Collar rot (Aspergillus niger) a serious peanut disease

मूंगफली (ऐराकिस हायपोजिया ) दुनिया की सबसे प्रमुख तिलहन फसल है। यह लेग्युमिनिएसी  कुल की फसल हैं। भारत में, मूंगफली उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्य गुजरात, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और पंजाब हैं तथा राजस्थान में मूंगफली उगाने वाला प्रमुख जिले बीकानेर, चूरू, दौसा, जयपुर, नागौर, सीकर और उदयपुर हैं। यह खाद्य तेल का एक प्रमुख स्रोत है,

मूंगफली दाने में 40 से 45 प्रतिशत तेल और 25 से 30 प्रतिशत प्रोटीन होता है। इसमें 18 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट और खनिज जैसे Ca, Mg और Fe उच्च स्तर में उपलब्ध होते हैं। इसका उपयोग हाइड्रोजनीकरण और साबुन उद्योगों में किया जाता है।

Mungfali ki fasal main collor rot disease

मूंगफली कई फफुंद, जीवाणु और विषाणु जनित बीमारियों से प्रभावित होती है, जो फसल की अंकुरण से लेकर कटाई और भंडारण तक वृद्धि के सभी चरणों में फसल को अत्यधिक नुकसान पहुंचाते है, लेकिन एस्परजीलस नाइ के कारण होने वाली कॉलर रोट राजस्थान में सबसे विनाशकारी बीमारी है।

कॉलर रोट:-

यह बीज व भूमि जनित फफुंद से होने वाला रोग है। यह गर्म, शुष्क मौसम या प्रतिकूल पर्यावरण परिस्थितियाँ के दौरान गंभीर रूप से होती है। रेतीली या दोमट मिट्टी जहाँ पर मूंगफली उगाई जाती है, इस रोग का आक्रमण अत्यधिक होता है। अकेले कॉलर रोट के सड़ने से होने वाली वार्षिक उपज हानि लगभग 5% है, इस रोग से फसल को 40% तक नुकसान होने की संभावना होती है। मूंगफली की अधिकांश किस्में इस बीमारी के लिए अतिसंवेदनशील होती हैं।

लक्षण :-

इस बीमारी के लक्षण बीज के अंकुरण के समय से दिखाई देने लगते है तथा इस बीमारी का आक्रमण बुवाई से लेकर 50 दिन के अंतराल तक अत्यधिक होता है। यह बीमारी दो चरणों में दिखाई देती है, अंकुरण पूर्व और अंकुरण पश्चात की अवस्था। अंकुरण पूर्व चरण में,  बीज मिट्टी में सड़ सकता है या अंकुरीत बीज पर बीजाणुओं के काले रंग का चूर्ण ढंका होता है, इन बीजाणुओं के कारण अंकुरीत बीजपत्र तेजी से सुखकर नष्ट हो जाते हैं। अंकुरण के बाद के चरण में, गोल हल्के भूरे रंग के धब्बे प्रारम्भ में बीजपत्र पर दिखाई देते हैं और जैसे ही वे बीजपत्र ऊतक या तना को आगे बढ़ाते हैं, जल आस्क्त धब्बे बन जाते हैं।

इस रोग के कारण मूंगफली की फली और चारे की पैदावार में भारी नुकसान होता है तथा अत्यधिक रोग के आक्रमण की अवस्था में खेत खाली हो जाता है।

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कॉलर रोट के लक्षण

कॉलर रोट अनुकूल परिस्थितियाँ :-

निम्नलिखित परिस्थितियाँ के कारण मूंगफली की फसल कॉलर रोट से अत्यधिक संक्रमित होती है।

  • संक्रमित बीजों का उपयोग।
  • बीजों की गहरी बुवाई।
  • मृदा का उच्च तापमान (30-350 C)।
  • निम्न मृदा नमी।

कॉलर रोट प्रबंधन:-

  • फसल का चक्रीकरण।
  • खेत में पिछले मौसम के संक्रमित फसल के अवशेष को हटाना और नष्ट करना चाहिए।
  • इस बीमारी की रोकथाम के लिए मूंगफली के प्रमाणित बीजो की बुवाई करनी चाहिए।
  • बीजो की बुवाई से पहले 5 ग्राम थायरम या 2 ग्राम विटावेक्स पावर या 1.5 ग्राम रैक्सिल प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित कर बुवाई करनी चाहिए।
  • बीज की बुवाई से पहले जैव फफूंदनाशी ट्राईकोडर्मा का 10 ग्राम/किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर बोने से भी इस रोग का नियत्रण कर सकते है।
  • रोग लक्षण दिखाई देने पर तुरंत मैनकोजेब 3 ग्राम /लीटर पानी का छिड़काव करना चाहिए।

Authors

सरोज चौधरी1, डॉ. अर्जुन लाल यादव2, सुनैना वर्मा3, राकेश कुमार4 और विकास कुमार5

1स्नातकोतर छात्रा, 3विद्या वाचस्पति छात्रा, 4,5स्नातकोतर छात्र, पादप रोग विज्ञान विभाग, कृषि महाविधालय, स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविधयालय (बीकानेर) - 334 006

2सहायक आचार्य, पादप रोग विज्ञान विभाग, कृषि महाविधालय, स्वामी केशवानंद राजस्थान कृषि विश्वविधयालय (बीकानेर)

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