस दौरान उन्होंने 'गूगल अलर्ट' का आइडिया वहां के अधिकारियों को बताया। इस तरह 2003 में ‘गूगल अलर्ट' लांच किया। गूगल अलर्ट बेहद ही पसंदीदा सॉफ्टवेयर है, जो काफी उपयोगी है।

प्रोफेसर की नौकरी छोड़मधुलिका बनी रेशम किसान

बिहार के कटिहार जिले के फलका के गांधी ग्राम बरेटा की मधुलिका चौधरी ने तीन साल पहले लंदन यूनिविर्सटी में प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर गाँव के लिए कुछ करने का सपना देखा। सपना पूरा करने के लिए मधुलिका ने गाँव वापस आकर रेशम के पौधे की खेती शुरू की। उनके साथ उनके पति भी हैं, जो दिल्ली के गुड़गांव में रह रहे थे। तीन साल पहले मधुलिका फलका स्थित अपने गाँव आई। यहां की हरियाली और खेती ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वह यहीं रम गईं। मधुलिका ने साढ़े पांच एकड़ जमीन पर रेशम के पौधे की खेती की शुरुआत की। यह जमीन बंजर थी। आज उसमें हरे भरे पौधे लहलहा रहे हैं। मधुलिका ने रेशम के पौधे की खेती को दिन दूनी, रात चोगुनी तरक्की दी।

अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर लग गए उगाने सब्ज़िया

छत्तीसगढ़ के बस्तर में रहने वाले 24 साल के अजय मेहरा ने पिता की जिद पर अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर खेती करने का फैसला लिया। इस युवा ने 30 एकड़ में गोभी की खेती शुरू की और 3 महीने में ही वह करीब 16 लाख रुपए की कमाई की। इसके साथ ही वह अब अपने साथियों को सब्जी की खेती के लिए मोटिवेट करने में जुटे हुए हैं।

बकावंड ब्लॉक के अजय के पिता शोभा सिंह मेहरा को उनके बेटे को नौकरी कराना पसंद नहीं था। एग्रीकल्चर में बीएससी पास होने के बाद अजय को एक प्राइवेट कंपनी में हर महीने 20 हजार रुपए की नौकरी मिली। लेकिन पिता के मना करने पर उसने नौकरी छोड़ दी और मेहनत पर भरोसा करते हुए गोभी की खेती शुरु की। कुछ साल पहले तक 5 एकड़ में धान और दूसरी फसलों की खेती करने वाला यह किसान अब 35 एकड़ में खेती कर रहा है, जिसमें फूल गोभी और पत्ता गोभी के 15-15 एकड़ शामिल हैं।

नौकरी छोड़ दो युवा कर रहे तुलसी की खेती

बेगूसराय में तुलसी का पौधा घर-आंगन में ही नहीं, खेतों में भी अपनी खुशबू बिखेर रहा है। जिले के कई गाँवो में तुलसी की व्यापक स्तर पर खेती हो रही है, और यह संभव हुआ है दो युवाओं की मेहनत से, जिन्होंने मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़कर खेती को कॅरियर के रूप में चुना। मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ राहुल भदुला और आलोक राय ने औषधीय पौधों की खेती करने की ठानी। आज उनके प्रयास का ही फल है कि यहां के किसान अपने खेतों में तुलसी की खेती कर रहे हैं। राहुल भदुला उत्तराखंड के मूल निवासी हैं जबकि 30 वर्षीय आलोक राय बेगूसराय जिले के हैं। उन्होंने औषधीय पौधों की खेती के लिए किसानों को प्रशिक्षण दिया। उनके उत्पाद की मार्केटिंग करना सिखाया।

सरकारी नौकरी छोड़ अब एलोवेरा की खेती से सालाना कमाते हैं दो करोड़

जैसलमेर से 45 किलोमीटर दूर स्थित धाइसर के रहने वाले हरीश धनदेव ने कुछ समय पहले एक अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी थी और अब वो एलोवेरा की खेती कर रहे हैं। किसानों के परिवार से आने वाले हरीश 120 एकड़ में एलोवेरा की खेती कर रहे हैं, जिससे वो हर साल करीब दो करोड़ रुपए कमा रहे हैं। हरीश ने कहा कि वे जैसलमेर नगर निगम में जूनियर इंजीनियर के पद पर नौकरी कर रहे थे। तनख्वाह भी अच्छी थी। हरीश धनदेव ने 'नचरेलो एग्रो' नाम की एक अपनी कंपनी भी खोली है। यह कंपनी भारी मात्रा में पतंजली को एलोवेरा सप्लाई करती है।

सात लाख रुपए का पैकेज छोड़ चुनी बागवानी

ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन के बीच हाल के दिनों में बदलाव की कुछ सुखद खबरें भी आ रही हैं, जब देश के नौजवान महानगरों की अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर गाँवों की ओर रुख कर रहे हैं। यही नहीं, ये नौजवान खेती-किसानी और बागवानी में बाकायदा कामयाबी की इबारत लिख रहे हैं। दिल्ली में मैकेनिकल इंजीनियर की नौकरी छोड़ नींबू-केले की बागवानीकरने वाले पुष्पजीत सिंह (34 वर्ष) भी इन्हीं उत्साही नौजवानों में एक हैं।

पीलीभीत के पूरनपुर ब्लॉक के रहने वाली पुष्पजीत सिंह दिल्ली में मैकेनिकल इंजीनियर थे, लेकिन उनके मन में कहीं न कहीं खेती-किसानी के प्रति झुकाव था। यही वजह थी कि एक दिन उन्होंने सात लाख रुपए सालाना पैकेज की नौकरी छोड़कर अपने गाँव लौटने का फैसला कर लिया। आज जिले में बागवानी के क्षेत्र में अच्छा-खासा मुकाम बना लिया है। वह कहते हैं, “पीलीभीत जैसे तराई इलाके में लोग बागवानी को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं रहते। नींबू की बागवानी तो सुनी भी नहीं होगी, लेकिन हमने यह फैसला किया। उम्मीद है, अन्य किसान भी नींबू की बागवानी की ओर आगे बढ़ेंगे और अच्छा-खासा मुनाफा कमाएंगे।”

पुष्पजीत के पास लगभग 16 एकड़ जमीन है, जिसमें से 12 एकड़ में केले, चार एकड़ में नींबू और कटहल लगा रखे हैं। पीलीभीत जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर पूरनपुर ब्लॉक के पचपेडा प्रहलादपुर में रहने वाले पुष्पजीत बताते हैं, “यहां के ज्यादातर किसान धान, गेहूं और गन्ना की परंपरागत खेती करते चले आ रहे हैं। नींबू की खेती मैंने एक नए मकसद से शुरू की, ताकि लोग जानें की पीलीभीत जैसे तराई इलाके में भी इसकी अच्छी-खासी पैदावार की जा सकती है। मेरे बाद जिले के दो और किसानों ने भी नींबू बागवानी शुरू की है।”

दो एकड़ खेत में पुष्पजीत ने नींबू की तीन प्रजातियां इडियन सीड लेस, कागजी और इटेलियन लगा रखी है। इडियन सीड लेस से तीन बार फसल ले चुके हैं, जबकि कागजी और इटेलियन से अभी तक दो बार फसल ले चुके हैं। पुष्पजीत बताते हैं, “नीबू को एक बार लगाने से 20 से 25 साल तक इसकी पैदावार ली जा सकती है। मैंने काफी रिसर्च किया है, तभी इसकी बागवानी शुरू की है। मेरठ जिले के एक किसान ने डेढ़ एकड़ में नींबू का बाग लगा रखा है।”

दूसरे किसान भी समझ सकें, इसके लिए पुष्पजीत बताते हैं, “नींबू के पौधे लगाने का उचित समय जून, जुलाई और अगस्त है। नींबू को लगाने के तीसरे साल से उससे पैदावार ली जा सकती है।” पुष्पजीत बताते हैं, “नींबू के साथ मल्टीक्रोपिंग की जा सकती है। अभी मैं केला, कटहल और ब्रोकली की खेती कर रहा हूं।” नींबू के बाजार के बारे में पुष्पजीत बताते हैं, “प्रदेश में अभी इसका कोई अच्छा बाजार नहीं है। हमारे यहां जो नींबू होगा, वह दिल्ली के बाजार में जाएगा। नींबू के साथ अन्य फसलों-बागावानों को हम जैविक तरीके से उगा रहे हैं। घर में ही खाद बनाकर छिड़काव करते हैं। इससे पैदावार अच्छी मिलती है और रेट भी ठीक मिलते हैं।”नींबू की बागवानी शुरू करने के बारे में पुष्पजीत बताते हैं, “नींबू की खेती इसलिए शुरू की, क्योंकि अभी जितना भी नींबू उत्तर भारत में आ रहा है, वह पहाड़ों और दक्षिणी भारत से आ रहा है। उत्तर प्रदेश में तो नींबू के बाग कम ही देखने को मिलते हैं।”

निष्कर्ष

निसंदेहकह सकते हैं कि युवा चाहे तो सब कुछ कर सकते हैंI युवा देश के भविष्य हैं, वे किसी भी क्षेत्र में जाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन सकते हैं और चहु और प्रगति कर सकते हैंI  आजकल पढ़े–लिखे युवा-युवतियां हर क्षेत्र में काम कर अपना नाम रोशन कर रहे हैं I भारत के माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में युवा वर्ग को अपने देश की शक्ति बताकर विश्व को अहसास कराया है I


Authors

सुजय दास और के. एल. अहिरवार

वैज्ञानिक

ICAR-NIRJAFT, Kolkata

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